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Thursday, April 20, 2017

हमारे परम्पराओ का विनाश

काफी पहले पंद्रहवीं शताब्दी में ही जब फ्रांसिस ज़ेवियर जैसे लोग भारत में आत्माओं की फसल काटने आये तभी उन्हें समझ आ गया था कि कई पर्तों वाले इस समाज को पूरी तरह कुचलना आसान नहीं है। जहाँ बाकी जगह उनकी लड़ाइयों में पूरा पूरा देश एक बार में अपना पुराना धर्म अपनी संस्कृति छोड़ कर उनके रंग में रंग जाता था, वैसा करना भारत पर मुमकिन नहीं हो रहा था। वर्ण व्यवस्था के कारण सब के सब एक बार में बदलते ही नहीं थे ! भारत से जाने के समय तक फ्रांसिस ज़ेवियर हत्याएं करवाता रहा, ब्राह्मणों को गालियाँ देता रहा, लेकिन कामयाब नहीं हुआ।

करीब तीन सौ साल में सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के बाद फिरंगियों के सामने कोई बड़ा विरोध नहीं बचा था। जो इक्का दुक्का सरदार बचे भी थे उनकी हत्या के बाद करीब तीस साल में फिरंगी पूरी तरह भारत पर काबिज़ हो चुके थे। अब उनकी जरूरत किसी विद्रोह को कुचलने की नहीं थी, वो चाहते थे कि भारत में अगला कोई विद्रोह शुरू ही ना हो सके। इस काम के लिए सबसे पहले तो सांस्कृतिक एकता के स्थलों यानि कि मंदिरों को शक्तिहीन किया गया। उनके आर्थिक स्रोत हथिया लिए गए जिस से वो लड़ने की सोच ना सकें।

जब तक विचारों को ना कुचला जाता तब तक इसाई मजहब और उसके जरिये सांस्कृतिक विरोध को दबाना मुमकिन नहीं था। इसी कड़ी में भारत में कई प्रचारकों और प्रशासनिक इकाइयों ने काम करना शुरू किया। उनका हथियार था साहित्य, जिस से सभ्यता के पुराने रूप को या तो विकृत किया जाना था या नए को पनपने से रोकना था। 1860 के बाद के दौर में अच्छे लेखकों और वक्ताओं को प्रश्रय देना शुरू किया गया। मुग़ल शासन का अंत होने पर मिर्जा ग़ालिब भी कुछ समय अंग्रेजों की सेवा में रहे थे।

सन 1890 के आस पास जब ब्रिटिश भारत में जम चुके थे तो भारत में उनका सिक्का जमाने वालों में से एक जॉन स्ट्राचे (Sir John Strachey) कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में भारत पर लेक्चर दे रहे थे। इन सारे लेक्चर्स को बाद में संकलित कर के एक किताब की शक्ल दी गई जिसका ना था “इंडिया”। ब्रिटिश राज के शुरुआती दौर में उसकी फ़ौज और उसके सिविल सर्विस की जब बात होती है तो ज्यादातर इसी किताब से उदाहरण दिए जाते हैं। हाल में जो एक झूठ प्रचारित करने की दोबारा कोशिश की गई थी कि “भारत अंग्रेजों से पहले कोई एक देश नहीं था” वो दरअसल इसी किताब से इसी जॉन स्ट्राचे का आईडिया था।

स्ट्राचे के हिसाब से यूरोप के देशों के आपसी मतभेदों की तुलना में भारत के “देशों” के आपसी मतभेद बहुत ज्यादा थे। उनके हिसाब से स्कॉटलैंड और स्पेन में कुछ चीज़ें मिलती जुलती हो सकती हैं, लेकिन बंगाल और पंजाब बिलकुल अलग अलग हैं। उनके हिसाब से भारत के अलग अलग हिस्सों में कभी कभी “राष्ट्रवाद” पनप सकता था, लेकिन वो सिर्फ एक छोटे से हिस्से के लिए होगा, मद्रास, पंजाब, बंगाल और उत्तर-पश्चिम के प्रान्त सब एक साथ एक राष्ट्रवाद की बात करें ऐसा नहीं हो सकता। जिस वक्त स्ट्राचे ये बातें कर रहे थे ठीक उसी समय भारत में एक फिरंगी ए.ओ.ह्यूम्स की सहायता से भारतीय कांग्रेस नाम का एक संगठन बना रहे थे।

सभी हिन्दुस्तानियों की एक साथ बात करने वाले एक डिबेट क्लब से फिर लाल, बाल, पाल के दौर तक आने और अंत में गाँधी के शामिल होने और उनके छोड़ने तक कांग्रेस का अपना ही इतिहास रहा है। लेकिन सन 1890 से लकर 1940 हो जाने के और पचास लम्बे सालों में भी भारत के शत्रुओं ने कभी भारत को एक राष्ट्र के तौर पर स्वीकार नहीं किया। सन 1930-31 के बीच के अपने भाषणों में विंस्टन चर्चिल (थोड़ी सी सभ्य भाषा में) करीब करीब वही दोहराता रहा जो पहले ही फ्रांसिस ज़ेवियर काफी पहले कह गया था।

