Cross collum

Thursday, April 20, 2017

*आयुर्वेद को छोड़कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमें बनने वाली ओषधियों में मांसाहार का प्रयोग होता है।*

🚩 🙏 *।।वन्दे मातरम्।।* 🙏 🚩
*आयुर्वेद को छोड़कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमें बनने वाली ओषधियों में मांसाहार का प्रयोग होता है।*

*स्वदेशी के प्रखर प्रवक्ता श्रीराजीव दीक्षितजी*

*मित्रो आयुर्वेद को छोड़ कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमें बनने वाली ओषधियों में मांसाहार का प्रयोग होता है, आप जितनी भी एलोपैथी ओषधियाँ लेते है उनमें जो कैप्सूल होते है वो सब के सब मांसाहारी होते हैं।*

*दरअसल कैप्सूल के ऊपर जो कवर होता है उसके अंदर ओषधी भरी जाती है वो कवर प्लास्टिक का नहीं होता आपको देखने में जरूर लगेगा कि ये प्लास्टिक है लेकिन वो प्लास्टिक का नहीं है क्योंकि अगर ये प्लास्टिक का होगा तो आप उसको खाओगे तो अंदर जाकर घुलेगा ही नहीं क्योंकि प्लास्टिक 400 वर्ष तक घुलता नहीं है*

*तो मित्रो ये जो कैप्सूल के कवर जिससे बनाये जाते है उसका नाम है gelatin (जिलेटिन)। जिलेटिन से सब के सब कैप्सूल के कवर बनाये जाते है और जिलेटिन के बारे में आप सब जानते है, जब गाय के बछड़े या गाय को कत्ल किया जाता है उसके बाद उसके पेट की बड़ी आंत से जिलेटिन बनाई जाती है।*

*मित्रो आपने एक और बात पर ध्यान दिया होगा 90 % एलोपेथी ओषधियों पर कोई हरा या लाल निशान नहीं होता। कारण एक ही है इन ओषधियों में बहुत अधिक मांसाहार का उपयोग होता है और कुछ दिन पहले कोर्ट ने कहा था कि ओषधियों पर हरा या लाल निशान अनिवार्य होना चाहिए और ये सारी बड़ी एलोपेथी कंपनियाँ अपनी छाती कूटने लग गई थी।*

*कैप्सूल के अतिरिक्त मित्रो एलोपेथी में गोलियां होती है (tablets) तो कुछ गोलियां जो होती है जिनको आप अपने हाथ पर रगड़ेगे तो उसमे से पाउडर निकलेगा, हाथ सफ़ेद हो जाएगा पीला हो जाएगा वो तो ठीक है लेकिन कुछ गोलियां ऐसी होती है जिनको हाथ पर घसीटने से कुछ नहीं होता उन सबके ऊपर भी जिलेटिन का कोटिंग किया होता है वो सब मांसाहारी है।*

*थोड़ी सी कुछ गोलियां ऐसी है जिन पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं होता लेकिन वो गोलियां इतनी खतरनाक है कि आपको कैंसर, शुगर जैसे 100 रोग कर सकती हैं जैसे एक दवा है पैरासिटामोल। इस पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं है लेकिन ज्यादा प्रयोग किया तो ब्रेन हैमरेज हो जाएगा। ऐसे ही एक सिरदर्द की दवा है उस पर भी जिलेटिन का कोटिंग नहीं हैं लेकिन ज्यादा प्रयोग किया तो लीवर खराब हो जाएगा, ऐसे ही हार्ट के रोगियों को एक दवा दी जाती है उसमे भी कोटिंग नहीं लेकिन उसको ज्यादा खाओ तो किटनी खराब हो जाएगी।*

*तो मित्रो जिनके ऊपर कोटिंग नहीं है वो वो दवा जहर है और जिनके ऊपर कोटिंग है वो दवा मांसाहारी है तो अब प्रश्न उठता है तो हम खाएं क्या? मित्रो रास्ता एक ही आप अपनी चिकित्सा स्वयं करों अर्थात आपको पुनः आयुर्वेद की ओर लौटना पड़ेगा।*

*मित्रो दरअसल हमारे देश गौ ह्त्या केवल मांस के लिए नहीं की जाती है इसके अतिरिक्त जो खून निकलता है, जो हड्डियों का चुरा होता है, जो चर्बी से तेल निकलता है, बड़ी आंत से जिलेटिन निकलती है, चमड़ा निकलता है इन सब का प्रयोग कोसमेटिक (सोन्दर्य उत्पाद), टूथपेस्ट, नेलपालिश, लिपस्टिक खाने पीने की चींजे, एलोपेथी दवाइयाँ, जूते, बैग आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है, जिसे हम सब लोग अपने दैनिक जीवन में बहुत बार प्रयोग में लाते है।*

*तो गौ रक्षा की बात करने से पूर्व पहले हम सबको उन सब वस्तुओ का त्याग करना चाहिए जिसके कारण गौ ह्त्या होती है, दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुओ की पहले अच्छे से परख करनी चाहिए फिर प्रयोग मे लाना।*

*कैप्सूल गोमांस gelatin. Vegetarians के बने होते है:- श्रीराजीव दीक्षितजी* https://youtu.be/l-eYup4tOoM

*दवा के नाम पर मोत का व्यापार:- श्रीराजीव दीक्षितजी:-* https://youtu.be/TtSlfDAUeyw
***********************************

*श्री राजीव दीक्षित जी के MP3 व्याख्यान के लिए प्लेय स्टोर से ऐप्स डांउनलोड करे।* https://play.google.com/store/apps/details?id=rajivdixitji.com

*अधिक जानकारी के लिये* http://www.rajivdixitmp3.com

       *you tube search " rajiv dixit "*

*आखिर कौन है श्री राजीव दीक्षित जी?* http://www.rajivdixitmp3.com/about-rajiv-bhai-dixit/

*वाट्सअप पर श्री राजीव दीक्षित जी के विचारों को प्राप्त करने के लिए 9001092092 नंबर पर सम्पर्क कर सकते हो। बात के लिए नंबर 7014872541 पर संपर्क करें।*

*अपना देश, अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा,ठ अपना गौरव।*

*मित्रों श्री राजीव दीक्षित जी ने जो- जो खुलासे किये है और जो- जो जानकारी दी है वो आज तक ना किसी राजनैतिक पार्टी ने दी है, ना किसी नेता ने और ना ही मीडिया ने। इसलिए हमारा ये फर्ज बनता है कि हम राजीव दीक्षित जी के विचारों को जन- जन तक पहुंचाये।*

   *।।स्वदेशी अपनाये, भारत को बचाये।।*
भारत रत्न श्रीराजीव दीक्षितजी को शत् शत् नमन
🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩

कहीं संस्कृत को विदेशी अपनी मातृभाषा बनाकर पैटेंट ना करवा लें....

कहीं संस्कृत को विदेशी अपनी मातृभाषा बनाकर पैटेंट ना करवा लें....
नासा के वैज्ञानिकों ने संस्कृत कई बिमारीयों को दूर करने वाली भाषा ।
अंतरिक्ष में भी सुनाई दिये संस्कृत के शब्द.... वैज्ञानिक आश्चर्य चकित ।
विदेशों में स्कूलों में कम्पलसरी सब्जेक्ट किया जा रहा है संस्कृत ।
देवभाषा संस्कृत की गूंज अंतरिक्ष में सुनाई ।
इसके वैज्ञानिक पहलू जानकर अमेरिका नासा की भाषा बनाने की कसरत में जुटा हुआ है ।
इस प्रोजेक्ट पर भारतीय संस्कृत विद्वानों के इन्कार के बाद अमेरिका अपनी नई पीढ़ी को इस भाषा में पारंगत करने में जुट गया है।
गत दिनों आगरा दौरे पर आए अरविंद फाउंडेशन [इंडियन कल्चर] पांडिचेरी के निदेशक संपदानंद मिश्रा ने ‘जागरण’ से बातचीत में यह रहस्योद्घाटन किया कि नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने 1985 में भारत से संस्कृत के एक हजार प्रकांड विद्वानों को बुलाया था। उन्हें नासा में नौकरी का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने बताया कि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है। विदेशी उपयोग में अपनी भाषा की मदद देने से उन विद्वानों ने इन्कार कर दिया था।
http://www.ibtl.in/news/international/1815/nasa-to-echo-sanskrit-in-space-website-confirms-its-mission-sanskrit/
इसके बाद कई अन्य वैज्ञानिक पहलू समझते हुए अमेरिका ने वहां नर्सरी क्लास से ही बच्चों को संस्कृत की शिक्षा शुरू कर दी है।
नासा के ‘मिशन संस्कृत’ की पुष्टि उसकी वेबसाइट भी करती है।
उसमें स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और मेहनत कर चुकी है।
साथ ही इसके कंप्यूटर प्रयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ भाषा का भी उल्लेख है।
संस्कृत के बारे में आज की पीढ़ी के लिए आश्चर्यजनक तथ्य ————-

1. कंप्यूटर में इस्तेमाल के लिए सबसे अच्छी भाषा।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1987

2. सबसे अच्छे प्रकार का कैलेंडर जो इस्तेमाल किया जा रहा है, हिंदू कैलेंडर है (जिसमें नया साल सौर प्रणाली के भूवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ शुरू होता है)
संदर्भ: जर्मन स्टेट यूनिवर्सिटी

3. दवा के लिए सबसे उपयोगी भाषा अर्थात संस्कृत में बात करने से व्यक्ति स्वस्थ और बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि जैसे रोग से मुक्त हो जाएगा। संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive Charges) के साथ सक्रिय हो जाता है।
संदर्भ: अमेरीकन हिन्दू यूनिवर्सिटी (शोध के बाद)

4. संस्कृत वह भाषा है जो अपनी पुस्तकों वेद, उपनिषदों, श्रुति, स्मृति, पुराणों, महाभारत, रामायण आदि में सबसे उन्नत प्रौद्योगिकी(Technology) रखती है।
संदर्भ: रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी, नासा आदि

(नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं)
(असत्यापित रिपोर्ट का कहना है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्तकरने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय इंडिया (भारत) में नहीं है।
5. दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (97%) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है।
संदर्भ: यूएनओ
6. नासा वैज्ञानिक द्वारा एक रिपोर्ट है कि अमेरिका 6 और 7 वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर अपनी अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके।
परियोजना की समय सीमा 2025 (6 पीढ़ी के लिए) और 2034 (7 वीं पीढ़ी के लिए) है, इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी।
7. दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1985
8. संस्कृत भाषा वर्तमान में “उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी” तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज “सरल किर्लियन फोटोग्राफी” भी नहीं है )
9. अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया वर्तमान में भरतनाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं। (नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है )
10. ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है।
लेकिन यहाँ यह बात अवश्य सोचने की है,की आज जहाँ पूरे विश्व में संस्कृत पर शोध चल रहे हैं,रिसर्च हो रहीं हैं वहीँ हमारे देश के लुच्चे नेता संस्कृत को मृत भाषा बताने में बाज नहीं आ रहे हैं अभी ३ वर्ष पहले हमारा एक केन्द्रीय मंत्री बी. एच .यू . में गया था तब उसने वहां पर संस्कृत को मृत भाषा बताया था. यह बात कहकर वह अपनी माँ को गाली दे गया, और ये वही लोग हैं जो भारत की संस्कृति को समाप्त करने के लिए यहाँ की जनता पर अंग्रेजी और उर्दू को जबरदस्ती थोप रहे हैं.
संस्कृत को सिर्फ धर्म-कर्म की भाषा नहीं समझना चाहिए-यह लौकिक प्रयोजनों की भी भाषा है. संस्कृत में अद्भुत कविताएं लिखी गई हैं, चिकित्सा, गणित, ज्योतिर्विज्ञान, व्याकरण, दशर्न आदि की महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं. केवल आध्यात्मिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि दाशर्निक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं,किन्तु रामायण,और गीता की भाषा को आज भारत में केवल हंसी मजाक की भाषा बनाकर रख दिया गया है,भारतीय फिल्मे हों या टी.वी. प्रोग्राम ,उनमे जोकरों को संस्कृत के ऐसे ऐसे शब्द बनाकर लोगों को हँसाने की कोशिश की जाती है जो संस्कृत के होते ही नहीं हैं, और हमारी नई पीढी जिसे संस्कृत से लगातार दूर किया जा रहा है,वो संस्कृत की महिमा को जाने बिना ही उन कॉमेडी सीनों पर दात दिखाती है.
अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में नर्सरी से ही बच्चों को संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है, कहीं एसा न हो की हमारी संस्कृत कल वैश्विक भाषा बन जाये और हमारे नवयुवक संस्कृत को केवल भोंडे और भद्दे मसखरों के भाषा समझते रहें. अपने इस लेख से मै भारत के यूवाओं को आह्वान करता हूँ की आने वाले समय में संस्कृत कम्पुटर की भाषा बन्ने जा रही है ,सन २०२५ तक नासा ने संस्कृत में कार्य करने का लक्ष्य रखा है. अतः अंग्रेजी भाषा के साथ साथ वे अपने बच्चों को संस्कृत का ज्ञान जरूर दिलाएं ,और संस्कृत भाषा को भारत में उपहास का कारन न बनाये ,क्यों की संस्कृत हमारी देव भाषा है ,संस्कृत का उपहास करके हम अपनी जननी का उपहास हीं करते हैं ।
          जय श्री राम ।

