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Thursday, April 20, 2017

भारत : राजनीति का आयरिश कनेक्शन

भारत : राजनीति का आयरिश कनेक्शन

By :- आनंद कुमार

भारत में मार्च के अंत का दौर अलग अलग पार्टियों द्वारा सरदार भगत सिंह को हथियाने की कोशिशों का होता है। इसकी वजह से ज्यादातर लोगों ने उनकी पार्टी का नाम “हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी” (HRA) सुना-पढ़ा होगा। ये नाम उन्होंने आयरिश रिपब्लिकन आर्मी से प्रेरित होकर रखा था। बाद में इसी में सोशलिस्ट शब्द भी जोड़ा गया। आयरिश आंदोलनों से सिर्फ भगत सिंह प्रभावित नहीं हुए थे, उसका भारत पर और भी प्रभाव पड़ा था। जब 1870-90 के दौर में आयरिश लैंड वॉर चल रहा था तो स्थिति करीब करीब वैसी ही थी जैसी फिरंगी हुक्मरानों ने भारतीय किसानों की बना रखी थी।



सन 1880 में फसलें बहुत खराब हुई थी और एक जमींदार, लार्ड अर्ने के किसानों को बड़ी दिक्कत हो रही थी। आयरलैंड के काउंटी मायो में बल्लिनरोब के इलाके के पास लार्ड अर्ने की जमींदारी ही लेकिन वो वहां पर कम ही रहते थे। लिहाजा उनका काम काज देखने वाले कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट से किसानों ने बात की। वो “लगान” में कुछ छूट की मांग लेकर आये थे। लार्ड अर्ने ने दस प्रतिशत की छूट घोषित की, लेकिन किसान उस से संतुष्ट नहीं थे। वो 25% की छूट चाहते थे। कैप्टेन चार्ल्स ने पूरा “लगान” ना चुकाने वाले ग्यारह किसानों को निकाल बाहर करने का फैसला किया। इस खबर से बल्लिनरोब के लोउघ मास्क नाम की उस जमींदारी में हलचल मच गई।



उसी दौर में वहां पहुचे चार्ल्स स्टीवर्ट पर्नेल ने इलाके के लोगों से अपील की कि शांति बनाए रखें। जमीनें किसानों से खाली किये जाने के खिलाफ हिंसा करने के बदले बहिष्कार का सहारा लें। पर्नेल के भाषण में जमींदारों या उसके बिचौलियों का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन जैसे ही कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट ने ग्यारह किसानों से जमीन खाली करवाने की कोशिश की, ये बहिष्कार उसपर ही लागू हो गया। स्थानीय लोगों को दिक्कत तो हुई लेकिन कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट के लिए पूरी आफत खड़ी हो गई। उसके खेतों में फसल काटने के लिए कोई ना था। अस्तबलों और घर में भी काम करने के लिए कोई तैयार नहीं होता। स्थानीय व्यापारियों ने उसके साथ सौदा करने से इनकार कर दिया। और तो और, डाकिये ने उसके घर चिट्ठियां पहुँचाने से भी मना कर दिया।



अब चूँकि खेतों में फसल काटने के लिए कोई स्थानीय आदमी तैयार नहीं था, इसलिए दूर कहीं के केवन और मोनाघन से 50 लोगों को बॉयकाट ने बुलवाया। उनकी सुरक्षा जरूरी थी, कहीं स्थानीय लोग बाहर से आये मजदूरों से मार-पीट ना करें, इसलिए सुरक्षा के लिए उनके साथ हज़ार पुलिसकर्मी-सैनिक भी आये। स्थानीय लैंड लीग (land league) के नेताओं ने पहले ही कह दिया था कि बहिष्कार अहिंसक है, कोई हिंसा हुई भी नहीं। नतीजा ये हुआ कि जितनी फसल की कीमत नहीं थी, उतना खर्चा हज़ार सुरक्षाकर्मी लगाने में हो गया ! ऊपर से सैनिक लाकर दबाव बनाने से भड़के स्थानीय लोगों ने बहिष्कार आगे भी जारी रखा।