“आवर ड्यूटी टू इंडिया” में अल्बर्ट हॉल के अपने भाषण में 1931 की शुरुआत में चर्चिल का कहना था कि वो भारत को ब्राह्मणों के शासन के लिए नहीं छोड़ सकता। ये एक भारतीय जनता के प्रति अपराधिक और क्रूर उपेक्षा होगी। उसके हिसाब से अंग्रेजों के जाते ही अंग्रेजों द्वारा स्थापित, न्यायिक, रेलवे, चकित्सा जैसे सारे तंत्र ख़त्म हो जाते और भारत वापस मध्ययुगीन बर्बरता के समय में पहुँच जाता। इस दौर के “नमक सत्याग्रह” के दौरान जब भारत को उपनिवेश बनाने की चर्चा चल रही थी तो चर्चिल इसे कपोल कल्पना और कपट भरी साजिश बता रहा था। सन 1947 के बाद भी ऐसी चर्चा बंद हो गई हो ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ। फ्रांसिस ज़ेवियर की परंपरा का निर्वाह करते हुए रोबर्ट डाह्ल भारतीय गणतंत्र के लम्बे समय टिकने को संदिग्ध बताता है। भारत में लोकतंत्र के दो दशक बीतने के बाद एक भारत के प्रति “सहानुभूति” रखने वाले ब्रिटिश पत्रकार डॉन टेलर का सवाल था कि क्या भारत एक रह पायेगा ? 524 मिलियन लोगों और पंद्रह प्रमुख भाषाओँ वाला देश टूटेगा कब इस इंतजार में 1970 के दशक का डॉन टेलर भी रहा।

अपने सांस्कृतिक नजरिये से आक्रमणकारियों को भारत हमेशा अप्राकृतिक लगता रहा।

आश्चर्य की बात थी कि सर सोच सकता है, हाथ सोच नहीं सकता फिर दोनों ही एक शरीर क्यों हैं ? दिमाग हाथ को अलग क्यों नहीं करता ? हाथ के किसी काम से पैर का कोई फायदा होता भी नहीं दिखता था। पैर को पूरे शरीर का वजन भी उठाना पड़ता, गंदगी में भी चलने के लिए पैर इस्तेमाल होता था, फिर भी वो हाथ को अपने से अलग करने की जिद नहीं मचा रहा था। जब स्वाद का सुख सारा मूंह को मिल रहा था तो फिर उसके खाए को पेट क्यों पचाए ? एक दूसरे के लिए, मुफ्त की मेहनत करने वाले शरीर के हिस्से, एक साथ क्यों हैं, ये आक्रमणकारी सभ्यता को समझ में ही नहीं आ पा रहा था। ये सवाल अब भी बाकी है।

ऐसा ही एक बड़ा सा सवाल है कि राष्ट्र पर, लम्बे समय के वैचारिक हमले पर ये लेख लिखा कैसे गया ? इस दूसरे साधारण से सवाल का जवाब हम दे सकते हैं। हमने रामचंद्र गुहा की लिखी इंडिया आफ्टर गांधी से कुछ जानकारी उठाई है, (करीब करीब हुबहू नक़ल है!) उसमें अपनी धूर्तता मिलाई है और सामने रख दिया है। आम तौर पर पूछने से रामचंद्र गुहा कोई राष्ट्रवादी नहीं माने जायेंगे। आम भारतीय जो सोचता है, उस हिसाब से वो कुछ भी बोल या लिख नहीं रहे होते।

तो सवाल है उनके ही लिखे को ये भगवा कैसे रंग दिया ? आसान है। भारत में हमेशा से नीर-क्षीर विवेक की बात की जाती है। भावना में बहे जाते मूर्ख लोग उसे भक्ति से जोड़ते हैं। हमने बिलकुल वही उठा कर गुहा के लिखे में से तथ्य निकाले, और फिर उन्हें उनके निकाले हुए अर्थ को हटा कर अपने हिसाब के अर्थ के साथ एक जगह कर डाला है। ये काम बिलकुल आसान है और ये किसी भी किताब पर किया जा सकता है। क्या पढ़ना जरूरी है, क्या सच है, और किसे पढ़े बिना छोड़ देना चाहिए, कौन सा इंटरप्रिटेशन है वो तय किया जा सकता है।

सालों पे गौर कीजिये तो दिखेगा की 1890 से 1947 सिर्फ पांच दशक ही हैं। पचास साल भी इतिहास होता है। अपना इतिहास खुद लिखना सीखिए। तथ्य आपको अख़बारों में मिलते हैं, मोबाइल के कैमरे में ले सकते हैं। कोई और आकर नहीं करने वाला है, ये आपका काम है। आपका इतिहास कोई और आकर क्यों लिखेगा भला ? कामचोरी छोड़कर खुद को कष्ट दीजिये। सावरकर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर लिख कर जा चुके। इस दौर का आपको खुद ही लिखना होगा। आह वाह करते सर हिलाने के बदले हाथ पैर हिलाइए।

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आनन्द कुमार
धन्यवाद}

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