स्वदेशी विदेशी वस्तुओ की सूची

स्वदेशी विदेशी वस्तुओ की सूची

दन्त मंजन / पेस्ट =
स्वदेशी — विको वज्रदंती, बैद्यनाथ, चोइस, नीम, डाबर , एंकर, मिस्वाक, बबूल, प्रोमिस, दन्त कांति दन्त मंजन।
विदेशी — अधिकतर दन्त पेस्ट हड्डियों के पावडर से बनते है, जेसे कोलगेट, हिंदुस्तान यूनिलीवर ( पहले हिन्स्तान लीवर ), क्लोस-अप, पेप्सोडेंट, एम, सिबाका, एक्वा फ्रेश, एमवे, ओरल बी, क्वांटम आदि ।

टुथ ब्रश ( दन्त साफ करने का उपकरण ) ==
स्वदेशी — प्रोमिस, अजय, अजंता, मोनेट, रोयल, क्लास्सिक, डोक्टर स्ट्रोक ।
विदेशी — कोलगेट, क्लोस-अप, पेप्सोडेंट, सिबाका, अक्वा फ्रेश, ओरल-बी, हिंदुस्तान यूनिलीवर ।

बाथ सोप (स्नान करने का साबुन) ==
स्वदेशी — निरमा , मेदिमिक्स, निम्, नीमा, जस्मीन, मेसोर सेंडल, कुटीर, सहारा, पार्क अवेन्यु, सिंथोल, हिमानी ग्लिसरीन, फिर फ्लो, न १, शिकाकाई, गंगा, विप्रो, संतूर, काया कांति, काया कांति एलो वेरा ।
विदेशी — हिंदुस्तान यूनिलीवर, लो’ ओरीअल , लाइफ ब्वाय ( कोई डर नहीं ) , ले सेंसि, डेनिम, चेमी, डव, रेविओं, पिअर्स, लक्स, विवेल, हमाम, ओके, पोंड्स, क्लिअर्सिल, पमोलिवे, एमवे, जोनसन बेबी, रेक्सोना, ब्रिज , डेटोल ।

शेम्पू, ( बाल धोने के लिए ) ==
स्वदेशी — विप्रो, पार्क अवेन्यु, स्वस्तिक, आयुर, केश निखर, हेअर एंड केअर, नैसिल, अर्निका, वेलवेट, डाबर, बजाज, नेल, लेवेंडर, गोदरेज, वाटिका ।
विदेशी –हेलो कोलगेट पामोलिव, हिंदुस्तान यूनिलीवर, लक्स, क्लिनिक प्लस, रेव्लों, लक्मे, पी एंड जी , हेड एंड शोल्डर, पेंटीन, डव, पोंड्स, ओल्ड स्पेस, शोवर तो शोवर, जोहानसन बेबी ।

कपडे / बर्तन धोने का पावडर ==
स्वदेशी — टाटा शुद्ध, नीमा, सहारा, लो’ ओरीअल , निरमा, स्वस्तिक, विमल, हिपोलिन, देना, ससा, टी सीरिज, डोक्टर देत, घडी डिटर्जन, गेंतिल, उजाला, रानिपल, निरमा, चमको, दीप
विदेशी — हिंदुस्तान यूनिलीवर, सर्फ़, रीन, सनलाईट, व्हील, विम, अरिअल, टाइड, हेंको, रेविअल, एमवे, क्वांटम, वुल्वाश, इजी, रोबिन ब्लू, टिनापोल, स्काईलार्क

दाढ़ी / शेविंग बनाने की क्रीम ==
स्वदेशी — पार्क अवेन्यु, प्रिमीअम, वि जोन, लो’ ओरीअल , इमामी, बलसारा, गोदरेज
विदेशी — ओल्ड स्पाइस, पामोलिव, पोंड्स, जिलेट, एरास्मिक, डेनिम, यार्डली

दाढ़ी / शेविंग पत्ती / ब्लेड ==
स्वदेशी — टोपाज, गेलंत ( gallant), सुपरमेक्स, लसर, एस्क्वेर, सिल्वर प्रिंस, प्रिमिअम
विदेशी — जिलेट, सेवन ‘ओ’ क्लोक, एरास्मिक, विल्मेन, विल्तेज आदि

क्रीम / पावडर ==
स्वदेशी — बोरोसिल, आयुर, इमामी, विको, बोरोप्लस, बोरोलीन, हिमामी, नेल, लावेंदर, हेअर एंड केअर, निविय, हेवन्स, सिंथोल, ग्लोरी, वेलवेट (बेबी)
विदेशी — हिंदुस्तान यूनिलीवर, फेअर एंड लवली, लक्मे, लिरिल, डेनिम, रेव्लों, पी एंड जी, ओले, क्लिएअर्सिल, क्लिएअर्तोन, चारमी, पोंड्स, ओल्ड स्पाइस, डेटोल ( ले १००% श्योर) , जॉन्सन अँड जॉन्सन

वस्त्र रेडीमेड ==
स्वदेशी — केम्ब्रिज, पार्क अवेन्यु, ओक्जेम्बर्ग ( ओक्सेम्बेर्ग) बॉम्बे डाइंग, रफ एंड टफ, ट्रिगर, किलर जींस, पिटर इंग्लेंड, डीजे अँड सी ( DJ&C ) ये हमारी ही मानसिकता है की हमारी कंपनिया हमें लुभाने के लिए अपने उत्पादों का विदेशी नाम रखती है ।
विदेशी — व्रेंग्लर, नाइकी, ड्यूक, आदिदास, न्यूपोर्ट, पुमा आदि

धड़ियाँ ==
स्वदेशी — एच एम टी, टाइटन, मेक्सिमा, प्रेस्टीज, अजंता आदि
विदेशी — राडो, तेग हिवर, स्विसको, सेको, सिटिजन, केसिओ

पेन पेन्सिल ==
स्वदेशी — शार्प, सेलो, विल्सन, टुडे, अम्बेसेडर, लिंक, मोंतेक्स, स्टिक, संगीता, लक्जर, अप्सरा, कमल, नटराज, किन्ग्सन, रेनोल्ड, अप्सरा,
विदेशी — पारकर, निच्कोल्सन, रोतोमेक, स्विसएअर , एड जेल, राइडर, मिस्तुबिशी, फ्लेअर, यूनीबॉल, पाईलोट, रोल्डगोल्ड

पेय ==
स्वदेशी — दुग्ध, लस्सी, ताजे फलों के रस, निम्बू पानी,नारियल का पानी, मिल्कशेक, ठंडाई, जलजीरा, रूह अफजा, रसना, फ्रूटी, एपी फ़िज़, ग्रेपो, जम्पिं, शरबत , डावर्स , एलएमएन, जलानी जलजीरा आदि
विदेशी — ( एक घंटे में चार कोल्ड ड्रिंक पिने से मृत्यु निश्चित है ) धीमा जहर कोका कोला, पेप्सी, फेंटा स्प्राईट, थम्स-अप, गोल्ड स्पोट, लिम्का, लहर, सेवन अप, मिरिंडा, स्लाइस, मेंगोला, निम्बुज़ आदि

चाय काफी ==
स्वदेशी — टाटा, ब्रह्मपुत्र, असम, गिरनार, वाघ बकरी, दिव्य पेय
विदेशी — लिप्टन, टाइगर, ग्रीन लेबल, येलो लेबल, चिअर्स, ब्रुक बोंड रेड लेबल, ताज महल, गोद्फ्रे फिलिप्स, पोलसन, गूद्रिक, सनराइस, नेस्ले, नेस्केफे, रिच , ब्रू आदि

शिशु आहार एवं दूध पावडर ===
स्वदेशी — शहद, डाल पानी, उबले चावल, तजा फलों का रस, अमूल, इंडाना, सागर, तपन, मिल्क केअर
विदेशी — नेस्ले, लेक्टोजन सेरेलेक, एल पी ऍफ़, मिल्क मेड, नेस्प्रे, ग्लेक्सो, फेरेक्स

कुल्फी / आइसक्रीम ==
स्वदेशी — घर की बनी कुल्फी, अमूल, वाडीलाल, दिनेश, हवमोर, गोकुल, दिनशा, जय , पेस्तोंजी
विदेशी — वाल्स, क्वालिटी, डोलोप्स, बास्किन एंड रोबिनस, केडबरी.. अधिकतर आइसक्रीम में जनवरी की आंतो की परत होती है

नमक ==
स्वदेशी — टाटा, अंकुर , सूर्य, ताजा, तारा, निरमा, सेंधव नमक.
विदेशी — अन्नपुर्णा , आशीर्वाद आटा, केप्टन कुक, हिंदुस्तान लीवर , किसान, पिल्सबरी आदि

नमकीन / स्नेक्स / चिप्स ==
स्वदेशी — बीकाजी, बिकानो, हल्दीराम, बालाजी, हिपो , पार्ले, A1, गार्डन आदि
विदेशी — अंकल चिप्स, पेप्सी, रफेल्स, होस्टेस, फन्मच, कुरकुरे, लेज आदि

टमाटर सौस, चटनिया, फ्रूट जेम ==
स्वदेशी — घर के बने हुए चटनिया, इंडाना, प्रिया, रसना, फ्रूट जाम, टिल्लूराम , मनोज, सिल, निलंस, रसना, कर्नल, पंतजलि
विदेशी — नेस्ले, ब्रुक बोंड, किसान, हेंज, फिल्ड फ्रेश, मेगी सौस

चोकलेट / दूध पावडर ==
स्वदेशी — गुड के साथ मूंगफली या बादाम लाभप्रद है, पार्ले, बेक्मंस, क्रिमिचा, शंगरीला, इंडाना, अमूल, रावलगाँव, ब्रिटानिया.
विदेशी — अधिकतर चोकलेट में अर्सेलिक जहर मिला होता है केडबरी, बोर्नविटा , होर्लिक्स, न्यूट्रिन, विक्स, मिल्किबर, इक्लेअर्स , मंच, पार्क, डेरिमिल्क, बोर्नविले, बिग बबल, एलपेनलिबें, सेंटरफ्रेश, फ्रूट फ्रेश, परफीती आदि

