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Thursday, April 20, 2017

भारतवर्ष पर मुगलों शासन सत्य अथवा वामपंथी इतिहासकारों का पाखंड ??

मनीषा सिंह की कलम से मित्रों भारतवर्ष पर मुगलों शासन सत्य अथवा वामपंथी इतिहासकारों का पाखंड ??
सर्वप्रथम जहा भारत के इतिहासकारों ने हर वोह पन्ने को फाड़ कर फ़ेंक दिया जिनमे राजपूत योद्धाओ द्वारा मुग़ल को खदेड़ने की याँ परास्त करने की बात लिखी हुयी थी परन्तु कुछ विदेशी इतिहासकार हुए जो सच्चाई को अपनाया और माना की राजपूत राजाओ के समान कोई पराक्रमी नही था । भारत का इतिहास ऐसे योद्धाओ की आरतियों से और यशकीर्तियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने भारत के इतिहास को नई गति और नई ऊर्जा से नई दिशा दी। बात क्षत्रिय राजपूतो की सिरमौर चौहानों की करें तो इसने ऐसे कितने ही अमूल्य हीरे हमें दिये हैं जिन्होंने अपनी चमक से भारतीय इतिहास के पन्नों पर इतना तीव्र प्रकाश उत्कीर्ण किया कि जहां-जहां तक वह प्रकाश गया वहां-वहां तक इतिहास का एक-एक अक्षर स्वर्णिम हो गया ।
रणथंभौर की रण में वाग्भट चौहान ने मुस्लिम सेनाओ को धुल चटाया था लगातार दो बार एवं सल्तनत दुर्बल होकर दिल्ली तक सिमट गया -:
हमने वाग्भट के साथ किया अन्याय

