Cross collum

Thursday, April 20, 2017

हवाईज़ादा” एवं वैमानिक शास्त्र – कथित बुद्धिजीवियों में इतनी बेचैनी क्यों है? (भाग - १)

हवाईज़ादा” एवं वैमानिक शास्त्र – कथित बुद्धिजीवियों में इतनी बेचैनी क्यों है?
(भाग - १)

By:- सुरेश चिपलूनकर (दो वर्ष पूर्व का लेख)

जैसे ही यह निश्चित हुआ, कि मुम्बई में सम्पन्न होने वाली 102 वीं विज्ञान कांग्रेस में भूतपूर्व फ्लाईट इंजीनियर एवं पायलट प्रशिक्षक श्री आनंद बोडस द्वारा भारतीय प्राचीन विमानों पर एक शोधपत्र पढ़ा जाएगा, तभी यह तय हो गया था कि भारत में वर्षों से विभिन्न अकादमिक संस्थाओं पर काबिज, एक “निहित स्वार्थी बौद्धिक समूह” अपने पूरे दमखम एवं सम्पूर्ण गिरोहबाजी के साथ बोडस के इस विचार पर ही हमला करेगा, और ठीक वैसा ही हुआ भी. एक तो वैसे ही पिछले बारह वर्ष से नरेंद्र मोदी इस “गिरोह” की आँखों में कांटे की तरह चुभते आए हैं, ऐसे में यदि विज्ञान काँग्रेस का उदघाटन मोदी करने वाले हों, इस महत्त्वपूर्ण आयोजन में “प्राचीन वैमानिकी शास्त्र” पर आधारित कोई रिसर्च पेपर पढ़ा जाने वाला हो तो स्वाभाविक है कि इस बौद्धिक गिरोह में बेचैनी होनी ही थी. ऊपर से डॉक्टर हर्षवर्धन ने यह कहकर माहौल को और भी गर्मा दिया कि पायथागोरस प्रमेय के असली रचयिता भारत के प्राचीन ऋषि थे, लेकिन उसका “क्रेडिट” पश्चिमी देश ले उड़े हैं.

खैर... बात हो रही थी वैमानिकी शास्त्र की... सभी विद्वानों में कम से कम इस बात को लेकर दो राय नहीं हैं कि महर्षि भारद्वाज द्वारा वैमानिकी शास्त्र लिखा गया था. इस शास्त्र की रचना के कालखंड को लेकर विवाद किया जा सकता है, लेकिन इतना तो निश्चित है कि जब भी यह लिखा गया होगा, उस समय तक हवाई जहाज़ का आविष्कार करने का दम भरने वाले “राईट ब्रदर्स” की पिछली दस-बीस पीढियाँ पैदा भी नहीं हुई होंगी. ज़ाहिर है कि प्राचीन काल में विमान भी था, दूरदर्शन भी था (महाभारत-संजय प्रकरण), अणु बम (अश्वत्थामा प्रकरण) भी था, प्लास्टिक सर्जरी (सुश्रुत संहिता) भी थी। यानी वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन सवाल तो यह है कि वह सब कहां चला गया? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों साल पहले जिन बातों की “कल्पना”(?) की गई थी, ठीक उसी प्रकार एक के बाद एक वैज्ञानिक आविष्कार हुए? अर्थात उस प्राचीन काल में उन्नत टेक्नोलॉजी तो मौजूद थी, वह किसी कारणवश लुप्त हो गई. जब तक इस बारे में पक्के प्रमाण सामने नहीं आते, उसे शेष विश्व द्वारा मान्यता नहीं दी जाएगी. “प्रगतिशील एवं सेकुलर-वामपंथी गिरोह” द्वारा इसे वैज्ञानिक सोच नहीं माना जाएगा, “कोरी गप्प” माना जाएगा... फिर सच्चाई जानने का तरीका क्या है? इन शास्त्रों का अध्ययन हो, उस संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार किया जाए, जिसमें ये शास्त्र या ग्रन्थ लिखे गए हैं. चरक, सुश्रुत वगैरह की बातें किसी दूसरे लेख में करेंगे, तो आईये संक्षिप्त में देखें कि महर्षि भारद्वाज लिखित “वैमानिकी शास्त्र” पर कम से कम विचार किया जाना आवश्यक क्यों है... इसको सिरे से खारिज क्यों नहीं किया जा सकता.


जब भी कोई नया शोध या खोज होती है, तो उस आविष्कार का श्रेय सबसे पहले उस “विचार” को दिया जाना चाहिए, उसके बाद उस विचार से उत्पन्न हुई आविष्कार के सबसे पहले “प्रोटोटाइप” को महत्त्व दिया जाना चाहिए. लेकिन राईट बंधुओं के मामले में ऐसा नहीं किया गया. शिवकर बापूजी तलपदे ने इसी वैमानिकी शास्त्र का अध्ययन करके सबसे पहला विमान बनाया था, जिसे वे सफलतापूर्वक 1500 फुट की ऊँचाई तक भी ले गए थे, फिर जिस “आधुनिक विज्ञान” की बात की जाती है, उसमें महर्षि भारद्वाज न सही शिवकर तलपदे को सम्मानजनक स्थान हासिल क्यों नहीं है? क्या सबसे पहले विमान की अवधारणा सोचना और उस पर काम करना अदभुत उपलब्धि नहीं है? क्या इस पर गर्व नहीं होना चाहिए? क्या इसके श्रेय हेतु दावा नहीं करना चाहिए? फिर यह सेक्यूलर गैंग बारम्बार भारत की प्राचीन उपलब्धियों को लेकर शेष भारतीयों के मन में हीनभावना क्यों रखना चाहती है?

अंग्रेज शोधकर्ता डेविड हैचर चिल्द्रेस ने अपने लेख Technology of the Gods – The Incredible Sciences of the Ancients (Page 147-209) में लिखते हैं कि हिन्दू एवं बौद्ध सभ्यताओं में हजारों वर्ष से लोगों ने प्राचीन विमानों के बारे सुना और पढ़ा है. महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित “यन्त्र-सर्वस्व” में इसे बनाने की विधियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है. इस ग्रन्थ को चालीस उप-भागों में बाँटा गया है, जिसमें से एक है “वैमानिक प्रकरण, जिसमें आठ अध्याय एवं पाँच सौ सूत्र वाक्य हैं. महर्षि भारद्वाज लिखित “वैमानिक शास्त्र” की मूल प्रतियाँ मिलना तो अब लगभग असंभव है, परन्तु सन 1952 में महर्षि दयानंद के शिष्य स्वामी ब्रह्ममुनी परिव्राजक द्वारा इस मूल ग्रन्थ के लगभग पाँच सौ पृष्ठों को संकलित एवं अनुवादित किया गया था, जिसकी पहली आवृत्ति फरवरी 1959 में गुरुकुल कांगड़ी से प्रकाशित हुई थी. इस आधी-अधूरी पुस्तक में भी कई ऐसी जानकारियाँ दी गई हैं, जो आश्चर्यचकित करने वाली हैं.

इसी लेख में डेविड हैचर लिखते हैं कि प्राचीन भारतीय विद्वानों ने विभिन्न विमानों के प्रकार, उन्हें उड़ाने संबंधी “मैनुअल”, विमान प्रवास की प्रत्येक संभावित बात एवं देखभाल आदि के बारे में विस्तार से “समर सूत्रधार” नामक ग्रन्थ में लिखी हैं. इस ग्रन्थ में लगभग 230 सूत्रों एवं पैराग्राफ की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ हैं. डेविड आगे कहते हैं कि यदि यह सारी बातें उस कालखंड में लिखित एवं विस्तृत स्वरूप में मौजूद थीं तो क्या ये कोरी गल्प थीं? क्या किसी ऐसी “विशालकाय वस्तु” की भौतिक मौजूदगी के बिना यह सिर्फ कपोल कल्पना हो सकती है? परन्तु भारत के परम्परागत इतिहासकारों तथा पुरातत्त्ववेत्ताओं ने इस “कल्पना”(?) को भी सिरे से खारिज करने में कोई कसर बाकी न रखी. एक और अंग्रेज लेखक एंड्रयू टॉमस लिखते हैं कि यदि “समर सूत्रधार” जैसे वृहद एवं विस्तारित ग्रन्थ को सिर्फ कल्पना भी मान लिया जाए, तो यह निश्चित रूप से अब तक की सर्वोत्तम कल्पना या “फिक्शन उपन्यास” माना जा सकता है. टॉमस सवाल उठाते हैं कि रामायण एवं महाभारत में भी कई बार “विमानों” से आवागमन एवं विमानों के बीच पीछा अथवा उनके आपसी युद्ध का वर्णन आता है. इसके आगे मोहन जोदड़ो एवं हडप्पा के अवशेषों में भी विमानों के भित्तिचित्र उपलब्ध हैं. इसे सिर्फ काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए था. पिछले चार सौ वर्ष की गुलामी के दौर ने कथित बौद्धिकों के दिलो-दिमाग में हिंदुत्व, संस्कृत एवं प्राचीन ग्रंथों के नाम पर ऐसी हीन ग्रंथि पैदा कर दी है, उन्हें सिर्फ अंग्रेजों, जर्मनों अथवा लैटिनों का लिखा हुआ ही परम सत्य लगता है. इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि दुनिया में सिर्फ ऑक्सफोर्ड और हारवर्ड दो ही विश्वविद्यालय हैं, जबकि वास्तव में हुआ यह था कि प्राचीन तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय जहाँ आक्रान्ताओं द्वारा भीषण अग्निकांड रचे गए अथवा सैकड़ों घोड़ों पर संस्कृत ग्रन्थ लादकर अरब, चीन अथवा यूरोप ले जाए गए. हाल-फिलहाल इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा बिना किसी शोध अथवा सबूत के संस्कृत ग्रंथों एवं लुप्त हो चुकी पुस्तकों/विद्याओं पर जो हाय-तौबा मचाई जा रही है, वह इसी गुलाम मानसिकता का परिचायक है.