रेडीमेड खाना ==
स्वदेशी — घर का खाना, हाथो से बनाया हुआ या किसी पास के स्वच्छ शाकाहारी होटल का
विदेशी — मेगी, हेंज, नौर , डोमिनोज, पिज्जा हट , फ्रिन्तो-ले

पानी ==
स्वदेशी — घर का उबला हुआ पानी, बिसलेरी, हिमालय, रेल नीर, यस, गंगा आदि
विदेशी — एक्वाफिना, किनली, बिल्ले, पुरे लाइफ, एवियन, सेन पिल्ग्रिमो, पेरिअर आदि

शक्तिवर्धक ===
स्वदेशी — च्यवनप्राश सबसे उत्तम ८०% तक , न्युत्रमुल, मल्तोवा, अमृत रसायन, बादाम पाक. आदि
विदेशी — बूस्ट, पोलसन, बोर्नविटा, होर्लिक्स, प्रोतिनेक्स, स्प्राउट्स, कोमप्लैन

इलेक्ट्रोनिक्स वस्तु ==
स्वदेशी — ओनिडा, बी पी एल, विडियोकोन, अकाई ( आज कल नाम सुनने को नहीं मिलता ) , टी- सीरिज , सलोरा, वेस्टर्न, क्रोवन, टेक्सला, गोदरेज उषा, ओरीअंट, खेतान, पी एस पी औ, बजाज, सिन्नी, शंकर, टी-सीरिज, क्राम्पटन,
विदेशी —- सोनी, फिलिप्स, हुंदा , सेन्सुई, शार्प, एलजी, देवू , सेन्यो, नेशनल पेनासोनिक केनवुड, थोमसन, सेमसंग, हिताची, तोशिबा, कोनिका, पयोनिअर, केल्विनेटर, वर्ल्फुल, इलेक्ट्रोलक्स आई ऍफ़ बी, हायर सिंगर, महाराजा, जी इ, रेलिमिक्स, केनस्टार, मृत, ब्रोउन, नेशनल, फिलिप्स

मोबाइल फ़ोन / सेवाए ===
स्वदेशी — मेक्स, ओनिडा, माइक्रोमेक्स, उषा-लक्सस, अजंता, ओर्पट, आइडिया, एअरटेल, रिलाइंस, टाटा इंडिकोम, एमटीएनएल, लूप, कार्बन, लावा, लेमन, भारती बीटल
विदेशी — नोकिया, फ्लाई, मोटोरोला, एचटीसी, सोनी एरिक्सन, एसर, वर्जिन, वोडाफोन, एम टी एस , एल जी, सेमसंग, हायर, डॉकोमो आदि

खाद्य तेल सरसों का तेल ====
स्वदेशी —-, कच्ची घानी का तेल,
विदेशी —- डालडा ब्रांड, आई टी सी ब्रांड, हिंदुस्तान यूनिलीवर ब्रांड, फिल्ड फ्रेश ब्रांड के सभी वस्तुओ का बहिष्कार करे

कंप्यूटर ===
स्वदेशी — एच सी एल, विप्रो
विदेशी —- तोशिबा, एसर, एच पी, डेल, लिनोवो, सेमसंग, सोनी, आई. बी. एम. कोम्पेक आदि

दुपहिया वाहन ====
स्वदेशी —- हीरो, बजाज ( बजाज स्कूटर के बारे में सबको पता है, एक्टिवा से कड़ी टक्कर मिलने के कारण बजाज स्कूटर की जगह एक्टिवा दीखता है हमारी सडको पर,) टी वि एस, महिंद्रा, काइनेटिक
विदेशी — कावासाकी, होंडा, हुंडई, एक्टिवा, इटरनो, रोयल एनफील्ड, हर्ली डेविडसन, स्प्लेंडर , पेशन

वाहन ===
स्वदेशी — लेंड रोवर, जगुआर, इंडिका, नेनो, टाटा मेजिक, बोलेरो, सुमो, सफारी, प्रेमिअर, अम्बसेदर, अशोक लेलेंड, स्वराज, महिंद्रा ट्रेक्टर, जाइलो, रेवा, अतुल, टी.व्ही.एस
विदेशी — हुंडई, सेंट्रो, वोल्सवेगन, मर्सडीज, टोयोटा, निसान, स्कोडा, रोल्स रोयस, फेंटम, फोर्ड, जनरल, शेर्वोलेट, जोन डिअर, मारुति सुजुकी, लोगन

बैंक ===
स्वदेशी — इलाहाबाद बैंक, बैंक ऑफ़ बड़ोदा, बैंक ऑफ़ इंडिया, बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र, आई डी बी आई, केनरा बैंक, सेन्ट्रल बैंक, देना बैंक, कोर्पोरेशन बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसिस बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, सिंडिकेट बैंक, युको बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक, यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया, युनाइटेड बैंक ऑफ़ इंडिया, विजया बैंक, आंध्र बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, कोटक महिंद्रा, एक्सिस बैंक, यस बैंक, इडुसलेंड बैंक, धनलक्ष्मी, बैंक, सारस्वत बैंक, फेडरल बैंक, आई एन जी वैश्य बैंक, करुर वैश्य बैंक, कर्नाटका बैंक , लक्ष्मी विलाश बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ बीकानेर एंड जयपुर, साउथ इंडियन बैंक, नैनीताल बैंक आदि
विदेशी —- बैंक एचडीएफसी (HDFC), आई.सी.आई.सी.आई ( ICICI ), एबीएन एमरो, अबू धाबी बैंक, बीएनपी परिबास, सिटी बैंक, डच बैंक (Deutsche Bank), एच इस बी सी (HSBC), जे पि मोर्गन, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, तयब बैंक, स्कोटिया बैंक, अमेरिकन एक्सप्रेस बैंक, एंटवर्प बैंक, अरब बंगलादेश, बैंक ऑफ़ अमेरिका, बहरीन कुवैत, टोक्यो मित्सुबिशी बैंक, बार्कले बैंक, चाइना ट्रस्ट, क्रुंग थाई बैंक, सोनाली बैंक, शिन्हन बैंक, ओमान इंटरनेशनल बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ मौरिशश, डी बैंक ऑफ़ न्युयोर्क, ऑस्ट्रेलियन बैंक, फोर्टिस बैंक, कोमन वेल्थ बैंक, रोयल बैंक ऑफ़ कनाडा, अमीरात बैंक, जर्मन बैंक,

जूते / चप्पल ===
स्वदेशी — लिबर्टी, लखानी, स्काई, भारत लेदर, एक्शन, रिलेक्सो, पेरगोन, पोद्दार, वाइकिंग, बिल्ली, कार्नोबा, डीजे अँड सी ( DJ&C ), बफेलो, रिग
विदेशी — पुमा, बाटा, पॉवर, बीएमसी, एडीडास, नाइकी, रिबोक, फीनिक्स, वुडलेंड, लाबेल, चेरी ब्लोसम, कीवी, ली कूपर, रेड चीफ, कोलंबस

ऐसी विदेशी कंपनियाँ भी है जिसमे आधे से भी कम % भारतीय पैसा लगा हुआ है तो वे भी विदेशी हुई, इसी तरह भारतीय कंपनी मे विदेशी ५०% से ज्यादा पैसा लगा है तो वह विदेशी है,  आप यह पता भी लगाए की आप जिस कंपनी का माल खरीद रहे है है क्या वह पूर्णतया स्वदेशी है ? जेसे मारुति कंपनी मे ५४% पैसा सुजुकी कंपनी का है , और अब सरकार का इस कंपनी मे कुछ भी हिस्सा नहीं है, उसने अपना १८% हिस्सा भी शिक्षण संस्थानो को बेच दिया ! ये जरूरी नहीं की बिग बाजार कुछ विदेशी ब्रांड को अपने मॉल / ब्रांड के तले बेचता हो तो वे स्वदेशी है…

ललित कुमार रायसेन (म.प्र.) 8878382418

भारत : राजनीति का आयरिश कनेक्शन

भारत : राजनीति का आयरिश कनेक्शन

By :- आनंद कुमार

भारत में मार्च के अंत का दौर अलग अलग पार्टियों द्वारा सरदार भगत सिंह को हथियाने की कोशिशों का होता है। इसकी वजह से ज्यादातर लोगों ने उनकी पार्टी का नाम “हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी” (HRA) सुना-पढ़ा होगा। ये नाम उन्होंने आयरिश रिपब्लिकन आर्मी से प्रेरित होकर रखा था। बाद में इसी में सोशलिस्ट शब्द भी जोड़ा गया। आयरिश आंदोलनों से सिर्फ भगत सिंह प्रभावित नहीं हुए थे, उसका भारत पर और भी प्रभाव पड़ा था। जब 1870-90 के दौर में आयरिश लैंड वॉर चल रहा था तो स्थिति करीब करीब वैसी ही थी जैसी फिरंगी हुक्मरानों ने भारतीय किसानों की बना रखी थी।



सन 1880 में फसलें बहुत खराब हुई थी और एक जमींदार, लार्ड अर्ने के किसानों को बड़ी दिक्कत हो रही थी। आयरलैंड के काउंटी मायो में बल्लिनरोब के इलाके के पास लार्ड अर्ने की जमींदारी ही लेकिन वो वहां पर कम ही रहते थे। लिहाजा उनका काम काज देखने वाले कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट से किसानों ने बात की। वो “लगान” में कुछ छूट की मांग लेकर आये थे। लार्ड अर्ने ने दस प्रतिशत की छूट घोषित की, लेकिन किसान उस से संतुष्ट नहीं थे। वो 25% की छूट चाहते थे। कैप्टेन चार्ल्स ने पूरा “लगान” ना चुकाने वाले ग्यारह किसानों को निकाल बाहर करने का फैसला किया। इस खबर से बल्लिनरोब के लोउघ मास्क नाम की उस जमींदारी में हलचल मच गई।



उसी दौर में वहां पहुचे चार्ल्स स्टीवर्ट पर्नेल ने इलाके के लोगों से अपील की कि शांति बनाए रखें। जमीनें किसानों से खाली किये जाने के खिलाफ हिंसा करने के बदले बहिष्कार का सहारा लें। पर्नेल के भाषण में जमींदारों या उसके बिचौलियों का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन जैसे ही कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट ने ग्यारह किसानों से जमीन खाली करवाने की कोशिश की, ये बहिष्कार उसपर ही लागू हो गया। स्थानीय लोगों को दिक्कत तो हुई लेकिन कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट के लिए पूरी आफत खड़ी हो गई। उसके खेतों में फसल काटने के लिए कोई ना था। अस्तबलों और घर में भी काम करने के लिए कोई तैयार नहीं होता। स्थानीय व्यापारियों ने उसके साथ सौदा करने से इनकार कर दिया। और तो और, डाकिये ने उसके घर चिट्ठियां पहुँचाने से भी मना कर दिया।



अब चूँकि खेतों में फसल काटने के लिए कोई स्थानीय आदमी तैयार नहीं था, इसलिए दूर कहीं के केवन और मोनाघन से 50 लोगों को बॉयकाट ने बुलवाया। उनकी सुरक्षा जरूरी थी, कहीं स्थानीय लोग बाहर से आये मजदूरों से मार-पीट ना करें, इसलिए सुरक्षा के लिए उनके साथ हज़ार पुलिसकर्मी-सैनिक भी आये। स्थानीय लैंड लीग (land league) के नेताओं ने पहले ही कह दिया था कि बहिष्कार अहिंसक है, कोई हिंसा हुई भी नहीं। नतीजा ये हुआ कि जितनी फसल की कीमत नहीं थी, उतना खर्चा हज़ार सुरक्षाकर्मी लगाने में हो गया ! ऊपर से सैनिक लाकर दबाव बनाने से भड़के स्थानीय लोगों ने बहिष्कार आगे भी जारी रखा।

