Cross collum

Thursday, April 20, 2017

*मेरे पूर्वज तो बंदर नही थे और आपके स्वयं विचार करें*

*मेरे पूर्वज तो बंदर नही थे और आपके स्वयं विचार करें*


और कितना झूठ पढ़ाआगे.?

हमें पढ़ाया जाता है कि हमारे पूर्वज जंगल में रहते थे, हम पहले बंदर थे , हमारे पूर्वज शिकार करते थे और सिर्फ मांस भक्षण करते थे। क्योंकि उस युग में कृषि नहीं होती थी।
क्या यही सच्चाई है या कुछ और?
*भाई मान गए कि कृषि नहीं होती थी लेकिन जंगल में फल और कंद-मूल की कमी तो नहीं थी। और हम बंदर की संतान है तो माँसाहारी कैसे हुए ..? अगर किसी बंदर या इन्सान को भूख लगेगी तो वह जानवर को खोजेगा उसका शिकार करके खाने के लिए , या फिर पेड़ से फल तोड़ेगा और भूख मिटाएगा।*
कौन सा काम आसान और सुलभ है जरा सोचिये ..?

*जंगल में गाय, भैंस तो होती होंगी। उनका दूध पीकर भूख भूख मिटाना आसान होगा या उनको खाकर ..?*

चलिए मान लिया की पत्थर का हथियार बनाएगा और शेर के मुहं से उसका शिकार छीन के खुद खा गया , लेकिन सृष्टि में पहले शेर आया या मानव ..? और मानव के लिए सृष्टि जीव देगी या वनस्पति .,?  किन्तु जितनी भी जड़ी-बूटी और आयुर्वेद की जानकारी हमारे पूर्वजों को थी क्या वह बिना शाक-पात खाए किसी को हो सकती है ?

क्या मांसाहार करने वाला बता सकता है कि हल्दी  कितनी गुणकारी है ..? तुलसी , गिलोय से बुखार ठीक होता है, तुलसी में सबसे ज्यादा रोग निरोधक क्षमता होती है या कौन से जड़ी बूटी से क्या फायदा होता है?

*अगर हमारे पूर्वजों ने मांसाहार किया होता तो वह यह बताते कि अंडे में प्रोटीन होती है लेकिन हमारे पूर्वजों ने बताया कि दाल में प्रोटीन होती है। कभी यह नहीं बताया कि फलाना मांस सेहत के लाभकारी है। हमेशा यही बताया की फलाना  पौधा इस बीमारी में लाभकारी है।*

इसके बाद भी आपको लगता है कि जो इतिहास हमें पढाया जाता है वह सही है, तो हो सकता है कि आपके पुर्वज वास्तव में जंगली हों और भूख मिटाने के लिए कच्चे मांस खाते हो।

जिन्होंने हम पर राज करा उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था बदल कर हमारी असली पहचान को मिटा दिया

1947 में कहा गया की हमे आज़ादी मिल गई परन्तु हम आज भी वही पढ़ रहे है जो अंग्रेज हमे पढाना चाहते थे
हम आज भी अंग्रेजो की बनाई व्यवस्था में ही जी रहे है

पहले शारीर से गुलाम थे अब मानसिक गुलाम और ये गुलामी शारीरिक गुलामी से ज्यादा खतरनाक है

रितेश राठोर,"आर्य"

धन्यवाद}

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