इन लुप्त हो चुके शास्त्रों, ग्रंथों एवं अभिलेखों की पुष्टि विभिन्न शोधों द्वारा की जानी चाहिए थी कि आखिर यह तमाम ग्रन्थ और संस्कृत की विशाल बौद्धिक सामग्री कहाँ गायब हो गई? ऐसा क्या हुआ था कि एक बड़े कालखण्ड के कई प्रमुख सबूत गायब हैं? क्या इनके बारे में शोध करना, तथा तत्कालीन ऋषि-मुनियों एवं प्रकाण्ड विद्वानों ने यह “कथित कल्पनाएँ” क्यों की होंगी? कैसे की होंगी? उन कल्पनाओं में विभिन्न धातुओं के मिश्रण अथवा अंतरिक्ष यात्रियों के खान-पान सम्बन्धी जो नियम बनाए हैं वह किस आधार पर बनाए होंगे, यह सब जानना जरूरी नहीं था? लेकिन पश्चिम प्रेरित इन इतिहासकारों ने सिर्फ खिल्ली उड़ाने में ही अपना वक्त खराब किया है और भारतीय ज्ञान को बर्बाद करने की सफल कोशिश की है.

ऑक्सफोर्ड विवि के ही एक संस्कृत प्रोफ़ेसर वीआर रामचंद्रन दीक्षितार अपनी पुस्तक “वार इन द एन्शियेंट इण्डिया इन 1944” में लिखते हैं कि आधुनिक वैमानिकी विज्ञान में भारतीय ग्रंथों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. उन्होंने बताया कि सैकड़ों गूढ़ चित्रों द्वारा प्राचीन भारतीय ऋषियों ने पौराणिक विमानों के बारे में लिखा हुआ है. दीक्षितार आगे लिखते हैं कि राम-रावण के युद्ध में जिस “सम्मोहनास्त्र” के बारे में लिखा हुआ है, पहले उसे भी सिर्फ कल्पना ही माना गया, लेकिन आज की तारीख में जहरीली गैस छोड़ने वाले विशाल बम हकीकत बन चुके हैं. पश्चिम के कई वैज्ञानिकों ने प्राचीन संस्कृत एवं मोड़ी लिपि के ग्रंथों का अनुवाद एवं गहन अध्ययन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि निश्चित रूप से भारतीय मनीषियों/ऋषियों को वैमानिकी का वृहद ज्ञान था. यदि आज के भारतीय बुद्धिजीवी पश्चिम के वैज्ञानिकों की ही बात सुनते हैं तो उनके लिए चार्ल्स बर्लित्ज़ का नाम नया नहीं होगा. प्रसिद्ध पुस्तक “द बरमूडा ट्राएंगल” सहित अनेक वैज्ञानिक पुस्तकें लिखने वाले चार्ल्स बर्लित्ज़ लिखते हैं कि, “यदि आधुनिक परमाणु युद्ध सिर्फ कपोल कल्पना नहीं वास्तविकता है, तो निश्चित ही भारत के प्राचीन ग्रंथों में ऐसा बहुत कुछ है जो हमारे समय से कहीं आगे है”. 400 ईसा पूर्व लिखित “ज्योतिष” ग्रन्थ में ब्रह्माण्ड में धरती की स्थिति, गुरुत्वाकर्षण नियम, ऊर्जा के गतिकीय नियम, कॉस्मिक किरणों की थ्योरी आदि के बारे में बताया जा चुका है. “वैशेषिका ग्रन्थ” में भारतीय विचारकों ने परमाणु विकिरण, इससे फैलने वाली विराट ऊष्मा तथा विकिरण के बारे में अनुमान लगाया है. (स्रोत :- Doomsday 1999 – By Charles Berlitz, पृष्ठ 123-124).

इसी प्रकार कलकत्ता संस्कृत कॉलेज के संस्कृत प्रोफ़ेसर दिलीप कुमार कांजीलाल ने 1979 में Ancient Astronaut Society की म्यूनिख (जर्मनी) में सम्पन्न छठवीं काँग्रेस के दौरान उड़ सकने वाले प्राचीन भारतीय विमानों के बारे में एक उदबोधन दिया एवं पर्चा प्रस्तुत किया था (सौभाग्य से उस समय वहाँ सतत खिल्ली उड़ाने वाले, आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी नहीं थे). प्रोफ़ेसर कांजीलाल के अनुसार ईसा पूर्व 500 में “कौसितकी” एवं “शतपथ ब्रह्मण” नामक कम से कम दो और ग्रन्थ थे, जिसमें अंतरिक्ष से धरती पर देवताओं के उतरने का उल्लेख है. यजुर्वेद में उड़ने वाले यंत्रों को “विमान” नाम दिया गया, जो “अश्विन” उपयोग किया करते थे. इसके अलावा भागवत पुराण में भी “विमान” शब्द का कई बार उल्लेख हुआ है. ऋग्वेद में “अश्विन देवताओं” के विमान संबंधी विवरण बीस अध्यायों (1028 श्लोकों) में समाया हुआ है, जिसके अनुसार अश्विन जिस विमान से आते थे, वह तीन मंजिला, त्रिकोणीय एवं तीन पहियों वाला था एवं यह तीन यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम था. कांजीलाल के अनुसार, आधे-अधूरे स्वरूप में हासिल हुए वैमानिकी संबंधी इन संस्कृत ग्रंथों में उल्लिखित धातुओं एवं मिश्रणों का सही एवं सटीक अनुमान तथा अनुवाद करना बेहद कठिन है, इसलिए इन पर कोई विशेष शोध भी नहीं हुआ. “अमरांगण-सूत्रधार” ग्रन्थ के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर एवं इंद्र के अलग-अलग पाँच विमान थे. आगे चलकर अन्य ग्रंथों में इन विमानों के चार प्रकार रुक्म, सुंदरा, त्रिपुर एवं शकुन के बारे में भी वर्णन किया गया है, जैसे कि “रुक्म” शंक्वाकार विमान था जो स्वर्ण जड़ित था, जबकि “त्रिपुर विमान” तीन मंजिला था. महर्षि भारद्वाज रचित “वैमानिकी शास्त्र” में यात्रियों के लिए “अभ्रक युक्त” (माएका) कपड़ों के बारे में बताया गया है, और जैसा कि हम जानते हैं आज भी अग्निरोधक सूट में माईका अथवा सीसे का उपयोग होता है, क्योंकि यह ऊष्मारोधी है.



भारत के मौजूदा मानस पर पश्चिम का रंग कुछ इस कदर चढ़ा है कि हममें से अधिकांश अपनी खोज या किसी रचनात्मक उपलब्धि पर विदेशी ठप्पा लगते देखना चाहते हैं. इसके बाद हम एक विशेष गर्व अनुभव करते हैं. ऐसे लोगों के लिए मैं प्राचीन भारतीय विमान के सन्दर्भ में एरिक वॉन डेनिकेन की खोज के बारे में बता रहा हूँ उससे पहले एरिक वॉन डेनिकेन का परिचय जरुरी है. 79 वर्षीय डेनिकेन एक खोजी और बहुत प्रसिद्ध लेखक हैं. उनकी लिखी किताब 'चेरिएट्स ऑफ़ द गॉड्स' बेस्ट सेलर रही है. डेनिकेन की खूबी हैं कि उन्होंने प्राचीन इमारतों और स्थापत्य कलाओं का गहन अध्ययन किया और अपनी थ्योरी से साबित किया है कि पूरे विश्व में प्राचीन काल में एलियंस (परग्रही) पृथ्वी पर आते-जाते रहे हैं. एरिक वॉन डेनिकेन 1971 में भारत में कोलकाता गए थे. वे अपनी 'एंशिएंट एलियंस थ्योरी' के लिए वैदिक संस्कृत में कुछ तलाशना चाहते थे. डेनिकेन यहाँ के एक संस्कृत कालेज में गए. यहाँ उनकी मुलाकात इन्हीं प्रोफ़ेसर दिलीप कंजीलाल से हुई थी. प्रोफ़ेसर ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का आधुनिकीकरण किया है. देवताओं के विमान यात्रा वृतांत ने वोन को खासा आकर्षित किया. वोन ने माना कि ये वैदिक विमान वाकई में नटबोल्ट से बने असली एयर क्राफ्ट थे. उन्हें हमारे मंदिरों के आकार में भी विमान दिखाई दिए. उन्होंने जानने के लिए लम्बे समय तक शोध किया कि भारत में मंदिरों का आकार विमान से क्यों मेल खाता है?  उनके मुताबिक भारत के पूर्व में कई ऐसे मंदिर हैं जिनमे आकाश में घटी खगोलीय घटनाओ का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है. वॉन के मुताबिक ये खोज का विषय है कि आख़िरकार मंदिर के आकार की कल्पना आई कहाँ से? इसके लिए विश्व के पहले मंदिर की खोज जरुरी हो जाती है और उसके बाद ही पता चल पायेगा कि विमान के आकार की तरह मंदिरों के स्तूप या शिखर क्यों बनाये गए थे? हम आज उसी उन्नत तकनीक की तलाश में जुटे हैं जो कभी भारत के पास हुआ करती थी.

चूँकि यह लेख एक विस्तृत विषय पर है, इसलिए इसे दो भागों में पेश करने जा रहा हूँ... शेष दूसरे भाग में... जल्दी ही... नमस्कार.

भारतीय सेना 10 सर्वश्रेष्ठ अनमोल वचन: अवश्य पढें। इन्हें पढकर सच्चे गर्व की अनुभूति होती है...

✌🎖

भारतीय सेना 10 सर्वश्रेष्ठ अनमोल वचन: अवश्य पढें।
इन्हें पढकर सच्चे गर्व की अनुभूति होती है...