थोड़े ही दिनों में बहिष्कार की वजह से सब कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट का नाम जानने लगे। न्यू यॉर्क ट्रिब्यून के एक रिपोर्टर जेम्स रेडपाथ ने सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय ख़बरों में बॉयकाट के बारे में लिख दिया। आयरिश लेखक जॉर्ज मूर ने कहा कि “एक धूमकेतु की तरह बॉयकाट विशेषण उभर आया”। नवम्बर 1880 में समाज के सामूहिक बहिष्कार, बोलें तो, हुक्का पानी बंद के लिए ‘द टाइम्स’ ने बॉयकाट शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया। माइकल डेविट की “द फॉल ऑफ़ फ्यूडलिस्म इन आयरलैंड” में भी बॉयकाट शब्द का जिक्र है। “द डेली न्यूज़” दिसम्बर 1880 में इस शब्द का इस्तेमाल करने लगा था। यानि जिन किसानों के अस्तित्व को स्वीकारने से ही मना कर दिया था, उन्होंने बॉयकाट का मतलब ही 1881 की जनवरी तक बदल डाला था।



आयरिश क्रांति का प्रभाव सिर्फ सरदार भगत सिंह की क्रन्तिकारी पार्टी पर ही नहीं पड़ा था, सविनय अवज्ञा के गांधीवादी तरीकों में जिस बॉयकाट का इस्तेमाल होता है वो शब्द भी वहीँ से आया है। भारत का पिछला स्वतंत्रता आन्दोलन देखेंगे तो पता चलेगा कि 1940 के दशक में जब गांधीजी कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर अलग हो चुके थे, उस वक्त भी आंदोलनों में कई लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे। गांधीजी कांग्रेस में नहीं थे, इसलिए कांग्रेस की वर्किंग कमिटी की बैठक, सन 1942 में वर्धा में हुई थी। गांधीजी कांग्रेस छोड़ने के बाद वर्धा, महाराष्ट्र में रहते थे। चूँकि गांधीजी वर्धा में रहते थे, इसलिए वर्धा को “गांधीवादी जिला” बनाने की कोशिशें 1980 के दौर में भी की गई थी। वो अभी भी महाराष्ट्र का शराबबंदी वाला इलाका है, वहां शराब बेचना-पीना कानून जुर्म है।



इन अजीबोग़रीब वाकयों की वजह से 1940-47 के बीच और उसके बाद पुलिस की गोली से मरे दस हज़ार से ज्यादा स्वतंत्रता सेनानियों का कोई नाम भी नहीं लेता। नाम इसलिए भी नहीं लिया जाता क्योंकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सिर्फ कॉमरेडों के आकाओं का नाम लेने की परंपरा है। नेहरु के इस बगलबच्चा गिरोह ने कभी हमारी आजादी के लिए वीरगति को प्राप्त हुए हुतात्माओं को सम्मान देना जरूरी ही नहीं समझा। आश्चर्यजनक ये भी है कि समय के चक्र पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। भारत में जो 1720-50 के दौर में हुआ ठीक वही राष्ट्रवाद का ज्वर 1820-50 में आया, फिर से वो 1920-50 के दौर में दिखा। जो कभी 1990 में सोचा भी नहीं होगा, सन 2020 आते आते भारतीय फिर से बॉयकाट का इस्तेमाल करते दिखने लगे हैं। फिल्मों और कंपनियों पर इसका लागू होना सिर्फ शुरुआत भर है।



बिहार-बंगाल की राजनैतिक स्थितियां फिर से बॉयकाट को आमंत्रित कर रही हैं। चम्पारण आन्दोलन के सौ साल मनाने की जल्दी में सुशासन बाबू उन किसानों को भूल रहे हैं, जिन्होंने भूखे रहकर ये लड़ाई लड़ी थी। स्थानीय किसान नेताओं को गायब कर रहे हैं जिनके घरों के सामने से गुजरने पर रिक्शे वाले बताते जाते हैं कि फलां बाबु यहीं रहते थे। कांग्रेस तो खैर चार कदम और आगे है, चम्पारण आन्दोलन की जयंती मानाने आ रहे राहुल गाँधी के सम्मान में पोस्टर लगाये गए हैं। उसपर राजमाता और युवराज तो हैं, चम्पारण आन्दोलन भी लिखा है, मगर गांधीजी ही गायब हो गए हैं। पोस्टर नब्बे के दशक से पहले के नोट जैसे लगते हैं जिसपर गांधीजी नहीं होते थे।



बाकी आँखें खुली हो तो देखने की कोशिश कीजिये, बिना शोर मचाये, बिना किसी शिकायत जनता कैसे कब “बॉयकाट” कर जाती है, वो भी दिखने लगेगा। अभिजात्यों की इस जय-जयकार में आम आदमी की आवाज कहीं सुनाई देती है क्या ?

एक_हजार_वर्ष_पूर्व_रूस_में_था_हिन्दू_धर्म

#एक_हजार_वर्ष_पूर्व_रूस_में_था_हिन्दू_धर्म?

एक हजार वर्ष पहले रूस ने ईसाई धर्म स्वीकार किया। माना जाता है कि इससे पहले यहां असंगठित रूप से हिन्दू धर्म प्रचलित था और उससे पहले संगठित रूप से वैदिक पद्धति के आधार पर हिन्दू धर्म प्रचलित था। वैदिक धर्म का पतन होने के कारण यहां मनमानी पूजा और पुजारियों का बोलबाला हो गया अर्थात हिन्दू धर्म का पतन हो गया। यही कारण था कि 10वीं शताब्दी के अंत में रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर चाहते थे कि उनकी रियासत के लोग देवी-देवताओं को मानना छोड़कर किसी एक ही ईश्वर की पूजा करें।

उस समय व्लादीमिर के सामने दो नए धर्म थे। एक ईसाई और दूसरा इस्लाम, क्योंकि रूस के आस-पड़ोस के देश में भी कहीं इस्लाम तो कहीं ईसाइयत का परचम लहरा चुका था। राजा के समक्ष दोनों धर्मों में से किसी एक धर्म का चुनाव करना था, तब उसने दोनों ही धर्मों की जानकारी हासिल करना शुरू कर दी।

उसने जाना कि इस्लाम की स्वर्ग की कल्पना और वहां हूरों के साथ मौज-मस्ती की बातें तो ठीक हैं लेकिन स्त्री स्वतंत्रता पर पाबंदी, शराब पर पाबंदी और खतने की प्रथा ठीक नहीं है। इस तरह की पाबंदी के बारे में जानकर वह डर गया। खासकर उसे खतना और शराब वाली बात अच्छी नहीं लगी। ऐसे में उसने इस्लाम कबूल करना रद्द कर दिया।

इसके बाद रूसी राजा व्लादीमिर ने यह तय कर लिया कि वह और उसकी कियेव रियासत की जनता ईसाई धर्म को ही अपनाएंगे। ईसाई धर्म में किसी भी तरह की पाबंदी की चर्चा नहीं थी। लोगों को स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार था और उनमें किसी भी प्रकार का सामाजिक भय भी नहीं था। उसने ईसाई धर्म अपनाने के लिए यूनानी वेजेन्टाइन चर्च से बातचीत करनी शुरू कर दी। वेजेन्टाइन चर्च कैथोलिक ईसाई धर्म से थोड़ा अलग है और उसे मूल ईसाई धर्म या आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म कहा जाता है। इस तरह रूस के एक बहुत बड़े भू-भाग पर ईसाई धर्म की शुरुआत हुई।

रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर ने जब आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और अपनी जनता से भी इस धर्म को स्वीकार करने के लिए कहा तो उसके बाद भी कई वर्षों तक रूसी जनता अपने प्राचीन देवी और देवताओं की पूजा भी करते रहे थे। बाद में ईसाई पादरियों के निरंतर प्रयासों के चलते रूस में ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो सका है और धीरे-धीरे रूस के प्राचीन धर्म को नष्ट कर दिया गया।

प्राचीनकाल के रूस में लोग जिन शक्तियों की पूजा करते थे, उन्हें तथाकथित विद्वान लोग अब प्रकृति-पूजा कहकर पुकारते हैं। प्रकृति-पूजकों के लिए तो सूरज भी ईश्वर था और वायु भी ईश्वर थी और प्रकृति में होने वाला हर परिवर्तन, प्रकृति की हर ताकत को वे ईश्वर की हरकत ही समझते थे।

वे अग्नि, सूर्य, पर्वत, वायु या पवित्र पेड़ों की पूजा किया करते थे जैसा कि आज भारत में हिन्दू करता है। हालांकि वे प्रकृति को सम्मान देने के अलावा यह भी मानते थे कि कोई एक ईश्‍वर है जिसके कारण संपूर्ण संसार संचालित हो रहा है।

सबसे प्रमुख देवता थे- विद्युत देवता या बिजली देवता। आसमान में चमकने वाले इस वज्र-देवता का नाम पेरून था। कोई भी संधि या समझौता करते हुए इन पेरून देवता की ही कसमें खाई जाती थीं और उन्हीं की पूजा मुख्य पूजा मानी जाती थी। विद्वानों का कहना है कि प्राचीनकाल में रूसियों द्वारा की जाने वाली प्रकृति की यह पूजा बहुत कुछ हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों और रस्मों से मिलती-जुलती थी।

प्राचीनकाल में रूस के दो और देवताओं के नाम थे- रोग और स्वारोग। सूर्य देवता के उस समय के जो नाम हमें मालूम हैं, वे हैं- होर्स, यारीला और दाझबोग।

सूर्य के अलावा प्राचीनकालीन रूस में कुछ मशहूर देवियां भी थीं जिनके नाम हैं- बिरिगिन्या, दीवा, जीवा, लादा, मकोश और मरेना। प्राचीनकालीन रूस की यह मरेना नाम की देवी जाड़ों की देवी थी और उसे मौत की देवी भी माना जाता था। हिन्दी का शब्द मरना कहीं इसी मरेना देवी के नाम से तो पैदा नहीं हुआ? हो सकता है न? इसी तरह रूस का यह जीवा देवता कहीं हिन्दी का ‘जीव’ ही तो नहीं? ‘जीव’ यानी हर जीवंत आत्मा। रूस में यह जीवन की देवी थी।

रूस में आज भी पुरातत्ववेताओं को कभी-कभी खुदाई करते हुए प्राचीन रूसी देवी-देवताओं की लकड़ी या पत्थर की बनी मूर्तियां मिल जाती हैं। कुछ मूर्तियों में दुर्गा की तरह अनेक सिर और कई-कई हाथ बने होते हैं। रूस के प्राचीन देवताओं और हिन्दू देवी-देवताओं के बीच बहुत ज्यादा समानता है। यह हो सकता है कि रूस में भी पहले लोग हिन्दू ही होंगे। लेकिन बाद में वे ईसाई और मुसलमान हो गए। लेकिन रूस के प्राचीन धर्म के बहुत से निशान अभी भी रूसी संस्कृति में बाकी रह गए हैं। रूस के विद्वान अक्सर इस बारे में लिखते हैं और इस ओर इशारा करते हैं कि रूस का पुराना धर्म और हिन्दू धर्म करीब-करीब एक जैसे हैं।

 #कुछ_प्रमाण :--
वोल्गा क्षेत्र में मिली विष्णु की मूर्ति : कुछ वर्ष पूर्व ही रूस में वोल्गा प्रांत के स्ताराया मायना (Staraya Maina) गांव में विष्णु की मूर्ति मिली थी जिसे 7-10वीं ईस्वी सन् का बताया गया। यह गांव 1700 साल पहले एक प्राचीन और विशाल शहर हुआ करता था। स्ताराया मायना का अर्थ होता है गांवों की मां। उस काल में यहां आज की आबादी से 10 गुना ज्यादा आबादी में लोग रहते थे। माना जाता है कि रूस में वाइकिंग या स्लाव लोगों के आने से पूर्व शायद वहां भारतीय होंगे या उन पर भारतीयों ने राज किया होगा।

महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है। कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी। उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। महाभारत में उत्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है।

अर्जुन के बाद बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख मिलता है। यह विष्णु की मूर्ति शायद वही मूर्ति है जिसे ललितादित्य ने स्त्री राज्य में बनवाया था। चूंकि स्त्री राज्य को उत्तर कुरु के दक्षिण में कहा गया है तो शायद स्ताराया मैना पहले स्त्री राज्य में हो। खैर...!