हमने राजा वाग्भट के शौर्य को वीरता को, उसकी देशभक्ति को राख के नीचे दबा दिया। क्योंकि इतिहास देशद्रोहियों द्वारा लिखा गया है। हमें पुन: क्रांतिवीर सावरकर के इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए-‘‘हिंदुस्तान राष्ट्र निरंतर किसी न किसी विदेशी सत्ता के अधीन बना रहा तथा हिंदुस्थान का इतिहास मानो हिंदुओं के सतत पराभव की ही एक गाथा है। इस प्रकार का सरासर झूठा, अपमान जनक और कुटिलता से किया गया प्रचार चालू सिक्कों की तरह न केवल विदेशियों के द्वारा अपितु स्वबंधुओं के द्वारा भी बेरोक टोक वयवहृत किया जा रहा है। इस असत्य प्रचार का प्रतिकार करना न केवल राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए आवश्यक है, अपितु ऐतिहासिक सत्य के उद्घाटन की दृष्टि से भी ऐसा किया जाना वांछनीय है। आज तक इस दिशा में जो इतिहासज्ञ प्रयत्नशील रहे हैं, उनके सत्प्रयासों में सहायक बनना और उनके प्रचार को अधिक तीव्रता प्रदान करना एक राष्ट्रीय कर्तव्य है।
जिन जिन विदेशी शक्तियों ने भारत पर आक्रमण किया, अथवा अपना राज्य प्रस्थापित किया, उन सभी विदेशी शासकों का पराभव कर हिंदू राष्ट्र को जिन्होंने स्वाधीनता प्रदान की, उन सभी वीरों, राष्ट्रोद्वारकों उन युग प्रवर्तक पराक्रमी महापुरूषों का ऐतिहासिक चित्रण करने का निश्चय मैंने किया है।’’ (संदर्भ: भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ पृष्ठ 4)
महाराज प्रहलाद के मृत्यु के पश्चात वाग्भट चौहान ने उनके अल्पव्यस्क पुत्र वीर नारायण को शासक बनाया, जिसके संरक्षक का दायित्व उसके चाचा वाग्भट ने निर्वाह किया  । वाग्भट एक शूरवीर चौहान था, उसने उचित अवसर आते ही स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित करना चाहा, तब अल्तमश को इस सुदृढ़ दुर्ग को अपने अधीन रखने के लिए रणथंभौर पर चढ़ाई करनी पड़ी। परन्तु रणथंभौर का दुर्ग वाग्भट के पराक्रमी के करण हार गया अल्तमश और फिर राजपूत रणबांकुरों से सीधा युद्ध में दो बार परास्त होकर दिल्ली की और लौट पड़ा फिर अल्तमश ने षड़यंत्र रचा ‘हम्मीर महाकाव्य’ की साक्षी के अनुसार “एक षडय़ंत्र के अंतर्गत वीरनारायण को दिल्ली बुलाकर मार दिया गया।“ अपने भतीजे वीरनारायण की मृत्यु के पश्चात वाग्भट के मन में हार के कलंक को लेकर जीवित रहना एक शूरवीर पराक्रमी स्वाधीनता प्रेमी योद्धा के लिए कठिन होगया था अल्तमश की मृत्यु के पश्चात रुकनुद्दीन फिरोज शाह दिल्ली के सुल्तान बने तब मौका मिलते ही वाग्भट ने स्वतंत्रता की बिगुल बजा दिया एवं विशाल सेना के साथ रणथंभौर पर आक्रमण किया रणथंभौर के दुर्ग से मलेच्छों को खदेड़ दिया ।
वाग्भट सन १२३७-१२५३ ईस्वी तक शासन किया रणथंभौर पर इन्होने ने प्रथम बार मलेच्छ सेना को परास्त किया था सन १२४८ ईस्वी (1248 A.D) में नसीरुद्दीन ने उलूग खान के नेतृत्व में विशाल सेना भेजा वाग्भट के खिलाफ । वाग्भट ने सर्वप्रथम सम्पूर्ण
उत्तर पश्चिमी राज्य से मलेच्छ सेना एवं उनके सुल्तान को खदेड़ने का निश्चय किया उलूग खां ने कई लाख सेना (सेनाकी संख्या कही मिला नही इतिहासकारों के भिन्न मत हैं जैसे सी.पी. रामास्वामी अय्यर ने भारत भास्कर किताब के पृष्ठ ८१ पर लिखे हैं एक लाख तो The Sunday Standard Article 28 January 1960 में 5 लाख) के साथ रणथंभौर पर आक्रमण किये थे महाराज वाग्भट चौहान इस युद्ध को मानो जीवन और मरण की युद्ध मान लिए थे हार का परिणाम मानो वोह देखना ही नही चाहते थे उलूग खां के पास विशाल सेना था परन्तु महाराज वाग्भट के पास सेना की संख्या भले ही अत्याल्प होंगे परन्तु पराक्रम में उलूग खां के लाखो सैनिकों के समान थे राजपूत वीरो की टोली यह युद्ध प्रलय मचा देनेवाले युद्ध में से एक माना जाता हैं “ ऐसा माना जाता हैं वाग्भट की सैनिको के तलवार जब भी उठ रहे थे मलेच्छ सैनिको के सर धर से अलग हो रहे थे” महाराज वाग्भट घायल होने के बाद भी रणभूमी से अपना पग एक इंच भी नहीं हटाये बहाउद्दीन ऐबक की मस्तक धर से अलग होकर भूमि पर गिरते ही उलूग खां दिल्ली हाथ से जाता देख रणभूमि से भाग खड़ा हुआ।
सन १२५३ ईस्वी (1253 A.D) दूसरा एवं अंतिम युद्ध उलुग खां महाराज वाग्भट की पराक्रम से निसंदेह परिचित था इसलिए कोई भूल नही करना चाहता था सेना की संख्या दुगनी कर दिया इस बात की पुष्टि (Ulugh khan had in that year, prepared a large force to attack Ranthambhor and other important Hindu strongholds Early Chauhan Dynasties Dasharatha Sharma) महाराज वाग्भट की ऐसी पराक्रमी शौर्य से परिपूर्ण कहानी को इसलिए छुपा दिया गया क्योंकि यह दबे कुचले जाती याँ शांतिप्रिय मजहब से नही हैं , महाराज वाग्भट ने अपनी मृत्युंजयी सेना के साथ उलूग खां की सेना पर घायल शेरो की तरह टूट पड़े उलूग खां घायल होकर अपनी सेना के साथ नागौर से होते हुए दिल्ली भाग गये महाराज वाग्भट ने हिंदुत्व की शक्ति एवं पराक्रम से मलेच्छ सेनाओ को ना केवल अवगत करवाया साथ ही भारत के कयी राज्य जो मलेच्छ सेनाओं के आधीन थे उन्हें भी मुक्त करवाया सल्तनत रह गयी दिल्ली से गुरुग्राम (वर्त्तमान गुड़गांव) तक सल्तनत ऐसी परिस्थितियों में निरंतर दुर्बल होती जा रही थी। नसीरुद्दीन और उसके गुट का भी शीघ्र ही अंत हो गया । यह सत्य है कि इस संक्रमण काल में हिंदू भी अपनी शक्ति प्रभुत्व का पर्याप्त लाभ लेने में असमर्थ रहे थे। परंतु ‘तबाक़त-ई-नसीरी ’ के लेखक मिन्हाज-उस-सिराज ने लिखा है कि- वाग्भट की पराक्रम से मुग्ध होकर योध्या के योद्धा हिन्दुस्थान का रईस की उपाधि से विभूषित किया इस बात की उल्लेख Early Chauhan Dynasties Dasharatha Sharma पृष्ठ-: 120-121 में उल्लेख हैं ( “Minhaj call him (Vagbhata) The greatest of the Rais of Hindustan) एवं पृष्ठ-: 121 ( “Vagbhata the greatest of the Rais, and the most noble and illustrious of all the princess of Hindustan) ।

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