1.
" *मैं तिरंगा फहराकर वापस आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर आऊंगा, लेकिन मैं वापस अवश्य आऊंगा।*"
- कैप्टन विक्रम बत्रा,
  परम वीर चक्र

2.
" *जो आपके लिए जीवनभर का असाधारण रोमांच है, वो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी है।* "
- लेह-लद्दाख राजमार्ग पर साइनबोर्ड (भारतीय सेना)

3.
" *यदि अपना शौर्य सिद्ध करने से पूर्व मेरी मृत्यु आ जाए तो ये मेरी कसम है कि मैं मृत्यु को ही मार डालूँगा।*"
- कैप्टन मनोज कुमार पाण्डे,
परम वीर चक्र, 1/11 गोरखा राइफल्स

4.
" *हमारा झण्डा इसलिए नहीं फहराता कि हवा चल रही होती है, ये हर उस जवान की आखिरी साँस से फहराता है जो इसकी रक्षा में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देता है।*"
- भारतीय सेना

5.
" *हमें पाने के लिए आपको अवश्य ही अच्छा होना होगा, हमें पकडने के लिए आपको तीव्र होना होगा, किन्तु हमें जीतने के लिए आपको अवश्य ही बच्चा होना होगा।*"
- भारतीय सेना

6.
" *ईश्वर हमारे दुश्मनों पर दया करे, क्योंकि हम तो करेंगे नहीं।"*
- भारतीय सेना

7.
" *हमारा जीना हमारा संयोग है, हमारा प्यार हमारी पसंद है, हमारा मारना हमारा व्यवसाय है।*
- अॉफीसर्स ट्रेनिंग अकादमी, चेन्नई

8.
" *यदि कोई व्यक्ति कहे कि उसे मृत्यु का भय नहीं है तो वह या तो झूठ बोल रहा होगा या फिर वो इंडियन आर्मी का  ही होगा।*"
- फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

9.
" *आतंकवादियों को माफ करना ईश्वर का काम है, लेकिन उनकी ईश्वर से मुलाकात करवाना हमारा काम है।*"
- भारतीय सेना

10.
" *इसका हमें अफसोस है कि अपने देश को देने के लिए हमारे पास केवल एक ही जीवन है।*"
- अॉफीसर प्रेम रामचंदानी

💐💐 🙏🙏🙏 💐💐
🙏
इसे आगे बढाते जाएं... 👍
Sabको इंडियन आर्मी से रूबरू कराये।

।।जयहिंद......


Plz support to indian army

चंपारण सत्याग्रह

चंपारण सत्याग्रह

By:- आनन्द कुमार


जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद चंपारण सत्याग्रह पर किताब लिखने बैठे तो वो किताब ढाई सौ पन्ने की हो गई | ऐसे ज्ञानी लोगों को जिस काल के बारे में लिखने में इतने शब्दों की जरूरत पड़ती हो उस दौर का हम आज बस अंदाजा ही लगा सकते हैं | ये दौर सौ साल पहले के चंपारण का था, चंपारण जिसके नाम में ही ‘रण’ है | लेकिन ये रण जरा अनोखा था, यहाँ एक ओर तो सशस्त्र प्रशासनिक बल थे, मगर दूसरी ओर के निहत्थे किसान ‘अहिंसा’ के सिद्धांतों पर अडिग डटे थे |

चम्पारण आन्दोलन की एक ख़ास बात ये भी थी कि किसानों के इस अन्दोलन का नेतृत्व बुद्धिजीवी कर रहे थे | गांधीजी, राजेन्द्र प्रसाद, बृजकिशोर प्रशाद और मौलाना मजहरुल हक़ जैसे नेताओं ने इसका नेतृत्व संभाला | इसकी वजह से आन्दोलन अपनी दिशा से कभी भटका नहीं और अपने उद्देश्यों के प्रति अवाम स्पष्ट थी | जब 10 अप्रैल 1914 को चम्पारण के किसानों की दुर्दशा पर बिहार प्रान्त की कांग्रेस कमिटी की बैठक में चर्चा हुई तो सबने माना कि किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है | इसी से निपटने के लिए और मौजूदा हालात की जानकारी लेने के लिए प्रांतीय कांग्रेस कमिटी ने 1915 ने एक जांच समिति को चम्पारण के हालात का जायजा लेने भेजा |

इस जांच समिति के बाद 1916 में, भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के लखनऊ सत्र में, चम्पारण के किसानों पर चर्चा हुई | तय किया गया की किसानों को फौरी तौर पर राहत और मदद की जरूरत है | चम्पारण के जिला मजिस्ट्रेट, डब्ल्यू.बी.हेकॉक को, 14 मई, 1917 की अपनी चिट्ठी में गांधीजी ने किसानों की दुर्दशा से परिचित करवाया | गांधीजी किसानों और जमींदारों के बीच बेहतर सम्बन्ध चाहते थे |

उधर डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए चम्पारण की स्थिति आँखों देखी थी | किसानों के अमानवीय स्थितियों में जीवनयापन से वो अत्यंत व्यथित थे | सतही फैक्ट्री और उसके आस पास के कारखानों में 1908 में ही किसानों ने नील उगाने और उसके शोधन से मना कर दिया था | इस आन्दोलन को कुचलने के लिए 19 लोगों को दिसंबर 1908 में सजा दी गई थी | इसके अलाव इसी आन्दोलन से जुड़े 200 लोग ऐसे थे जो उस वक्त मोतिहारी की जेल में मुकदमा शुरू होने के इंतज़ार में बंद पड़े थे | उनपर जानलेवा हमले और आगजनी जैसे अभियोग लगाए गए थे |

ऐसे माहौल में अप्रैल 1917 में चम्पारण के किसानों का आन्दोलन शुरू हो गया | किसानों को कुचलने के लिए फिरंगी हुकूमत ने कोई कसर नहीं उठा रखी | डंगर और डोम समुदाय के लोगों को मारने पीटने के अलावा उन्हें प्रताड़ित करने के लिए उनके सीने पर भारी वजन रखकर बाँध दिया जाता | शायद छाती पर मूंग दलना जैसी कहावतें भी यहीं से जन्मी |

कई लोगों ने शायद स्कूल के ज़माने में, “मुर्गा बनाने” की सजा झेली होगी | पैरों के नीचे से हाथ निकाल कर फिर उन्हें गर्दन के पीछे बाँध देना भी यातना का एक तरीका था | नीलहे गोरे अक्सर ये सजा काम करने से इनकार करने वाले किसानों पर इस्तेमाल करते थे | इसके अलावा नीम के पेड़ से हाथ बाँध दिए जाते | पेड़ पर मौजूद लाल चीटियाँ जहाँ एक तरफ काट रही होती, वहीँ पीठ पर फिरंगियों की बेंत पड़ती | ऐसी अमानुषिक, बर्बर यातनाएं झेल रहे किसानों का आन्दोलन था चम्पारण का रण |

आज भले ही इस बात पर आश्चर्य हो, लेकिन ये आन्दोलन पूरी तरह अहिंसक था | इस आन्दोलन की सफलता ने भारत के किसानों को ऐसे और भी आन्दोलन छेड़ने की प्रेरणा दी | इस आन्दोलन की सफलता के स्वरुप में ही 1 मई 1918 को तत्कालीन गवर्नर जनरल ने चम्पारण किसान कानून (Champaran Agrarian Act) लागू किया | आख़िरकार उस दौर के वामपंथी नेता इ.एम.एस. नम्बूदरीपाद ने भी माना था कि ये एक सफल किसान आन्दोलन था | उन्होंने कहा था कि फिरंगी नील के सौदागरों और उनकी अफसरशाही के विरोध के वाबजूद गांधीजी और उनके साथी, आन्दोलन को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने में कामयाब हुए |

कुछ ऐसे भी बुद्धिजीवी रहे जिन्होंने चम्पारण के आन्दोलन को सफल नहीं माना | जैसे कि रमेश चन्द्र दत्त जैसे लोगों का मानना है कि इस आन्दोलन ने जमींदारो द्वारा किसानों के शोषण पर प्रहार नहीं किया | अत्यधिक लगान और बंधुआ मजदूर बनाने वाले कर्ज से तो ये आन्दोलन लड़ा ही नहीं था | जमींदारी प्रथा पर गांधीजी और राजेन्द्र प्रसाद दोनों की चुप्पी पर उन्हें आश्चर्य भी हुआ | गरीबी जो कि ऐसी अव्यवस्था की जड़ थी, उसके खिलाफ ये आन्दोलन था ही नहीं !

ऐसे छिटपुट विरोधों के बीच भी एक सविनय अवज्ञा का आन्दोलन कायम रखना भारतीय परम्पराओं की, अहिंसा की, विजय मानी जा सकती है | इस आन्दोलन से ही जमींदारों द्वारा किसानों का शोषण बिलकुल ठहर गया हो ऐसा भी नहीं है | लेकिन हां, इस पहली विजय ने ये बता दिया था कि ताकतवर दुश्मन के खिलाफ युद्ध केवल नैतिक बल से भी जीता जा सकता है | आज सौ साल बीतते हैं, मगर चम्पारण से शुरू हुआ ये रण अभी बाकी है |

हवाईजादा एवं वैमानिकी शास्त्र (भाग २)

हवाईजादा एवं वैमानिकी शास्त्र (भाग २)

By :- सुरेश चिपलूनकर

पहले भाग से आगे जारी...