2007 को यह विष्णु मूर्ति पाई गई। 7 वर्षों से उत्खनन कर रहे समूह के डॉ. कोजविनका कहना है कि मूर्ति के साथ ही अब तक किए गए उत्खनन में उन्हें प्राचीन सिक्के, पदक, अंगूठियां और शस्त्र भी मिले हैं।

मौजूदा रूस की जगह पहले ग्रैंड डची ऑफ मॉस्को का गठन हुआ। आमतौर से यह माना जाता है कि ईसाई धर्म करीब 1,000 वर्ष पहले रूस के मौजूदा इलाके में फैला। यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी के प्रख्यात विद्वान डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार रूसी भाषा के करीब 2,000 शब्द संस्कृत मूल के हैं।

यूक्रेन की राजधानी कीव से भी पहले का यह गांव 1,700 साल पहले आबाद था। अब तक कीव को रूस के सभी शहरों की जन्मस्थली माना जाता रहा है, लेकिन अब यह अवधारणा बदल गई है।

ऊल्यानफस्क स्टेट यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग के रीडर डॉ. एलिग्जैंडर कोझेविन ने सरकारी न्यूज चैनल को बाताया कि हम इसे अविश्वनीय मान सकते हैं, लेकिन हमारे पास इस बात के ठोस आधार मौजूद हैं कि मध्यकालीन वोल्गा क्षे‍त्र प्राचीनकालीन रूस की मुख्य भूमि है।

डॉ. कोझेविन पिछले साल साल से मैना गांव की खुदाई से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि वोल्गा की सहायक नदी स्तराया के हर स्क्वैयर मीटर जमीन अपने आप में अनोखी है और पुरातत्व का खजाना मालूम होती है।

#साभार

अज्ञेय आत्मन की वॉल से

भारत और चीन का सांस्कृतिक इतिहास एवं सम्बन्ध...

भारत और चीन का सांस्कृतिक इतिहास एवं सम्बन्ध...

Written by :- रवि शंकर

भारत और चीन दोनों पड़ोसी देश ही नहीं हैं, बल्कि दोनों में काफी कुछ साझा भी है। जब भी विश्व की प्राचीन सभ्यताओं की चर्चा होती है, भारत के साथ चीन का ही नाम लिया जाता है।

आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से चीन भारत के सर्वाधिक नजदीक माना जाता है। विश्व को अधिकांश तकनीकें इन्हीं दोनों देशों ने दी हैं। विश्व व्यापार पर कई हजार वर्षों तक इन्हीं दोनों देशों का कब्जा रहा है और आज फिर विश्व व्यापार पर इनका कब्जा होने वाला है। स्वाभाविक ही है कि भारत और चीन अच्छे पड़ोसी होते। दुर्भाग्यवश ऐसा है नहीं। मित्रता और शांति के सभी प्रयासों के बाद भी चीन भारत का शत्रु ही बना हुआ है। ऐसा क्यों है? और प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर हम चीन के साथ कैसा संबंध रखें? उसके साथ हम कैसा व्यवहार करें? क्या वास्तव में भारत और चीन के संबंध ऐतिहासिक रूप से प्राचीन हैं? क्या भारत और चीन की संस्कृति में कुछ साझा भी है?

यहां हमें यह समझने की आवश्यकता है कि चीन सामान्य पड़ोसी देश नहीं है, वह एक आक्रामक पड़ोसी है। वह लगातार भारत के अनेक भूभागों पर दावा ठोकता रहा है और उसने वर्ष 1962 में आक्रमण करके भारत के एक विशाल भूभाग पर कब्जा भी कर रखा है। पाकिस्तान ने भी उसे भारत से कब्जाए गए प्रदेश में से एक भाग सौंप रखा है। अभी भी अरुणाचल प्रदेश पर चीन ने दावा ठोंकना बंद नहीं किया है। अभी हाल तक चीन अपने यहां नक्शे में अरुणाचल प्रदेश को चीन में ही दिखाता रहा है। ऐसे में कोई भी रणनीति बनाने से पहले हमें चीन के इतिहास और वर्तमान दोनों को ही ठीक से ध्यान में रखना होगा। भारत द्वारा मित्रता के निरंतर प्रयासों के बाद भी आखिर क्यों चीन लगातार भारत के साथ संघर्ष की स्थिति बनाए हुए है? इस प्रश्न को समझने के लिए हमें चीन के इतिहास को ठीक से खंगालना होगा। तभी हम उसकी इस मनोवृत्ति की पृष्ठभूमि को समझ पाएंगे और उसका निराकरण भी कर पाएंगे।

चीन के मिथक
सबसे पहले हमें चीन के बारे में कुछ मिथकों को सुधार लेना चाहिए। वर्तमान चीन का क्षेत्रफल भारत से लगभग तीन गुणा है। परंतु चीन की जनसंख्या भारत से थोड़ी सी ही अधिक है। समझने की बात यह है कि चीन आज जितना बड़ा हमें दिखता है, वह वास्तव में उतना बड़ा है नहीं। चीन का वास्तविक प्रदेश भारत जितना ही है। यदि हम इतिहास में थोड़ा और पीछे जाएंगे तो चीन भारत जितना भी नहीं रहा है। बारहवीं शताब्दी से पहले तक उसका वास्तविक क्षेत्रफल भारत से काफी छोटा रहा है। इसे हम विभिन्न शताब्दियों में चीन के नक्शे से समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए आभ्यंतर मंगोलिया, तिब्बत, शिन ज्याङ् और मांचूरिया कभी भी चीन का हिस्सा नहीं रहे।

चीन का मूल प्रदेश हान प्रदेश है। इसका क्षेत्रफल भारत के बराबर है। हान जाति ही मूल चीनी जाति है। हानों की संस्कृति ही मूल चीनी संस्कृति है। और हानों का प्रदेश काफी सीमित रहा है। इन पर तुर्क, मंगोल और मांचू जातियों ने शताब्दियों तक राज किया। परंतु जैसे ही इनके राज्य समाप्त हुए, चीन ने इनके प्रदेशों को हड़प लिया। परिणामस्वरूप आज चीन में तुर्क, मंगोल और मांचू प्रदेश भी शामिल है। यही कारण भी है कि चीन में इन सभी क्षेत्रों में खासकर शिन ज्याङ् और तिब्बत में चीन विरोधी प्रदर्शन हमेशा चलते रहते हैं जो कभी-कभी हिंसक रूप भी ले लेते हैं। मंगोलिया के अलावा शेष प्रदेशों के नाम चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने बदल दिए हैं। संभवतः वे उन क्षेत्रों की जनता को अपना इतिहास भुलवा देना चाहते होंगे। तुर्किस्तान का नाम शिन ज्याङ् रखा है जिसका अर्थ होता है नया प्रदेश। मांचू प्रदेश को मंचु कुओ के पुराने नाम से पुकारने की बजाय तीन प्रदेशों में बांट कर ल्याओ निङ्, कीरिन और हाइ लुङ् ज्याङ् नाम दिया गया है। तीनों को मिला कर उत्तर पूर्वी प्रदेश कहा जाता है। इसी प्रकार चीन ने तिब्बत को भी तीन भागों में बांट दिया है। तिब्बत, छाम्दो और चिङ् हाइ। मूलतः हान और वर्तमान कम्यूनिस्ट चीन ने इन सभी क्षेत्रों को अपने रंग में रंगने की भरपूर कोशिशें की हैं।

बहरहाल, चीन देश का उल्लेख भारत में पुराणों के अलावा कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी पाया जाता है। चाणक्य ने चीन से रेशम का व्यापार किये जाने की चर्चा की है। चीन का नाम भी वहां का अपना नहीं है। चीन शब्द संस्कृत भाषा का है चीनी भाषा का नहीं। चीन का वहां की भाषा में नाम है झोंगुओ जिसका अर्थ होता है मध्य प्रदेश। सीधी-सी बात है कि दुनिया चीन को भारतीय नाम से ही जानती और पुकारती है और वे स्वयं भी अपनी भाषा के नाम की बजाय भारतीय भाषा के नाम को ही स्वीकारते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि चीन भी कभी भारत का ही एक प्रदेश रहा होगा। महाभारत में एक स्थान पर संजय धृतराष्ट्र को उनके विशाल साम्राज्य का स्मरण दिलाते हैं, तो उसमें चीन देश का भी नाम लेते हैं। इससे प्रतीत होता है कि कम से कम महाभारत के काल में तो चीन भारत का ही एक प्रदेश रहा होगा। यदि वह भारत का प्रदेश न भी रहा हो तो भी इतना तो इससे साफ हो जाता है कि चीन को भारत के द्वारा ही दुनिया ने जाना और समझा था। इसीलिए उसका भारतीय नाम ही प्रसिद्ध हुआ। यदि हम चीन के वर्तमान विभिन्न भूराजनीतिक तथा भूसांस्कृतिक क्षेत्रों की पड़ताल करें, यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाएगी।
तिब्बत और भारत

वर्तमान चीन का एक बड़ा भाग है तिब्बत। तिब्बत का उल्लेख भारतीय ग्रंथों में त्रिविष्टप के नाम से पाया जाता है। त्रिविष्टप से ही तिब्बत शब्द बना है। तिब्बत और भारत के सांस्कृतिक संबंधों को तो बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता है। वर्ष 1951 से पहले तक तिब्बत एक अलग राज्य था जो सांस्कृतिक रूप से पूरी तरह भारत का अंग था। तिब्बत के निवासी भारतीय मूल के बौद्ध मत को मानते रहें हैं। तिब्बती भाषा में संस्कृत और पाली के बड़ी संख्या में अनुवादित ग्रंथ पाए जाते हैं जिनमें से कई तो अभी मूल रूप में अप्राप्य हो चुके हैं। तिब्बत वर्ष 1950 तक चीन का हिस्सा नहीं रहा है और यदि भारतीय नेताओं ने थोड़ी समझदारी दिखाई होती तो आज भी वह चीन का हिस्सा नहीं होता। इतिहास देखें तो भी मंगोलों के शासन के अलावा तिब्बत कभी भी चीन का हिस्सा नहीं रहा। दुखद बात यह है कि जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तो भारत की तत्कालीन सरकार ने तिब्बत का सहयोग नहीं किया। आज भी तिब्बत की निर्वासित सरकार का केंद्र भारत में ही है।