थोड़े ही दिनों में बहिष्कार की वजह से सब कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट का नाम जानने लगे। न्यू यॉर्क ट्रिब्यून के एक रिपोर्टर जेम्स रेडपाथ ने सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय ख़बरों में बॉयकाट के बारे में लिख दिया। आयरिश लेखक जॉर्ज मूर ने कहा कि “एक धूमकेतु की तरह बॉयकाट विशेषण उभर आया”। नवम्बर 1880 में समाज के सामूहिक बहिष्कार, बोलें तो, हुक्का पानी बंद के लिए ‘द टाइम्स’ ने बॉयकाट शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया। माइकल डेविट की “द फॉल ऑफ़ फ्यूडलिस्म इन आयरलैंड” में भी बॉयकाट शब्द का जिक्र है। “द डेली न्यूज़” दिसम्बर 1880 में इस शब्द का इस्तेमाल करने लगा था। यानि जिन किसानों के अस्तित्व को स्वीकारने से ही मना कर दिया था, उन्होंने बॉयकाट का मतलब ही 1881 की जनवरी तक बदल डाला था।



आयरिश क्रांति का प्रभाव सिर्फ सरदार भगत सिंह की क्रन्तिकारी पार्टी पर ही नहीं पड़ा था, सविनय अवज्ञा के गांधीवादी तरीकों में जिस बॉयकाट का इस्तेमाल होता है वो शब्द भी वहीँ से आया है। भारत का पिछला स्वतंत्रता आन्दोलन देखेंगे तो पता चलेगा कि 1940 के दशक में जब गांधीजी कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर अलग हो चुके थे, उस वक्त भी आंदोलनों में कई लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे। गांधीजी कांग्रेस में नहीं थे, इसलिए कांग्रेस की वर्किंग कमिटी की बैठक, सन 1942 में वर्धा में हुई थी। गांधीजी कांग्रेस छोड़ने के बाद वर्धा, महाराष्ट्र में रहते थे। चूँकि गांधीजी वर्धा में रहते थे, इसलिए वर्धा को “गांधीवादी जिला” बनाने की कोशिशें 1980 के दौर में भी की गई थी। वो अभी भी महाराष्ट्र का शराबबंदी वाला इलाका है, वहां शराब बेचना-पीना कानून जुर्म है।



इन अजीबोग़रीब वाकयों की वजह से 1940-47 के बीच और उसके बाद पुलिस की गोली से मरे दस हज़ार से ज्यादा स्वतंत्रता सेनानियों का कोई नाम भी नहीं लेता। नाम इसलिए भी नहीं लिया जाता क्योंकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सिर्फ कॉमरेडों के आकाओं का नाम लेने की परंपरा है। नेहरु के इस बगलबच्चा गिरोह ने कभी हमारी आजादी के लिए वीरगति को प्राप्त हुए हुतात्माओं को सम्मान देना जरूरी ही नहीं समझा। आश्चर्यजनक ये भी है कि समय के चक्र पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। भारत में जो 1720-50 के दौर में हुआ ठीक वही राष्ट्रवाद का ज्वर 1820-50 में आया, फिर से वो 1920-50 के दौर में दिखा। जो कभी 1990 में सोचा भी नहीं होगा, सन 2020 आते आते भारतीय फिर से बॉयकाट का इस्तेमाल करते दिखने लगे हैं। फिल्मों और कंपनियों पर इसका लागू होना सिर्फ शुरुआत भर है।



बिहार-बंगाल की राजनैतिक स्थितियां फिर से बॉयकाट को आमंत्रित कर रही हैं। चम्पारण आन्दोलन के सौ साल मनाने की जल्दी में सुशासन बाबू उन किसानों को भूल रहे हैं, जिन्होंने भूखे रहकर ये लड़ाई लड़ी थी। स्थानीय किसान नेताओं को गायब कर रहे हैं जिनके घरों के सामने से गुजरने पर रिक्शे वाले बताते जाते हैं कि फलां बाबु यहीं रहते थे। कांग्रेस तो खैर चार कदम और आगे है, चम्पारण आन्दोलन की जयंती मानाने आ रहे राहुल गाँधी के सम्मान में पोस्टर लगाये गए हैं। उसपर राजमाता और युवराज तो हैं, चम्पारण आन्दोलन भी लिखा है, मगर गांधीजी ही गायब हो गए हैं। पोस्टर नब्बे के दशक से पहले के नोट जैसे लगते हैं जिसपर गांधीजी नहीं होते थे।



बाकी आँखें खुली हो तो देखने की कोशिश कीजिये, बिना शोर मचाये, बिना किसी शिकायत जनता कैसे कब “बॉयकाट” कर जाती है, वो भी दिखने लगेगा। अभिजात्यों की इस जय-जयकार में आम आदमी की आवाज कहीं सुनाई देती है क्या ?

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