अमरांगण-सूत्रधार में 113 उपखंडों में इन चारों विमान प्रकारों के बारे में पायलट ट्रेनिंग, विमान की उड़ान का मार्ग तथा इन विशाल यंत्रों के भिन्न-भिन्न भागों का विवरण आदि बारीक से बारीक जानकारी दी गई है. भीषण तापमान सहन कर सकने वाली सोलह प्रकार की धातुओं के बारे में भी इसमें बताया गया है, जिसे चाँदी के साथ सही अनुपात में “रस” मिलाकर बनाया जाता है (इस “रस” शब्द के बारे में किसी को पता नहीं है कि आखिर यह रस क्या है? कहाँ मिलता है या कैसे बनाया जाता है). ग्रन्थ में इन धातुओं का नाम ऊष्णन्भरा, ऊश्नप्पा, राज्मालात्रित जैसे कठिन नाम हैं, जिनका अंग्रेजी में अनुवाद अथवा इन शब्दों के अर्थ अभी तक किसी को समझ में नहीं आए हैं. पश्चिम प्रेरित जो कथित बुद्धिजीवी बिना सोचे-समझे भारतीय संस्कृति एवं ग्रंथों की आलोचना करते एवं मजाक उड़ाते हैं, उन्होंने कभी भी इसका जवाब देने अथवा खोजने की कोशिश नहीं की, कि आखिर विमान शास्त्र के बारे में जो इतना कुछ लिखा है क्या उसे सिर्फ काल्पनिकता कहकर ख़ारिज करना चाहिए?




1979 में आई एक और पुस्तक “Atomic Destruction 2000”, जिसके लेखक डेविड डेवनपोर्ट हैं, ने दावा किया कि उनके पास इस बात के पूरे सबूत हैं कि मोहन जोदड़ो सभ्यता का नाश परमाणु बम से हुआ था. मोहन जोदड़ो सभ्यता पाँच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता थी, जो इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं थी. लगभग डेढ़ किमी के दायरे में अपनी खोज को जारी रखते हुए डेवनपोर्ट ने यह बताया कि यहाँ पर कोई न कोई ऐसी घटना हुई थी जिसमें तापमान 2000 डिग्री तक पहुँच गया था. मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिलने वाले मानव अवशेष सीधे जमीन पर लेटे हुए मिलते हैं, जो किसी प्राकृतिक आपदा की तरफ नहीं, बल्कि “अचानक आई हुई मृत्यु” की तरफ इशारा करता है. मुझे पूरा विश्वास है कि यह परमाणु बम ही था. स्वाभाविक है कि जब पाँच हजार साल पहले यह एक परमाणु बम आपदा थी, अर्थात उड़ने वाले कोई यंत्र तो होंगे ही. डेवनपोर्ट आगे लिखते हैं कि चूँकि ऐसे प्रागैतिहासिक स्थानों पर उनकी गहन जाँच करने की अनुमति आसानी से नहीं मिलती, इसलिए मुझे काम बन्द करना पड़ा, लेकिन तत्कालीन रासायनिक विशेषज्ञों, भौतिकविदों तथा धातुविदों द्वारा मोहन जोदड़ो की और गहन जाँच करना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और उस पर पर्दा डाल दिया गया.

एरिक वॉन डेनिकन अपनी बेस्टसेलर पुस्तक “चैरियट्स ऑफ गॉड्स (पृष्ठ 56-60) में लिखते हैं, “उदाहरण के तौर पर लगभग पाँच हजार वर्ष पुरानी महाभारत के तत्कालीन कालखण्ड में कोई योद्धा किसी ऐसे अस्त्र के बारे में कैसे जानता था, जिसे चलाने से बारह साल तक उस धरती पर सूखा पड़ जाता, ऐसा कोई अस्त्र जो इतना शक्तिशाली हो कि वह माताओं के गर्भ में पलने वाले शिशु को भी मार सके?” इसका अर्थ है कि ऐसा कुछ ना कुछ तो था, जिसका ज्ञान आगे नहीं बढ़ाया गया, अथवा लिपिबद्ध नहीं हुआ और गुम हो गया. यदि कुछ देर के लिए हम इसे “काल्पनिक” भी मान लें, तब भी महाभारत काल में कोई योद्धा किसी ऐसे रॉकेटनुमा यंत्र के बारे में ही कल्पना कैसे कर सकता है, जो किसी वाहन पर रखा जा सके और जिससे बड़ी जनसँख्या का संहार किया जा सके? महाभारत के ही एक प्रसंग में ऐसे अस्त्र का भी उल्लेख है, जिसे चलाने के बाद धातु की ढाल एवं वस्त्र भी पिघल जाते हैं, घोड़े-हाथी पागल होकर इधर-उधर दौड़ने लगते हैं, रथों में आग लग जाती है और शत्रुओं के बाल झड़ने लगते हैं, नाखून गिरने लगते हैं. यह किस तरफ इशारा करता है? क्या इसके बारे में शोध नहीं किया जाना चाहिए था? आखिर वेदव्यास को यह कल्पनाएँ कहाँ से सूझीं? आखिर संजय किस तकनीक के सहारे धृतराष्ट्र को युद्ध का सीधा प्रसारण सुना रहा था? अभिमन्यु ने सुभद्रा के गर्भ में चक्रव्यूह भेदने की तकनीक सुभद्रा के जागृत अवस्था में रहने तक ही क्यों सुनी? (यह तो अब वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हुआ है कि गर्भस्थ शिशु सुन-समझ सकता है, फिर प्राचीन ग्रंथों की खिल्ली उड़ाने का हमें क्या अधिकार है?).
एक और पश्चिमी लेखक जीआर जोसियर ने अपने एक लेख (The Pilot is one who knows the secrets) में वैमानिकी शास्त्र से संबद्ध एक अन्य ग्रन्थ “रहस्य लहरी” से उद्धृत किया है कि प्राचीन भारतीय वैमानिकी शास्त्र में पायलटों को बत्तीस प्रकार के रहस्य ज्ञात होना आवश्यक था. इन रहस्यों में से कुछ का नाम इस प्रकार है – गूढ़, दृश्य, विमुख, रूपाकर्षण, स्तब्धक, चपल, पराशब्द ग्राहक आदि. जैसा कि इन सरल संस्कृत शब्दों से ही स्पष्ट हो रहा है कि यह तमाम रहस्य या ज्ञान पायलटों को शत्रु विमानों से सावधान रहने तथा उन्हें मार गिराने के लिए दिए जाते थे. “शौनक” ग्रन्थ के अनुसार अंतरिक्ष को पाँच क्षेत्रों में बाँटा गया था – रेखापथ, मंडल, कक्षाय, शक्ति एवं केन्द्र. इसी प्रकार इन पाँच क्षेत्रों में विमानों की उड़ान हेतु 5,19,800 मार्ग निर्धारित किए गए थे. यह विमान सात लोकों में जाते थे जिनके नाम हैं – भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महालोक, जनोलोक, तपोलोक एवं सत्यलोक. जबकि “धुंडीनाथ एवं वाल्मीकी गणित” के अनुसार विमानों के उड़ान मार्ग 7,03,00,800 निर्धारित किए गए थे, जिसमें से “मंडल” में 20,08,00200 मार्ग, कक्षाय में 2,09,00,300 मार्ग, शक्ति में 10,01,300 मार्ग तथा केन्द्र में 30,08,200 मार्ग निर्धारित किए हुए.

लेख में ऊपर एक स्थान पर यह बात आई है कि संस्कृत एवं कहीं-कहीं दूसरी गूढ़ भाषाओं में लिखे ग्रंथों की भाषा एवं रहस्य समझ नहीं आते, इसलिए यह बोझिल एवं नीरस लगने लगते हैं, परन्तु उन शब्दों का एक निश्चित अर्थ था. एक संक्षिप्त उदाहरण देकर यह लेख समाप्त करता हूँ. हम लोगों ने बचपन में “बैटरी” (डेनियल सेल) के बारे में पढ़ा हुआ है, उसके “आविष्कारक”(?) और एम्पीयर तथा वोल्ट को ही हम इकाई मानते आए हैं, परन्तु वास्तव में “बैटरी” की खोज सप्तर्षियों में से एक महर्षि अगस्त्य हजारों वर्ष पहले ही कर चुके हैं. महर्षि ने “अगस्त्य संहिता” नामक ग्रन्थ लिखा है. इन संस्कृत ग्रंथों के शब्दों को ण समझ पाने की एक मजेदार सत्य घटना इस प्रकार है. राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास “अगस्त्य संहिता” के कुछ पन्ने मिले। इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। महर्षि अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता में विधुत उत्पादन से सम्बंधित सूत्रों में लिखा :
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे
ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन
चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥

अर्थात एक मिट्टी का पात्र (Earthen pot) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (copper sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगायें, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे “मित्रावरुणशक्ति” (अर्थात बिजली) का उदय होगा। अब थोड़ी सी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हुई | उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई, परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि “शिखिग्रीवा” याने मोर की गर्दन। अत: वे और उनके मित्र बाग में गए, तथा वहां के प्रमुख से पूछा, क्या आप बता सकते हैं, आपके बाग में मोर कब मरेगा, तो उसने नाराज होकर कहा क्यों? तब उन्होंने कहा, एक प्रयोग के लिए उसकी गरदन की आवश्यकता है। यह सुनकर उसने कहा ठीक है। आप एक अर्जी दे जाइये। इसके कुछ दिन बाद प्रोफ़ेसर साहब की एक आयुर्वेदाचार्य से बात हो रही थी। उनको यह सारा घटनाक्रम सुनाया तो वे हंसने लगे और उन्होंने कहा, यहां शिखिग्रीवा का अर्थ “मोर की गरदन” नहीं अपितु उसकी गरदन के रंग जैसा पदार्थ अर्थात कॉपर सल्फेट है। यह जानकारी मिलते ही समस्या हल हो गई और फिर इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजीटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा। परिणामस्वरूप 1.138 वोल्ट तथा 23 mA धारा वाली विद्युत उत्पन्न हुई। प्रयोग सफल होने की सूचना डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को दी गई। इस सेल का प्रदर्शन ७ अगस्त, १९९० को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ।
आगे महर्षि अगस्त्य लिखते है :