शिन ज्याङ् और खोतान

तिब्बत के अलावा वर्तमान चीन का एक बड़ा भूभाग है शिन ज्याङ्। यह वास्तव में तुर्किस्तान है जिसे चीनी तुर्किस्तान भी कहा जाता है। शिन ज्याङ् भी एक भारतीय राज्य रहा है। यहां हजार वर्ष लंबे बौद्ध राज्य के होने के पुरातात्विक प्रमाण बड़ी संख्या में पाए गए हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से यह पूरा प्रदेश खोतान कहा जाता था। तिब्बती और भारतीय स्रोतों से ज्ञात होता है कि खोतान आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले तक एक वीरान प्रदेश था। एक वर्णन के अनुसार मौर्य शासकों के काल में अशोक ने हिमालयी क्षेत्रों में बसे लोगों से नाराज होकर उन्हें इधर भेज दिया था। उन्हीं भारतीय लोगों, जिनकी संख्या लगभग 7000 बताई जाती है, ने खोतान को बसाया। उसके कुछ समय पश्चात् चीन से लोगों का एक समूह भी खोतान के पूर्वी इलाके में आकर बस गया। कालांतर में खोतान पर प्रभुत्व के लिए दोनों गुटों में संघर्ष हुआ और बाद में दोनों ने मिल कर शासन करना स्वीकार किया। परंतु खोतान पर सांस्कृतिक रूप से भारतीय अधिक प्रभावी रहे। इसलिए वहां की लिपि, साहित्य और संस्कृति सभी भारतीय ही बनी रही। केवल राजनीतिक प्रभुत्व चीन के साथ साझा करना पड़ा। यही कारण है कि खोतान में पुरातात्विक खुदाई में बड़ी संख्या में भारतीय संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

खोतान के संबंध में अनेक कथाएं भारतीय और तिब्बती संदर्भों में मिलती हैं। उनमें काफी साम्यता भी है और कुछ भेद भी। इन कथाओं के आधार पर चंद्रगुप्त वेदालंकार लिखते हैं, “भगवान् बुद्ध के निर्वाण पद को प्राप्त करने के चार सौ वर्ष उपरान्त और धर्माशोक की मृत्यु के 165 वर्ष बाद 53 ई. पू. खोतान के राजा विजयसम्भव के शासनकाल के पांचवें वर्ष अर्हत वैरोचन ने पहले-पहले खोतान में बौद्धधर्म का प्रचार किया। इस समय भारत में मौर्यों का शासन समाप्त हो चुका था। मौर्यों के बाद कण्व आये। कण्व राजा भूमिमित्रा को शासन करते हुए जब 10 वर्ष हो चुके थे जब कश्मीर से अर्हत वैरोचन नामक एक भिक्षु खोतान गया। इसने राजा को बौद्धधर्म की दीक्षा दी। ’ली’ भाषा और ’ली’ लिपि का प्रचार किया।“

विभिन्न तिब्बती और भारतीय वर्णनों के अनुसार निम्न बातें सामने आती हैं-
(क) अशोक से बहुत वर्ष पूर्व कुछ ऋषि (धर्मप्रचारक) खोतान गये थे। परन्तु वहां के निवासियों ने उनका स्वागत न कर अपमान किया, जिससे उन्हें वापिस लौटना पड़ा।

(ख) किन्हीं दैवीय कारणों से खोतान में भयंकर जल-विप्लव हुआ और वहां की जन-संख्या बिलकुल नष्ट हो गई।

(ग) पानी सूखने पर अशोक का मंत्राी यश और राजकुमार कुस्तन स्थान ढूंढ़ते हुए खोतान पहुंचे। देश को जनशून्य देखकर और स्थान की सुन्दरता से मुग्ध होकर दोनों ने उसे बसा लिया।

(घ) इन्हीं कथानकों से एक परिणाम और निकलता है और वह यह है कि खोतान एक भारतीय उपनिवेश था। जिन लोगों ने उसे बसाया वे भारतीय थे। उनके देवता वैश्रवण और श्री महादेवी थे। उनके मन्दिरों की मूर्तियां भी इन्ही देवताओं की थीं।

शिन ज्याङ् में भारतीय धर्म

अर्हत वैरोचन कश्मीर से खोतान गया। वहां जाकर उसने बौद्धधर्म का प्रचार किया। राजा उससे प्रभावित होकर बुद्ध का भक्त बन गया और कुछ समय पश्चात् उसने एक विहार बनवाया जो खोतान का सर्वप्रथम बौद्धविहार था। खोतान के बारे में चीनी यात्राी फाह्यान ने जो वर्णन किया है, वह भी भारतीय प्रभावों की पुष्टि करता है। 404 ई. में फाह्यान लिखता है, “देश बहुत समृद्ध है। लोग खूब सम्पन्न हैं। जनसंख्या बढ़ रही है। यहां के सब निवासी बौद्ध है और मिल कर बुद्ध की पूजा करते हैं। प्रत्येक घर के सामने एक स्तूप है। छोटे-से छोटे स्तूप की ऊंचाई पच्चीस फीट है। संघारामों में यात्रियों का खूब स्वागत किया जाता है। राज्य में बहुत से भिक्षु निवास करते हैं। इनमें अधिकांश महायान सम्प्रदाय के हैं। अकेले गोमति विहार में ही महायान सम्प्रदाय के तीन सहस्त्रा भिक्षु निवास करते हैं, तथा घण्टा बजने पर भोजन करने के लिए भोजनालय में प्रविष्ट होते हैं और चुपचाप अपने स्थान पर बैठ जाते है। भोजन करते हुए ये परस्पर बात-चीत नहीं करते और न बांटने वाले के साथ ही बोलते हैं। प्रत्युत हाथ से ही ’हां’ और ’न’ का इशारा कर देते हैं।” इसी प्रकार एक और चीनी यात्राी सुड्.-युन् 519 ई. में खोतान पहुंचा। वह लिखता है, ’’इस देश का राजा सिर पर मुर्गे की आकृति का मुकुट धारण करता है। उत्सवों के समय राजा के पीछे तलवार और धनुष उठाने वालों के अतिरिक्त विविध वाद्य-उपकरणों को बजाने वाले भी चलते हैं। यहां की स्त्रिायों पुरुषों की भांति घोड़ों पर चढ़ती हैं। मुर्दे जलाये जाते हैं।“

प्राचीन खोतान नगर के बारे में चंद्रगुप्त वेदालंकार ने लिखा है, “युरङ्काश नदी के पश्चिमीय किनारे पर योतकन नामक नगर विद्यमान है। यहां पर प्राचीन समय के भग्नावशेष प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हुए हैं। गम्भीर अन्वेषण से ज्ञात हुआ है कि इसी स्थान पर खोतान देश की प्राचीन राजधानी खोतान नगर विद्यमान था। यहां से मध्यकालीन भारतीय राजाओं के आठ सिक्के उपलब्ध हुए हैं। इसमें से छः काश्मीर के राजाओं के है और शेष दो सिक्के काबुल के हिन्दु राजा ’’सामन्तदेव’’ के हैं। यहां से मिट्टी का बना हुआ एक छोटा-सा बर्तन मिला है। इसके सिर पर एक बन्दर बैठा हुआ है जो सितार बजा रहा हैं। एक अन्य बर्तन के दोनों ओर दो स्त्रियों की मूर्तियां बनी हुई हैं। ये गन्धर्वियों की मूर्तियां है। मिट्टी के बने हुए वैश्रवण के सिर मिले हैं। घन्टे की आकृति की एक मोहर भी प्राप्त हुई है। एक अन्य मोहर पर गौ का चित्र बना हुआ है। पीतल की बनी एक बुद्ध मूर्ति भी मिली है। इसका दायां हाथ ऊपर की ओर है और अंगुलियां ऊपर उठाई हुई हैं। एक दीवार पर ’मार’ और उसकी स्त्राी द्वारा भगवान् बुद्ध को प्रलोभित करने का दृश्य दिखाया गया है। एक आले में बोधिसत्व की मूर्ति विराजमान हैं। इसका दाहिना स्कंध तथा छाती नंगी है। देह पर चीवर पहरा हुआ है। दायां हाथ पृथ्वी की ओर झुका हुआ है। समीप ही तीन स्त्रियों की मूर्तियां हैं। इनमें से एक मूर्ति नागिन की है। सामने ’मार’ का भयावह चित्र है। इसने हाथ में वज्र पकड़ हुआ है और मुंह बुद्ध की ओर फेरा हुआ है।“
ये वर्णन साबित करते हैं कि प्राचीन खोतान और वर्तमान शिन ज्याङ् एक समय में भारतीय प्रदेश ही रहे हैं। वहां भारतीय परंपराओं के अनुसार ही लोग जीवन जीते रहे हैं। कालांतर में यहां इस्लाम का आगमन हुआ और यहां के लोगों ने पराजित होने पर इस्लाम स्वीकार कर लिया। परंतु इसके बाद भी यह स्वाधीन प्रदेश था। मंगोलों ने पहली बार इसे अपने साम्राज्य में शामिल किया।
मंगोलिया में भारतीय प्रभाव

चीन के उत्तर में स्थित मंगोलिया के भी भारत से काफी नजदीकी संबंध रहे हैं। प्रसिद्ध विद्वान तथा भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे आचार्य रघुवीर पचास के दशक में मंगोलिया की यात्रा पर गए थे। बीसवीं शताब्दी में भारत से मंगोलिया जाने वाले वे पहले आचार्य थे। 1956 में जब वे वहां गए तो वहां की जनता के लिए मानो एक युगप्रवर्तक घटना घटी हो। प्रधानमंत्राी से लेकर विद्वान, पत्राकार, जनता-जनार्दन का अपार स्नेह उन्हें मिला। जिस-जिस तम्बू में वे गए, माताओं ने अपने बच्चों को उनकी गोद में बिठा दिया, सब उनका आशीर्वाद पाने को आतुर थे। उस समय उनके अनुसंधान का विषय था – मंगोलिया की भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म। वह इतिहास जिसमें छठी शताब्दी के उन भारतीय आचार्यों का वर्णन है जो धर्म की ज्योति लिए मंगोल देश में गये, और 6000 संस्कृत ग्रन्थों का मंगोल भाषा में भाषान्तर किया, जिनके द्वारा निर्मित दास लाख मूर्तियां, सात सौ पचास विहारों में सुरक्षित थीं, जिनके द्वारा लिखी अथवा लिखवायी गयीं बत्तीस लाख पाण्डुलिपियां 1940 तक विहारों में सुरक्षित थीं, लाखों प्रभापट थे। वहां उन्होंने चंगेज खां के वंशजों के अति दिव्य मन्दिर देखे जो गणेशजी की मूर्तियों से सुशोभित थे।

यहां से आचार्य जी मंगोल भाषा में अनूदित अनेक ग्रन्थ लाये जिनमें कालिदास का मेघदूत, पाणिनि का व्याकरण, अमरकोश, दण्डी का काव्यादर्श आदि सम्मिलित हैं। इनमें से एक, गिसन खां अर्थात् राजा कृष्ण की कथाओं का उनकी सुपुत्राी डॉ. सुषमा लोहिया ने अनुवाद किया है। वे भारतीयों को भारतीयता के गौरव की अनुभूति करवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मंगोल-संस्कृत और संस्कृत-मंगोल कोश भी लिख डाले। उन्होंने मंगोल भाषा का व्याकरण भी लिखा ताकि भावी पीढ़ियां उसका अध्ययन कर सकें। वहां आलि-कालि-बीजहारम् नामक, संस्कृत पढ़ाने की एक पुस्तक आचार्य जी को उपलब्ध हुई। इसमें लाञ्छा और वर्तुल दो लिपियों का प्रयोग किया गया है। भारत में ये लिपियां खो चुकी हैं। मंगोलिया में बौद्ध भिक्षु संस्कृत की धारणियों को लिखने और पढ़ने के लिए इस पुस्तक का अध्ययन किया करते थे। इसमें संस्कृत अक्षरों का तिब्बती और मंगोल लिपियों में लिप्यन्तर कर उन्हीं भाषाओं में वर्णन प्रस्तुत किए गए हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि इसकी छपाई चीन में हुई थी। यह पुस्तक, मात्र भारत के चीन, मंगोलिया और तिब्बत के साथ सांस्कृतिक सम्बंधों की गाथा ही नहीं सुनाती अपितु नेवारी, देवनागरी तथा बंगाली लिपियों का विकास जानने में भी सहायक है। इस प्रकार मंगोलिया भी चीन की बजाय भारत के अधिक नजदीक रहा है, सांस्कृतिक ही नहीं, वरन् राजनीतिक रूप से भी। इनर मंगोलिया वास्तव में मंगोलिया का ही एक हिस्सा है और इसलिए वह भी चीनी होने की बाजय भारतीय संस्कृति के रंग में रंगा हुआ रहा है, बहुत कुछ आज भी है।