अनने जलभंगोस्ति प्राणो
दानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥
अर्थात सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु (Oxygen) तथा उदान वायु (Hydrogen) में परिवर्तित हो जाएगा।

आगे लिखते है:
वायुबन्धकवस्त्रेण
निबद्धो यानमस्तके
उदान : स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। (अगस्त्य संहिता शिल्प शास्त्र सार)

उदान वायु (H2) को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र (गुब्बारा) में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है। राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढ़ने में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों में पाया कि विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार पर उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे गयें है:

(१) तड़ित्‌ - रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।
(२) सौदामिनी - रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।
(३) विद्युत - बादलों के द्वारा उत्पन्न।
(४) शतकुंभी - सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न।
(५) हृदनि - हृद या स्टोर की हुई बिजली।
(६) अशनि - चुम्बकीय दण्ड से उत्पन्न।

अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: महर्षि अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) भी कहते हैं।
आगे लिखा है:
कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते। -शुक्र नीति
यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रं
स्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं
शातकुंभमिति स्मृतम्‌॥ ५ (अगस्त्य संहिता)

अर्थात्‌- कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।
उपरोक्त विधि का वर्णन एक विदेशी लेखक David Hatcher Childress ने अपनी पुस्तक " Technology of the Gods: The Incredible Sciences of the Ancients" में भी लिखा है । अब मजे की बात यह है कि हमारे ग्रंथों को विदेशियों ने हम से भी अधिक पढ़ा है । इसीलिए दौड़ में आगे निकल गये और सारा श्रेय भी ले गये। आज हम विभवान्तर की इकाई वोल्ट तथा धारा की एम्पीयर लिखते है जो क्रमश: वैज्ञानिक Alessandro Volta तथा André-Marie Ampère के नाम पर रखी गयी है | जबकि इकाई अगस्त्य होनी चाहिए थी... जो “गुलाम बुद्धिजीवियों” ने होने नहीं दी.
अब सवाल उठता है कि, यदि प्राचीन भारतीय ज्ञान इतना समृद्ध था तो वह कहाँ गायब हो गया? पश्चिम के लोग उसी ज्ञान पर शोध एवं विकास करके अपने आविष्कार क्यों और कैसे बनाते रहे? संस्कृत ज्ञान एवं शिक्षा के प्रति इतनी उदासीनता क्यों बनी रही? इसके जवाब निम्नलिखित हैं -

(अ)  पहला यह कि, भारतीय संस्कृति इतिहास की सर्वाधिक “ज़ख़्मी सभ्यता” रही है. मशहूर लेखक वीएस नायपॉल ने भी इसे “India: A Wounded Civilization” माना है. तुर्क, मुग़ल, अंग्रेज और फिर कांग्रेस। हम निरंतर हमलो के शिकार हुए हैं. जिससे संस्कृत एवं प्राचीन वैज्ञानिक विरासतें व विज्ञान संभल पाना बेहद मुश्किल रहा होगा.
(आ)    दूसरा यह कि, भारतीय मनीषियों ने वेद आदि जो भी लिखे वह श्रुति परम्परा के सहारे आगे बढ़ा. अब्राहमिक धर्मो की तरह “व्यवस्थित इतिहास लेखन” की परम्परा नहीं रही. यह भी एक कारण है की हमारे नवोन्मेष/ आविष्कार नष्ट हो गये. इसलिए कुछ तो लिखित अवस्था में है, जबकि कुछ सिर्फ कंठस्थ था, जो तीन-चार पीढ़ियों बाद स्वमेव नष्ट हो गया. रही-सही कसर आक्रान्ताओं के हमलों, मंदिरों (जहाँ अधिकाँश ग्रन्थ रखे जाते थे) की लूटपाट एवं नष्ट करने तथा नालन्दा जैसी विराट लाईब्रेरियों को जलाने आदि के कारण संभवतः यह गायब हुए होंगे.
(इ)      तीसरा, सभी जानते हैं कि भारतीय समाज अध्यात्म उन्मुख रहा है. जिससे भौतिक आविष्कारो के प्रति उदासीनता रही है. श्रेय लेना अथवा ज्ञान से “कमाई करना” स्वभाव में ही नहीं रहा.
(ई)      चौथा, जब सिर्फ 60 साल के सेकुलरी कांग्रेसी शासन में ही योग, संस्कृत, आयुर्वेद आदि विरासतों को दयनीय मुकाम पर पहुंचाया जा सकता है, तो सैकड़ो वर्षों की विदेशी गुलामी की मारक शक्ति का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
(उ)      पांचवी बात - कॉपीराइट, पेटेंट जैसे चोंचलो से मुक्त होने के कारण हमारी विरासतें यूरोप के मुल्को ने अपनी बपौती बना ली है. ये हालत आज भी है. (उदाहरण हल्दी और नीम). सैकड़ो वर्षो पूर्व हमारे पूर्वजो ने कितना ज्ञान मुफ्त बांटा होगा और कितना इन विदेशियो ने चुराया होगा वह कल्पना से परे है. सनातन सत्य ये है कि न तो पहले हमें प्रतिभाओ की कदर थी, ना आज. वरना Brain Drain न होता!

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि “वैमानिकी शास्त्र” एवं प्राचीन ग्रंथों में भारतीय विमान विज्ञान की हँसी उड़ाने, खारिज करने एवं सत्य को षड्यंत्रपूर्वक दबाने की कोशिशें बन्द होनी चाहिए एवं इस दिशा में गंभीर शोध प्रयास किए जाने चाहिए. ज़ाहिर है कि यह कार्य पूर्वाग्रह से ग्रसित “गुलाम मानसिकता” वाले प्रगतिशील लेखक नहीं कर सकते. इस विराट कार्य के लिए केन्द्र सरकार को ही महती पहल करनी होगी. जिन विद्वानों को भारतीय संस्कृति पर भरोसा है, संस्कृत में जिनकी आस्था है एवं जिनकी सोच अंग्रेजी अथवा मार्क्स की "गर्भनाल" से जुडी हुई ना हो, ऐसे लोगों के समूह बनाकर सभी प्रमुख ग्रंथों के बारे में शोध एवं तथ्यान्वेषण किया जाना चाहिए.

समाप्त...

राजा का दरबार

एक राजा का दरबार लगा हुआ था,
क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये
राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था.
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ..
महाराज के सिंहासन के सामने...
एक शाही मेज थी...
और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि
सभी दरबार मे बैठे थे
और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..
प्रवेश मिल गया तो उसने कहा
“मेरे पास दो वस्तुएं हैं,
मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और
अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है
और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”..
अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है”
तो उसने दोनो वस्तुएं....
उस कीमती मेज पर रख दीं..

वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान
आकार, समान रुप रंग, समान
प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था.. … ..

राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं.
तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो
एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न.

इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा
और एक है काँच का टुकडा।

लेकिन रूप रंग सब एक है.
कोई आज तक परख नही पाया क़ि
कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..

कोइ परख कर बताये की....
ये हीरा है और ये काँच..
अगर परख खरी निकली...
तो मैं हार जाऊंगा और..
यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं
पहचान पाया तो इस हीरे की जो
कीमत है उतनी धनराशि आपको
मुझे देनी होगी..

इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से...
जीतता आया हूँ..

राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा..
दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते
क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. ..

हारने पर पैसे देने पडेगे...
इसका कोई सवाल नही था,
क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,
पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी,
इसका सबको भय था..

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. ..
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा..
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो...
मैने सब बाते सुनी है...
और यह भी सुना है कि....
कोई परख नही पा रहा है...
एक अवसर मुझे भी दो.. ..

एक आदमी के सहारे....
वह राजा के पास पहुंचा..
उसने राजा से प्रार्थना की...
मै तो जनम से अंधा हू....
फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..
जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ..
और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं..

और यदि सफल न भी हुआ...
तो वैसे भी आप तो हारे ही है..

राजा को लगा कि.....
इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है...
राजा ने कहा क़ि ठीक है..
तो तब उस अंधे आदमी को...
दोनो चीजे छुआ दी गयी..

और पूछा गया.....
इसमे कौन सा हीरा है....
और कौन सा काँच….?? ..
यही तुम्हें परखना है.. ..

कथा कहती है कि....
उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..

जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था
वह नतमस्तक हो गया..
और बोला....
“सही है आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…
अपने वचन के मुताबिक.....
यह हीरा.....
मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” ..

सब बहुत खुश हो गये
और जो आदमी आया था वह भी
बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम
कोई तो मिला परखने वाला..

उस आदमी, राजा और अन्य सभी
लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही
जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे
पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच.. ..

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक
धूप मे हम सब बैठे है.. मैने दोनो को छुआ ..
जो ठंडा रहा वह हीरा.....
जो गरम हो गया वह काँच.....

जीवन मे भी देखना.....

जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये...
वह व्यक्ति "काँच" हैं

और

जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे.....
वह व्यक्ति "हीरा" है..!!...✍

महाभारत किसकी कहानी है ?

महाभारत किसकी कहानी है ?

By :- आनन्द कुमार

“लार्ड ऑफ़ द रिंग्स” एक अंग्रेजी फिल्म की सीरीज है, स्पेशल इफेक्ट्स के लिए कई लोगों ने देखी भी होगी। इसमें कई अलग-अलग जातियां होती हैं, या वंश कहिये। एक एल्फ हैं जो लम्बे, खूबसूरत और अजीब से नुकीले कान वाले होते हैं। उनकी आबादी कम है, इंसानों से दूर रहते हैं, लेकिन उनके पास बेहतरीन हथियार होते हैं। काफी जादू भी जानते हैं, पर्यावरण और पेड़ों से अच्छे सम्बन्ध रखते हैं। उनकी तुलना में इंसान बड़े निकम्मे लगते हैं, लालची, मक्कार और किसी काम के नहीं होते।

एक जनजाति इस फिल्म में ड्वार्फ, यानि बौनों की है। ये जरा घमंडी, अकड़ू और छल-कपट की कम समझ वाले हैं। थोड़े से सीधे होने के कारण बौने, पिछड़े हुए हैं और पहाड़ों के नीचे कहीं गुफाओं में छुपे रहते हैं। ये बड़े उन्नत किस्म के शिल्पी हैं और बेवक़ूफ़ होने की लिमिट तक के बेवक़ूफ़ भी होते हैं। फिल्म में कुछ लम्बी उम्र वाले इंसान भी हैं, वो भी अच्छे योद्धा है। इन सबके मुक़ाबले में ओर्क, एक किस्म की राक्षस जनजाति और कुछ दुष्ट जादूगर होते हैं। पृथ्वी पर कब्जे के लिए, इन सब के आपसी संघर्ष की कहानी, फिल्म की कहानी है। इसी नाम के एक उपन्यास पर आधारित है।

जब आप पूरी सीरीज देख चुके होते हैं तो समझ आता है कि ये इन बड़े बड़े शक्तिशाली योद्धाओं की कहानी नहीं थी। ये बौने से थोड़े से ही लम्बे, करीब करीब अहिंसक, डरपोक होब्बिट नाम की जनजाति के दो चार लोगों की कहानी है। कहानी में ओर्क, एल्फ, बौने, मनुष्य सब बड़े योद्धा हैं, उनकी दिग्विजय की यात्रायें हैं लेकिन असली कहानी सिर्फ चार होब्बिट्स की है। वो चारो एक अंगूठी को लेकर उसे नष्ट करने निकले होते हैं। इसी रिंग के सफ़र के रास्ते में बस उनकी मुलाक़ात जादूगरों से, एल्फ़, ओर्क, मनुष्यों और बौनों से होती है। सारे साइड करैक्टर हैं, असली हीरो होब्बिट होते हैं।

आज की तारिख में जब आप महाभारत को देखेंगे तो अलग अलग लेखकों के इसपर अपने अपने व्याख्यान होते हैं। इरावती कर्वे के “युगांत” में छोटे छोटे लेख हैं। एस.एल.भ्यरप्पा की “पर्व” कुछ चरित्रों को लेकर, उनके नजरिये से लिखी गई है, सारे मिथकीय घटनाक्रम हटा दिए गए हैं। आनंद नीलकंठ की किताबों में हारने वालों की तरफ से कहानी सुनाई गई है। “रश्मिरथी” या फिर “मृत्युंजय” कर्ण की कहानी होती है। द्रौपदी की ओर से कहानी सुनाने वाली नारीवादी विचारधारा के झंडाबरदार भी कम नहीं हैं। युधिष्ठिर का दृष्टिकोण महाभारत की कथा में बुद्धदेव बासु लिख गए हैं तो भीम के नजरिये से एम.टी.वासुदेवन नैयर ने लिखा है। कन्हैयालाल माखन मुंशी की किताबें हैं, कृष्ण की तरफ से लिखने वाले भी कम नहीं है।

कभी ये सोचा है कि इतने अलग अलग चरित्रों की कहानी इस एक महाभारत में सिमटती कैसे है ? दरअसल महाभारत भी किन्हीं कौरवों, पांडवों, यक्ष, गंधर्व, किन्नरों, देवों, दानवों की कहानी है ही नहीं। ये एक सफ़र पर निकले कुछ ऋषियों की कहानी है। महाभारत की बिलकुल शुरुआत में एक भार्गव, भृगुवंश के ऋषि अपने शिष्यों को सिखा रहे होते हैं। महाभारत की शुरुआत आरुणी जैसे शिष्यों के आज्ञापालन की मिसालों से शुरू होती है। ऐसे ही शिष्यों की कड़ी में उत्तांक भी होता है। वो शिक्षा समाप्त होने पर अपने गुरु को कुछ गुरुदक्षिणा देना चाहता है। लेकिन सारे गुरु उस काल में शायद एक ही जैसे होते थे।

तो गुरु को यहाँ भी दीन-दुनियां से कुछ ख़ास लेना देना नहीं होता और उन्हें समझ ही नहीं आता कि गुरुदक्षिणा में क्या माँगा जाए। थोड़ा सोचने के बाद वो उत्तांक को अपनी पत्नी से पूछ लेने कहते हैं। अब जब उत्तांक, गुरु-माता के पास पहुँचते हैं तो वो खाना खिलाने के बाद पूछती हैं की उत्तांक किसी काम से उनके पास आकर बैठा है क्या ? उत्तांक बताता है कि गुरुदक्षिणा का पता नहीं चल रहा, शिक्षा तो उसने ले ली है। गुरु माता उन्हें एक राजा के पास उनकी पत्नी से कुंडल मांग लाने भेज देती हैं। उत्तंक लम्बे सफ़र के बाद राजा के पास पहुँचता है और दिव्य कुंडल मांग लेता है।

राजा और रानी कुंडल देने को राजी हो जाते हैं, पूरी प्रक्रिया में उत्तांक और भी काफी कुछ सीख जाता है। वो जब कुंडल लेकर लौट रहा होता है, तो रानी उसे बताती हैं कि इन कुण्डलों पर कई दिन से नाग तक्षक नजर जमाये बैठा है। वो जरूर इसे रास्ते में चुरा ले जाने की कोशिश करेगा और उत्तांक को सावधान रहना चाहिए। सावधानी के वाबजूद चोरी होती है और यहीं से तक्षक की उत्तांक नाम के भार्गव से दुश्मनी की कहानी शुरू होती है। महाभारत की कहानी जहाँ ख़त्म हो रही होती है वहां, परीक्षित यानि अर्जुन के पोते को इसी तक्षक ने डसा होता है। परीक्षित के पुत्र जन्मजेय के लिए जो नाग यज्ञ कर रहे होते हैं, और सारे नागों की आहूति देते जाते हैं वो भी भृगुवंश के ऋषि ही होते हैं।

पहले एक बार “लार्ड ऑफ़ द रिंग्स” देखिये और फिर से पूरी महाभारत पढ़िए। महाभारत की पूरी कहानी भृगु ऋषियों की परंपरा के अलग अलग सफ़र की, सीखने की, उस सीखे हुए के इस्तेमाल की, और साथ में इस यात्रा में मिले लोगों की, देव-दानव, यक्ष-गंधर्व-किन्नर-मनुष्यों से मुलाक़ात की कहानी है। कभी फ़्लैश बैक में तो कभी उसी समय के दौर में आती है, कभी भविष्य में क्या नतीजे किस हरकत के हो सकते हैं, उसपर भी चेतावनी दी जाती है। सीखने का एक तरीका सफ़र करना भी होता है, आज के मैक्ले मॉडल में नहीं सिखाया जाता, उसपे भी ध्यान जायेगा। बाकी सिर्फ एक आदमी के नजरिये से पूरी कहानी को देखने वाला पक्षपाती हो जाता है, वो तो याद रखना ही चाहिए।

भारतवर्ष पर मुगलों शासन सत्य अथवा वामपंथी इतिहासकारों का पाखंड ??

मनीषा सिंह की कलम से मित्रों भारतवर्ष पर मुगलों शासन सत्य अथवा वामपंथी इतिहासकारों का पाखंड ??
सर्वप्रथम जहा भारत के इतिहासकारों ने हर वोह पन्ने को फाड़ कर फ़ेंक दिया जिनमे राजपूत योद्धाओ द्वारा मुग़ल को खदेड़ने की याँ परास्त करने की बात लिखी हुयी थी परन्तु कुछ विदेशी इतिहासकार हुए जो सच्चाई को अपनाया और माना की राजपूत राजाओ के समान कोई पराक्रमी नही था । भारत का इतिहास ऐसे योद्धाओ की आरतियों से और यशकीर्तियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने भारत के इतिहास को नई गति और नई ऊर्जा से नई दिशा दी। बात क्षत्रिय राजपूतो की सिरमौर चौहानों की करें तो इसने ऐसे कितने ही अमूल्य हीरे हमें दिये हैं जिन्होंने अपनी चमक से भारतीय इतिहास के पन्नों पर इतना तीव्र प्रकाश उत्कीर्ण किया कि जहां-जहां तक वह प्रकाश गया वहां-वहां तक इतिहास का एक-एक अक्षर स्वर्णिम हो गया ।
रणथंभौर की रण में वाग्भट चौहान ने मुस्लिम सेनाओ को धुल चटाया था लगातार दो बार एवं सल्तनत दुर्बल होकर दिल्ली तक सिमट गया -:
हमने वाग्भट के साथ किया अन्याय