चीन पर भारतीय प्रभाव
यही कारण है कि चीन आदि में भारत के राजनीतिक प्रभाव के सूत्र भी प्राप्त होते हैं। समझने की बात यह है कि भारतीय राजाओं ने कभी भी अपने उपनिवेश बनाने का प्रयास नहीं किया है। वे हमेशा स्थानीय शासन को ही वरीयता देते रहे हैं। इतिहास में ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिलते हैं, जिसमें भारतीय राजा ने किसी अत्याचारी राजा को मारा, परंतु फिर वहीं के किसी व्यक्ति को वहां का शासक बना दिया। भारतीय राजाओं ने हमेशा केवल धर्म के शासन को सुनिश्चित किया न कि किसी व्यक्ति या राजवंश के शासन को। यही कारण है कि पूरी दुनिया में भारतीय शासकों ने धर्म का शासन स्थापित किया था और उसके कारण वे वहां अत्यंत लोकप्रिय भी हुए थे। इसलिए आज की औपनिवेशिक मानसिकता से यदि हम भारतीय राजनीतिक प्रभावों को तलाशने का प्रयास करेंगे तो संभवतः हमें कुछ भी हाथ नहीं लगेगा, परंतु यदि हम भारत की राजनीतिक परंपरा को ध्यान में रखेंगे तो हमें काफी कुछ प्राप्त हो सकता है। उदाहरण के लिए कण्व वंश के शासकों का शासन जब खोतान पर था तब चीन से राजनयिक विवाह संबंध भी होते रहे हैं। वर्ष 68 में भारत से एक विद्वत् मंडल चीन बुलाया गया। इसका वर्णन रेवरेंड जोसेफ एडकिन्स ने अपनी पुस्तक चाइनिज बुद्धीज्म में किया है। एडकिन्स ने इसकी तुलना अफ्रीका से पहली बार यूरोप पहुँचे पहली ईसाई मिशनरी के साथ हुए व्यवहार से की है। भारतीय धर्मप्रचारकों को जहां शासकीय सम्मान और स्वागत मिला था, ईसाई मिशनरियों को बंदी बना लिया गया था और सार्वजनिक रूप से जलील करते हुए उन्हें बाहर खदेड़ दिया गया था। इससे अफ्रीका-यूरोप के संबंधों और साथ ही भारत-चीन के राजनीतिक संबंधों की जानकारी मिलती है। सांस्कृतिक स्वागत भी तभी होते हैं जब राजनीतिक संबंध प्रगाढ़ होते हैं।

एडकिन्स के इस वर्णन का साक्ष्य अनेक तिब्बती ग्रंथों से भी मिलता है। चंद्रगुप्त वेदालंकार लिखते हैं, “अशोक द्वारा राजकीय सहायता मिलने से बौद्वधर्म भारत की प्राकृतिक सीमाओं को पार कर एशिया, योरुप और अफ्रीका तीनों महाद्वीपों में फैल गया। तदनन्तर कुशन राज कनिष्क ने बौद्वधर्म के प्रचारार्थ भारी प्रयत्न किया। इसी के समय पेशावर में चतुर्थ बौद्धसभा बुलाई गई। जिस समय पश्चिम-भारत में कुशान राजा राज्य कर रहे थे उस समय तक चीन में बौद्धधर्म का प्रचार प्रारम्भ हो चुका था।”

चीन में बौद्ध धर्म

“चीनी पुस्तक ’को-वैन्-फिड्.-ची’ से ज्ञात होता है कि चीन के ’हान’ वंशीय राजा मिङ्ती ने 65 ई. में 18 व्यक्तियों का एक दूतमण्डल भारत भेजा जो लौटते हुए अपने साथ बहुत से बौद्ध ग्रन्थ तथा दो भिक्षु ले गया। इस प्रकार चीनी विवरण के अनुसार मिङ्ती के शासनकाल में ही चीन में प्रथम बार बौद्धधर्म प्रविष्ट हुआ। परन्तु प्रश्न पैदा होता है कि यह दूतमण्डल भेजा क्यों गया? इसका उत्तर चीनी पुस्तकें इस प्रकार देती है-’’ हान वंशीय राजा मिङ्ती ने अपने शासन के चौथे वर्ष स्वप्न में 12 1/2 फीट ऊंचे एक स्वर्णीय पुरुष को देखा। उसनके सिर से सूर्य की भांति तीव्र प्रकाश निकल रहा था। राजा की ओर आता हुआ वह दिव्य पुरुष महल में प्रविष्ट हुआ। स्वप्न से बहुत अधिक प्रभावित होकर राजा ने मंत्राी से इस स्वप्न का रहस्य पूछा। मंत्राी ने उत्तर दिया- आप जानते हैं कि भारतवर्ष में एक बहुत विद्वान् पुरुष रहता है जिसे बुद्ध कहा जाता है। यह पुरुष निश्चय से वही था। यह सुनकर राजा ने अपने सेनापति तथा 17 अन्य व्यक्तियों को महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का पता लगाने के लिये भारत भेजा।” यह कहानी बताती है कि चीन पर भारत का प्रभाव बौद्धों के आविर्भाव के पहले से रहा है। भारत में हो रही सभी गतिविधियों की जानकारी चीन के लोगों को बखूबी है। इतना ही नहीं, वे उनसे इतने प्रभावित हैं कि उनके राजा को उसके सपने तक आते हैं।

वेदालंकार आगे लिखते हैं, “चीन में बौद्धधर्म के प्रवेश की यह कथा तद्देशीय 13 अन्य ग्रन्थों में भी पाई जाती है। बिल्कुल यही कथानक तिब्बती ग्रन्थ ’तब्था-शैल्ख्यी-मीलन्’ में भी इसी प्रकार संगृहीत है। इन सब ग्रन्थों के अनुसार चीन में बौद्धधर्म का सर्वप्रथम उपदेष्टा ’काश्यप् मातङ्ग’ था। मातङ्ग इसका नाम था और क्योंकि यह कश्यप गोत्रा में उत्पन्न हुआ था इसलिये यह काश्यप् मातङ्ग नाम से प्रसिद्ध था। यह मगध का रहने वाला था। जिस समय चीनी दूतमण्डल भारत आया तब यह गान्धार में था । दूतमण्डल की प्रेरणा पर यह चीन जाने को उद्यत हो गया। उस समय गान्धार से चीन जाने वाला मार्ग खोतान और गौबी के मरुस्थल में से होकर जाता था। मार्ग की सैकड़ों विपत्तियों को सहता हुआ कश्पय मातङ्ग चीन पहुंचा। चीन पहुंचने पर राजा ने इसके निवासार्थ ’लोयड्.’ नामक विहार बनवाया। मिङ्ती द्वारा भारतीय पण्डितों के प्रति पक्षपात दिखाने पर कन्फ्यूशस और ताऊ धर्म वालों ने बौद्धधर्म के विरुद्ध आवाज उठाई। इस पर तीनों धर्मां की परीक्षा की गई। इस परीक्षा में बौद्धधर्म सफल हुआ।”

“इस प्रकार चीन में बौद्धधर्म के जड़ पकड़ते ही भारतीय पण्डित इस ओर आकृष्ट हुए और बहुत बड़ी संख्या में चीन जाने लगे। प्रथम जत्थे में आर्यकाल, श्रमण सुविनय, स्थविर चिलुकाक्ष आदि के नमा उल्लेखनीय है। दूसरी शताब्दी के अन्य होने से पूर्व ही महाबल चीन गया। इसने लोयड्. विहार में रह कर संस्कृतग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद किया। तीसरी शताब्दी में धर्मपाल चीन गया और अपने साथ कपिलवस्तु से एक संस्कृत ग्रन्थ भी ले गया। 207 ई. में इसका अनुवाद किया गया। तदुपरान्त ’महायान इत्युक्तिसूत्र’ का अनुवाद हुआ। 222 ई. में धर्मपाल चीन पहुंचा। इसने देखा कि चीनी लोग विनय के नियमों से सर्वथा अपरिचित हैं। ये नियम ’प्रातिमोक्ष सूत्र’ में संगृहीत थे। धर्मपाल ने प्रातिमोक्ष का अनुवाद करना आरम्भ किया। 250 ई. में इसका पूर्णतया अनुवाद हो गया। विनय पिटक की यह प्रथम ही पुस्तक थी जो अनुदित की गई थी। 224 ई. में विघ्व और तुहयान, ये दो पण्डित चीन गये और अपने साथ ’धम्मपद’ सूत्र ले गये। दोनों ने मिलकर इसका अनुवाद किया। तीसरी शताब्दी समाप्त होते होते कल्याणरन, कल्याण और गोरक्ष चीन पहुंचे। ये भी अनुवादकार्य में जुट गये। इस प्रकार तीसरी शताब्दी तक निरन्तर भारतीय पण्डितों का प्रवाह चीन की ओर प्रवृत्त रहा। इस बीच में 350 बौद्धधर्मग्रंथ चीनी भाषा में अनुदित किये जा चुके थे। जनता में बौद्धधर्म के प्रति पर्याप्त अनुराग पैदा हो गया था और बहुत से लोग बुद्ध, धर्म तथा संघ की शरण में आ चुके थे।”
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि आज से ढाई हजार वर्ष पहले तक चीन की भौगोलिक रचना काफी छोटी थी और महाभारत काल में चीन भारत के कुरूराज के साम्राज्य से जुड़ा भी रहा है। भारत के लोग मध्य, पश्चिम और उत्तरी एशिया के सभी क्षेत्रों में इसी प्रकार आया जाया करते थे, जैसे आज हम भारत के किसी एक राज्य से दूसरे राज्य में चले जाया करते हैं। इस पूरे क्षेत्रा में भारत की स्थिति राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से प्रेरक तथा नायक की थी। इस पूरे इलाके के लोग भारत को अपना श्रद्धा केंद्र मानते थे। चीन भी इसमें शामिल रहा है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखें तो फिर चीन के साथ हम अपने संबंधों और भावी रणनीति पर विचार कर सकते हैं। चीन का वास्तविक क्षेत्र भारत से काफी छोटा है और यदि हम उसका बढ़ा हुआ क्षेत्राफल स्वीकार कर लें, तो भी वह भारत के बराबर ही ठहरता है। साथ ही यह भी समझने की बात है कि चीन का वह क्षेत्र भारत से खासा दूर है। चीन को इस इतिहास की याद दिलाने की आवश्यकता है। वर्तमान चीन के जो प्रदेश भारत की सीमा से लगते हैं, वे वास्तव में कम्यूनिस्ट साम्राज्यवादी चीन के अंग हैं। चूंकि कम्यूनिस्ट स्वभाव से विस्तारवादी होते हैं, इसलिए वर्तमान चीन की हम चाहे जितनी लल्लो-चप्पो कर लें, वह अपना विस्तारवादी रवैया नहीं छोड़ेगा। कम्यूनिस्ट चीन और पाकिस्तान की आपस में बनती भी इसी कारण से है कि ये दोनों ही भारत को अपना शिकार समझते हैं। ऐसे में भारत के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह चीन के साथ प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को जीवित करने के प्रयास करे। जब भी चीन द्वारा भारतीय प्रदेशों की चर्चा की जाए, तब-तब तिब्बत, शिन ज्यांङ् और मंगोलिया के भारतीय इतिहास को सामने लाया जाना चाहिए। भारत को तो शिन ज्याङ् और तिब्बत के इतिहास को बौद्धिक विश्व पटल पर निरंतर उठाते ही रहना चाहिए। इसमें ध्यान रखने की बात यह है कि चीन की भांति भारत इन प्रदेशों पर अपनी सत्ता जमाने की बात न करे, बल्कि प्राचीन परंपरा के अनुसार इन्हें स्वाधीन राज्य बनाने की बात उठाए जिससे ये भारत के मित्रा राज्य बन कर रह सकें।
भारत को मंगोलिया से अपने सदियों पुराने सांस्कृतिक व राजनीतिक संबंधों को भी पुनर्जीवित करना चाहिए। आभ्यंतर मंगोलिया चीन का प्रदेश कभी नहीं रहा है, वह मंगोलिया का ही हिस्सा होना चाहिए, इस बात को भी उचित स्थानों पर सामने लाना चाहिए। इससे चीन की आक्रामकता पर लगाम तो लगेगी ही, भारत के सांस्कृतिक मित्रों की संख्या भी बढ़ेगी जो कालांतर में भारत के राजनीतिक मित्रा भी साबित होंगे।

संदर्भः

1. चाइनीज बुद्धिज्म, रेव. जोसेफ एडकिन्स, 1893
2. एनशिएंट खोतान, औरील स्टीन, 1907
2. वृहत्तर भारत, शिव कुमार अस्थाना
3. वृहत्तर भारत, चंद्रगुप्त वेदालंकार, 1935
4. वैदिक संपत्ति, पंडित रघुनंदन शर्मा, 1932
5. कौटिलीय अर्थशास्त्रा, उदयवीर शास्त्राी
6. आचार्य रघुवीर, शशिबाला
7- http://www.ancient.eu/china/
8- www.wikipedia.com

हमारे परम्पराओ का विनाश

काफी पहले पंद्रहवीं शताब्दी में ही जब फ्रांसिस ज़ेवियर जैसे लोग भारत में आत्माओं की फसल काटने आये तभी उन्हें समझ आ गया था कि कई पर्तों वाले इस समाज को पूरी तरह कुचलना आसान नहीं है। जहाँ बाकी जगह उनकी लड़ाइयों में पूरा पूरा देश एक बार में अपना पुराना धर्म अपनी संस्कृति छोड़ कर उनके रंग में रंग जाता था, वैसा करना भारत पर मुमकिन नहीं हो रहा था। वर्ण व्यवस्था के कारण सब के सब एक बार में बदलते ही नहीं थे ! भारत से जाने के समय तक फ्रांसिस ज़ेवियर हत्याएं करवाता रहा, ब्राह्मणों को गालियाँ देता रहा, लेकिन कामयाब नहीं हुआ।

करीब तीन सौ साल में सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के बाद फिरंगियों के सामने कोई बड़ा विरोध नहीं बचा था। जो इक्का दुक्का सरदार बचे भी थे उनकी हत्या के बाद करीब तीस साल में फिरंगी पूरी तरह भारत पर काबिज़ हो चुके थे। अब उनकी जरूरत किसी विद्रोह को कुचलने की नहीं थी, वो चाहते थे कि भारत में अगला कोई विद्रोह शुरू ही ना हो सके। इस काम के लिए सबसे पहले तो सांस्कृतिक एकता के स्थलों यानि कि मंदिरों को शक्तिहीन किया गया। उनके आर्थिक स्रोत हथिया लिए गए जिस से वो लड़ने की सोच ना सकें।

जब तक विचारों को ना कुचला जाता तब तक इसाई मजहब और उसके जरिये सांस्कृतिक विरोध को दबाना मुमकिन नहीं था। इसी कड़ी में भारत में कई प्रचारकों और प्रशासनिक इकाइयों ने काम करना शुरू किया। उनका हथियार था साहित्य, जिस से सभ्यता के पुराने रूप को या तो विकृत किया जाना था या नए को पनपने से रोकना था। 1860 के बाद के दौर में अच्छे लेखकों और वक्ताओं को प्रश्रय देना शुरू किया गया। मुग़ल शासन का अंत होने पर मिर्जा ग़ालिब भी कुछ समय अंग्रेजों की सेवा में रहे थे।

सन 1890 के आस पास जब ब्रिटिश भारत में जम चुके थे तो भारत में उनका सिक्का जमाने वालों में से एक जॉन स्ट्राचे (Sir John Strachey) कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में भारत पर लेक्चर दे रहे थे। इन सारे लेक्चर्स को बाद में संकलित कर के एक किताब की शक्ल दी गई जिसका ना था “इंडिया”। ब्रिटिश राज के शुरुआती दौर में उसकी फ़ौज और उसके सिविल सर्विस की जब बात होती है तो ज्यादातर इसी किताब से उदाहरण दिए जाते हैं। हाल में जो एक झूठ प्रचारित करने की दोबारा कोशिश की गई थी कि “भारत अंग्रेजों से पहले कोई एक देश नहीं था” वो दरअसल इसी किताब से इसी जॉन स्ट्राचे का आईडिया था।

स्ट्राचे के हिसाब से यूरोप के देशों के आपसी मतभेदों की तुलना में भारत के “देशों” के आपसी मतभेद बहुत ज्यादा थे। उनके हिसाब से स्कॉटलैंड और स्पेन में कुछ चीज़ें मिलती जुलती हो सकती हैं, लेकिन बंगाल और पंजाब बिलकुल अलग अलग हैं। उनके हिसाब से भारत के अलग अलग हिस्सों में कभी कभी “राष्ट्रवाद” पनप सकता था, लेकिन वो सिर्फ एक छोटे से हिस्से के लिए होगा, मद्रास, पंजाब, बंगाल और उत्तर-पश्चिम के प्रान्त सब एक साथ एक राष्ट्रवाद की बात करें ऐसा नहीं हो सकता। जिस वक्त स्ट्राचे ये बातें कर रहे थे ठीक उसी समय भारत में एक फिरंगी ए.ओ.ह्यूम्स की सहायता से भारतीय कांग्रेस नाम का एक संगठन बना रहे थे।

सभी हिन्दुस्तानियों की एक साथ बात करने वाले एक डिबेट क्लब से फिर लाल, बाल, पाल के दौर तक आने और अंत में गाँधी के शामिल होने और उनके छोड़ने तक कांग्रेस का अपना ही इतिहास रहा है। लेकिन सन 1890 से लकर 1940 हो जाने के और पचास लम्बे सालों में भी भारत के शत्रुओं ने कभी भारत को एक राष्ट्र के तौर पर स्वीकार नहीं किया। सन 1930-31 के बीच के अपने भाषणों में विंस्टन चर्चिल (थोड़ी सी सभ्य भाषा में) करीब करीब वही दोहराता रहा जो पहले ही फ्रांसिस ज़ेवियर काफी पहले कह गया था।

“आवर ड्यूटी टू इंडिया” में अल्बर्ट हॉल के अपने भाषण में 1931 की शुरुआत में चर्चिल का कहना था कि वो भारत को ब्राह्मणों के शासन के लिए नहीं छोड़ सकता। ये एक भारतीय जनता के प्रति अपराधिक और क्रूर उपेक्षा होगी। उसके हिसाब से अंग्रेजों के जाते ही अंग्रेजों द्वारा स्थापित, न्यायिक, रेलवे, चकित्सा जैसे सारे तंत्र ख़त्म हो जाते और भारत वापस मध्ययुगीन बर्बरता के समय में पहुँच जाता। इस दौर के “नमक सत्याग्रह” के दौरान जब भारत को उपनिवेश बनाने की चर्चा चल रही थी तो चर्चिल इसे कपोल कल्पना और कपट भरी साजिश बता रहा था। सन 1947 के बाद भी ऐसी चर्चा बंद हो गई हो ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ। फ्रांसिस ज़ेवियर की परंपरा का निर्वाह करते हुए रोबर्ट डाह्ल भारतीय गणतंत्र के लम्बे समय टिकने को संदिग्ध बताता है। भारत में लोकतंत्र के दो दशक बीतने के बाद एक भारत के प्रति “सहानुभूति” रखने वाले ब्रिटिश पत्रकार डॉन टेलर का सवाल था कि क्या भारत एक रह पायेगा ? 524 मिलियन लोगों और पंद्रह प्रमुख भाषाओँ वाला देश टूटेगा कब इस इंतजार में 1970 के दशक का डॉन टेलर भी रहा।

अपने सांस्कृतिक नजरिये से आक्रमणकारियों को भारत हमेशा अप्राकृतिक लगता रहा।

आश्चर्य की बात थी कि सर सोच सकता है, हाथ सोच नहीं सकता फिर दोनों ही एक शरीर क्यों हैं ? दिमाग हाथ को अलग क्यों नहीं करता ? हाथ के किसी काम से पैर का कोई फायदा होता भी नहीं दिखता था। पैर को पूरे शरीर का वजन भी उठाना पड़ता, गंदगी में भी चलने के लिए पैर इस्तेमाल होता था, फिर भी वो हाथ को अपने से अलग करने की जिद नहीं मचा रहा था। जब स्वाद का सुख सारा मूंह को मिल रहा था तो फिर उसके खाए को पेट क्यों पचाए ? एक दूसरे के लिए, मुफ्त की मेहनत करने वाले शरीर के हिस्से, एक साथ क्यों हैं, ये आक्रमणकारी सभ्यता को समझ में ही नहीं आ पा रहा था। ये सवाल अब भी बाकी है।

ऐसा ही एक बड़ा सा सवाल है कि राष्ट्र पर, लम्बे समय के वैचारिक हमले पर ये लेख लिखा कैसे गया ? इस दूसरे साधारण से सवाल का जवाब हम दे सकते हैं। हमने रामचंद्र गुहा की लिखी इंडिया आफ्टर गांधी से कुछ जानकारी उठाई है, (करीब करीब हुबहू नक़ल है!) उसमें अपनी धूर्तता मिलाई है और सामने रख दिया है। आम तौर पर पूछने से रामचंद्र गुहा कोई राष्ट्रवादी नहीं माने जायेंगे। आम भारतीय जो सोचता है, उस हिसाब से वो कुछ भी बोल या लिख नहीं रहे होते।

तो सवाल है उनके ही लिखे को ये भगवा कैसे रंग दिया ? आसान है। भारत में हमेशा से नीर-क्षीर विवेक की बात की जाती है। भावना में बहे जाते मूर्ख लोग उसे भक्ति से जोड़ते हैं। हमने बिलकुल वही उठा कर गुहा के लिखे में से तथ्य निकाले, और फिर उन्हें उनके निकाले हुए अर्थ को हटा कर अपने हिसाब के अर्थ के साथ एक जगह कर डाला है। ये काम बिलकुल आसान है और ये किसी भी किताब पर किया जा सकता है। क्या पढ़ना जरूरी है, क्या सच है, और किसे पढ़े बिना छोड़ देना चाहिए, कौन सा इंटरप्रिटेशन है वो तय किया जा सकता है।

सालों पे गौर कीजिये तो दिखेगा की 1890 से 1947 सिर्फ पांच दशक ही हैं। पचास साल भी इतिहास होता है। अपना इतिहास खुद लिखना सीखिए। तथ्य आपको अख़बारों में मिलते हैं, मोबाइल के कैमरे में ले सकते हैं। कोई और आकर नहीं करने वाला है, ये आपका काम है। आपका इतिहास कोई और आकर क्यों लिखेगा भला ? कामचोरी छोड़कर खुद को कष्ट दीजिये। सावरकर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर लिख कर जा चुके। इस दौर का आपको खुद ही लिखना होगा। आह वाह करते सर हिलाने के बदले हाथ पैर हिलाइए।

----
आनन्द कुमार
धन्यवाद}