हमने राजा वाग्भट के शौर्य को वीरता को, उसकी देशभक्ति को राख के नीचे दबा दिया। क्योंकि इतिहास देशद्रोहियों द्वारा लिखा गया है। हमें पुन: क्रांतिवीर सावरकर के इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए-‘‘हिंदुस्तान राष्ट्र निरंतर किसी न किसी विदेशी सत्ता के अधीन बना रहा तथा हिंदुस्थान का इतिहास मानो हिंदुओं के सतत पराभव की ही एक गाथा है। इस प्रकार का सरासर झूठा, अपमान जनक और कुटिलता से किया गया प्रचार चालू सिक्कों की तरह न केवल विदेशियों के द्वारा अपितु स्वबंधुओं के द्वारा भी बेरोक टोक वयवहृत किया जा रहा है। इस असत्य प्रचार का प्रतिकार करना न केवल राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए आवश्यक है, अपितु ऐतिहासिक सत्य के उद्घाटन की दृष्टि से भी ऐसा किया जाना वांछनीय है। आज तक इस दिशा में जो इतिहासज्ञ प्रयत्नशील रहे हैं, उनके सत्प्रयासों में सहायक बनना और उनके प्रचार को अधिक तीव्रता प्रदान करना एक राष्ट्रीय कर्तव्य है।
जिन जिन विदेशी शक्तियों ने भारत पर आक्रमण किया, अथवा अपना राज्य प्रस्थापित किया, उन सभी विदेशी शासकों का पराभव कर हिंदू राष्ट्र को जिन्होंने स्वाधीनता प्रदान की, उन सभी वीरों, राष्ट्रोद्वारकों उन युग प्रवर्तक पराक्रमी महापुरूषों का ऐतिहासिक चित्रण करने का निश्चय मैंने किया है।’’ (संदर्भ: भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ पृष्ठ 4)
महाराज प्रहलाद के मृत्यु के पश्चात वाग्भट चौहान ने उनके अल्पव्यस्क पुत्र वीर नारायण को शासक बनाया, जिसके संरक्षक का दायित्व उसके चाचा वाग्भट ने निर्वाह किया  । वाग्भट एक शूरवीर चौहान था, उसने उचित अवसर आते ही स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित करना चाहा, तब अल्तमश को इस सुदृढ़ दुर्ग को अपने अधीन रखने के लिए रणथंभौर पर चढ़ाई करनी पड़ी। परन्तु रणथंभौर का दुर्ग वाग्भट के पराक्रमी के करण हार गया अल्तमश और फिर राजपूत रणबांकुरों से सीधा युद्ध में दो बार परास्त होकर दिल्ली की और लौट पड़ा फिर अल्तमश ने षड़यंत्र रचा ‘हम्मीर महाकाव्य’ की साक्षी के अनुसार “एक षडय़ंत्र के अंतर्गत वीरनारायण को दिल्ली बुलाकर मार दिया गया।“ अपने भतीजे वीरनारायण की मृत्यु के पश्चात वाग्भट के मन में हार के कलंक को लेकर जीवित रहना एक शूरवीर पराक्रमी स्वाधीनता प्रेमी योद्धा के लिए कठिन होगया था अल्तमश की मृत्यु के पश्चात रुकनुद्दीन फिरोज शाह दिल्ली के सुल्तान बने तब मौका मिलते ही वाग्भट ने स्वतंत्रता की बिगुल बजा दिया एवं विशाल सेना के साथ रणथंभौर पर आक्रमण किया रणथंभौर के दुर्ग से मलेच्छों को खदेड़ दिया ।
वाग्भट सन १२३७-१२५३ ईस्वी तक शासन किया रणथंभौर पर इन्होने ने प्रथम बार मलेच्छ सेना को परास्त किया था सन १२४८ ईस्वी (1248 A.D) में नसीरुद्दीन ने उलूग खान के नेतृत्व में विशाल सेना भेजा वाग्भट के खिलाफ । वाग्भट ने सर्वप्रथम सम्पूर्ण
उत्तर पश्चिमी राज्य से मलेच्छ सेना एवं उनके सुल्तान को खदेड़ने का निश्चय किया उलूग खां ने कई लाख सेना (सेनाकी संख्या कही मिला नही इतिहासकारों के भिन्न मत हैं जैसे सी.पी. रामास्वामी अय्यर ने भारत भास्कर किताब के पृष्ठ ८१ पर लिखे हैं एक लाख तो The Sunday Standard Article 28 January 1960 में 5 लाख) के साथ रणथंभौर पर आक्रमण किये थे महाराज वाग्भट चौहान इस युद्ध को मानो जीवन और मरण की युद्ध मान लिए थे हार का परिणाम मानो वोह देखना ही नही चाहते थे उलूग खां के पास विशाल सेना था परन्तु महाराज वाग्भट के पास सेना की संख्या भले ही अत्याल्प होंगे परन्तु पराक्रम में उलूग खां के लाखो सैनिकों के समान थे राजपूत वीरो की टोली यह युद्ध प्रलय मचा देनेवाले युद्ध में से एक माना जाता हैं “ ऐसा माना जाता हैं वाग्भट की सैनिको के तलवार जब भी उठ रहे थे मलेच्छ सैनिको के सर धर से अलग हो रहे थे” महाराज वाग्भट घायल होने के बाद भी रणभूमी से अपना पग एक इंच भी नहीं हटाये बहाउद्दीन ऐबक की मस्तक धर से अलग होकर भूमि पर गिरते ही उलूग खां दिल्ली हाथ से जाता देख रणभूमि से भाग खड़ा हुआ।
सन १२५३ ईस्वी (1253 A.D) दूसरा एवं अंतिम युद्ध उलुग खां महाराज वाग्भट की पराक्रम से निसंदेह परिचित था इसलिए कोई भूल नही करना चाहता था सेना की संख्या दुगनी कर दिया इस बात की पुष्टि (Ulugh khan had in that year, prepared a large force to attack Ranthambhor and other important Hindu strongholds Early Chauhan Dynasties Dasharatha Sharma) महाराज वाग्भट की ऐसी पराक्रमी शौर्य से परिपूर्ण कहानी को इसलिए छुपा दिया गया क्योंकि यह दबे कुचले जाती याँ शांतिप्रिय मजहब से नही हैं , महाराज वाग्भट ने अपनी मृत्युंजयी सेना के साथ उलूग खां की सेना पर घायल शेरो की तरह टूट पड़े उलूग खां घायल होकर अपनी सेना के साथ नागौर से होते हुए दिल्ली भाग गये महाराज वाग्भट ने हिंदुत्व की शक्ति एवं पराक्रम से मलेच्छ सेनाओ को ना केवल अवगत करवाया साथ ही भारत के कयी राज्य जो मलेच्छ सेनाओं के आधीन थे उन्हें भी मुक्त करवाया सल्तनत रह गयी दिल्ली से गुरुग्राम (वर्त्तमान गुड़गांव) तक सल्तनत ऐसी परिस्थितियों में निरंतर दुर्बल होती जा रही थी। नसीरुद्दीन और उसके गुट का भी शीघ्र ही अंत हो गया । यह सत्य है कि इस संक्रमण काल में हिंदू भी अपनी शक्ति प्रभुत्व का पर्याप्त लाभ लेने में असमर्थ रहे थे। परंतु ‘तबाक़त-ई-नसीरी ’ के लेखक मिन्हाज-उस-सिराज ने लिखा है कि- वाग्भट की पराक्रम से मुग्ध होकर योध्या के योद्धा हिन्दुस्थान का रईस की उपाधि से विभूषित किया इस बात की उल्लेख Early Chauhan Dynasties Dasharatha Sharma पृष्ठ-: 120-121 में उल्लेख हैं ( “Minhaj call him (Vagbhata) The greatest of the Rais of Hindustan) एवं पृष्ठ-: 121 ( “Vagbhata the greatest of the Rais, and the most noble and illustrious of all the princess of Hindustan) ।

*आयुर्वेद को छोड़कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमें बनने वाली ओषधियों में मांसाहार का प्रयोग होता है।*

🚩 🙏 *।।वन्दे मातरम्।।* 🙏 🚩
*आयुर्वेद को छोड़कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमें बनने वाली ओषधियों में मांसाहार का प्रयोग होता है।*

*स्वदेशी के प्रखर प्रवक्ता श्रीराजीव दीक्षितजी*

*मित्रो आयुर्वेद को छोड़ कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमें बनने वाली ओषधियों में मांसाहार का प्रयोग होता है, आप जितनी भी एलोपैथी ओषधियाँ लेते है उनमें जो कैप्सूल होते है वो सब के सब मांसाहारी होते हैं।*

*दरअसल कैप्सूल के ऊपर जो कवर होता है उसके अंदर ओषधी भरी जाती है वो कवर प्लास्टिक का नहीं होता आपको देखने में जरूर लगेगा कि ये प्लास्टिक है लेकिन वो प्लास्टिक का नहीं है क्योंकि अगर ये प्लास्टिक का होगा तो आप उसको खाओगे तो अंदर जाकर घुलेगा ही नहीं क्योंकि प्लास्टिक 400 वर्ष तक घुलता नहीं है*

*तो मित्रो ये जो कैप्सूल के कवर जिससे बनाये जाते है उसका नाम है gelatin (जिलेटिन)। जिलेटिन से सब के सब कैप्सूल के कवर बनाये जाते है और जिलेटिन के बारे में आप सब जानते है, जब गाय के बछड़े या गाय को कत्ल किया जाता है उसके बाद उसके पेट की बड़ी आंत से जिलेटिन बनाई जाती है।*

*मित्रो आपने एक और बात पर ध्यान दिया होगा 90 % एलोपेथी ओषधियों पर कोई हरा या लाल निशान नहीं होता। कारण एक ही है इन ओषधियों में बहुत अधिक मांसाहार का उपयोग होता है और कुछ दिन पहले कोर्ट ने कहा था कि ओषधियों पर हरा या लाल निशान अनिवार्य होना चाहिए और ये सारी बड़ी एलोपेथी कंपनियाँ अपनी छाती कूटने लग गई थी।*

*कैप्सूल के अतिरिक्त मित्रो एलोपेथी में गोलियां होती है (tablets) तो कुछ गोलियां जो होती है जिनको आप अपने हाथ पर रगड़ेगे तो उसमे से पाउडर निकलेगा, हाथ सफ़ेद हो जाएगा पीला हो जाएगा वो तो ठीक है लेकिन कुछ गोलियां ऐसी होती है जिनको हाथ पर घसीटने से कुछ नहीं होता उन सबके ऊपर भी जिलेटिन का कोटिंग किया होता है वो सब मांसाहारी है।*

*थोड़ी सी कुछ गोलियां ऐसी है जिन पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं होता लेकिन वो गोलियां इतनी खतरनाक है कि आपको कैंसर, शुगर जैसे 100 रोग कर सकती हैं जैसे एक दवा है पैरासिटामोल। इस पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं है लेकिन ज्यादा प्रयोग किया तो ब्रेन हैमरेज हो जाएगा। ऐसे ही एक सिरदर्द की दवा है उस पर भी जिलेटिन का कोटिंग नहीं हैं लेकिन ज्यादा प्रयोग किया तो लीवर खराब हो जाएगा, ऐसे ही हार्ट के रोगियों को एक दवा दी जाती है उसमे भी कोटिंग नहीं लेकिन उसको ज्यादा खाओ तो किटनी खराब हो जाएगी।*

*तो मित्रो जिनके ऊपर कोटिंग नहीं है वो वो दवा जहर है और जिनके ऊपर कोटिंग है वो दवा मांसाहारी है तो अब प्रश्न उठता है तो हम खाएं क्या? मित्रो रास्ता एक ही आप अपनी चिकित्सा स्वयं करों अर्थात आपको पुनः आयुर्वेद की ओर लौटना पड़ेगा।*

*मित्रो दरअसल हमारे देश गौ ह्त्या केवल मांस के लिए नहीं की जाती है इसके अतिरिक्त जो खून निकलता है, जो हड्डियों का चुरा होता है, जो चर्बी से तेल निकलता है, बड़ी आंत से जिलेटिन निकलती है, चमड़ा निकलता है इन सब का प्रयोग कोसमेटिक (सोन्दर्य उत्पाद), टूथपेस्ट, नेलपालिश, लिपस्टिक खाने पीने की चींजे, एलोपेथी दवाइयाँ, जूते, बैग आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है, जिसे हम सब लोग अपने दैनिक जीवन में बहुत बार प्रयोग में लाते है।*

*तो गौ रक्षा की बात करने से पूर्व पहले हम सबको उन सब वस्तुओ का त्याग करना चाहिए जिसके कारण गौ ह्त्या होती है, दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुओ की पहले अच्छे से परख करनी चाहिए फिर प्रयोग मे लाना।*

*कैप्सूल गोमांस gelatin. Vegetarians के बने होते है:- श्रीराजीव दीक्षितजी* https://youtu.be/l-eYup4tOoM

*दवा के नाम पर मोत का व्यापार:- श्रीराजीव दीक्षितजी:-* https://youtu.be/TtSlfDAUeyw
***********************************

*श्री राजीव दीक्षित जी के MP3 व्याख्यान के लिए प्लेय स्टोर से ऐप्स डांउनलोड करे।* https://play.google.com/store/apps/details?id=rajivdixitji.com

*अधिक जानकारी के लिये* http://www.rajivdixitmp3.com

       *you tube search " rajiv dixit "*

*आखिर कौन है श्री राजीव दीक्षित जी?* http://www.rajivdixitmp3.com/about-rajiv-bhai-dixit/

*वाट्सअप पर श्री राजीव दीक्षित जी के विचारों को प्राप्त करने के लिए 9001092092 नंबर पर सम्पर्क कर सकते हो। बात के लिए नंबर 7014872541 पर संपर्क करें।*

*अपना देश, अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा,ठ अपना गौरव।*

*मित्रों श्री राजीव दीक्षित जी ने जो- जो खुलासे किये है और जो- जो जानकारी दी है वो आज तक ना किसी राजनैतिक पार्टी ने दी है, ना किसी नेता ने और ना ही मीडिया ने। इसलिए हमारा ये फर्ज बनता है कि हम राजीव दीक्षित जी के विचारों को जन- जन तक पहुंचाये।*

   *।।स्वदेशी अपनाये, भारत को बचाये।।*
भारत रत्न श्रीराजीव दीक्षितजी को शत् शत् नमन
🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩

कहीं संस्कृत को विदेशी अपनी मातृभाषा बनाकर पैटेंट ना करवा लें....

कहीं संस्कृत को विदेशी अपनी मातृभाषा बनाकर पैटेंट ना करवा लें....
नासा के वैज्ञानिकों ने संस्कृत कई बिमारीयों को दूर करने वाली भाषा ।
अंतरिक्ष में भी सुनाई दिये संस्कृत के शब्द.... वैज्ञानिक आश्चर्य चकित ।
विदेशों में स्कूलों में कम्पलसरी सब्जेक्ट किया जा रहा है संस्कृत ।
देवभाषा संस्कृत की गूंज अंतरिक्ष में सुनाई ।
इसके वैज्ञानिक पहलू जानकर अमेरिका नासा की भाषा बनाने की कसरत में जुटा हुआ है ।
इस प्रोजेक्ट पर भारतीय संस्कृत विद्वानों के इन्कार के बाद अमेरिका अपनी नई पीढ़ी को इस भाषा में पारंगत करने में जुट गया है।
गत दिनों आगरा दौरे पर आए अरविंद फाउंडेशन [इंडियन कल्चर] पांडिचेरी के निदेशक संपदानंद मिश्रा ने ‘जागरण’ से बातचीत में यह रहस्योद्घाटन किया कि नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने 1985 में भारत से संस्कृत के एक हजार प्रकांड विद्वानों को बुलाया था। उन्हें नासा में नौकरी का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने बताया कि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है। विदेशी उपयोग में अपनी भाषा की मदद देने से उन विद्वानों ने इन्कार कर दिया था।
http://www.ibtl.in/news/international/1815/nasa-to-echo-sanskrit-in-space-website-confirms-its-mission-sanskrit/
इसके बाद कई अन्य वैज्ञानिक पहलू समझते हुए अमेरिका ने वहां नर्सरी क्लास से ही बच्चों को संस्कृत की शिक्षा शुरू कर दी है।
नासा के ‘मिशन संस्कृत’ की पुष्टि उसकी वेबसाइट भी करती है।
उसमें स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और मेहनत कर चुकी है।
साथ ही इसके कंप्यूटर प्रयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ भाषा का भी उल्लेख है।
संस्कृत के बारे में आज की पीढ़ी के लिए आश्चर्यजनक तथ्य ————-

1. कंप्यूटर में इस्तेमाल के लिए सबसे अच्छी भाषा।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1987

2. सबसे अच्छे प्रकार का कैलेंडर जो इस्तेमाल किया जा रहा है, हिंदू कैलेंडर है (जिसमें नया साल सौर प्रणाली के भूवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ शुरू होता है)
संदर्भ: जर्मन स्टेट यूनिवर्सिटी

3. दवा के लिए सबसे उपयोगी भाषा अर्थात संस्कृत में बात करने से व्यक्ति स्वस्थ और बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि जैसे रोग से मुक्त हो जाएगा। संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive Charges) के साथ सक्रिय हो जाता है।
संदर्भ: अमेरीकन हिन्दू यूनिवर्सिटी (शोध के बाद)

4. संस्कृत वह भाषा है जो अपनी पुस्तकों वेद, उपनिषदों, श्रुति, स्मृति, पुराणों, महाभारत, रामायण आदि में सबसे उन्नत प्रौद्योगिकी(Technology) रखती है।
संदर्भ: रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी, नासा आदि

(नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं)
(असत्यापित रिपोर्ट का कहना है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्तकरने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय इंडिया (भारत) में नहीं है।
5. दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (97%) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है।
संदर्भ: यूएनओ
6. नासा वैज्ञानिक द्वारा एक रिपोर्ट है कि अमेरिका 6 और 7 वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर अपनी अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके।
परियोजना की समय सीमा 2025 (6 पीढ़ी के लिए) और 2034 (7 वीं पीढ़ी के लिए) है, इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी।
7. दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1985
8. संस्कृत भाषा वर्तमान में “उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी” तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज “सरल किर्लियन फोटोग्राफी” भी नहीं है )
9. अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया वर्तमान में भरतनाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं। (नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है )
10. ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है।
लेकिन यहाँ यह बात अवश्य सोचने की है,की आज जहाँ पूरे विश्व में संस्कृत पर शोध चल रहे हैं,रिसर्च हो रहीं हैं वहीँ हमारे देश के लुच्चे नेता संस्कृत को मृत भाषा बताने में बाज नहीं आ रहे हैं अभी ३ वर्ष पहले हमारा एक केन्द्रीय मंत्री बी. एच .यू . में गया था तब उसने वहां पर संस्कृत को मृत भाषा बताया था. यह बात कहकर वह अपनी माँ को गाली दे गया, और ये वही लोग हैं जो भारत की संस्कृति को समाप्त करने के लिए यहाँ की जनता पर अंग्रेजी और उर्दू को जबरदस्ती थोप रहे हैं.
संस्कृत को सिर्फ धर्म-कर्म की भाषा नहीं समझना चाहिए-यह लौकिक प्रयोजनों की भी भाषा है. संस्कृत में अद्भुत कविताएं लिखी गई हैं, चिकित्सा, गणित, ज्योतिर्विज्ञान, व्याकरण, दशर्न आदि की महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं. केवल आध्यात्मिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि दाशर्निक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं,किन्तु रामायण,और गीता की भाषा को आज भारत में केवल हंसी मजाक की भाषा बनाकर रख दिया गया है,भारतीय फिल्मे हों या टी.वी. प्रोग्राम ,उनमे जोकरों को संस्कृत के ऐसे ऐसे शब्द बनाकर लोगों को हँसाने की कोशिश की जाती है जो संस्कृत के होते ही नहीं हैं, और हमारी नई पीढी जिसे संस्कृत से लगातार दूर किया जा रहा है,वो संस्कृत की महिमा को जाने बिना ही उन कॉमेडी सीनों पर दात दिखाती है.
अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में नर्सरी से ही बच्चों को संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है, कहीं एसा न हो की हमारी संस्कृत कल वैश्विक भाषा बन जाये और हमारे नवयुवक संस्कृत को केवल भोंडे और भद्दे मसखरों के भाषा समझते रहें. अपने इस लेख से मै भारत के यूवाओं को आह्वान करता हूँ की आने वाले समय में संस्कृत कम्पुटर की भाषा बन्ने जा रही है ,सन २०२५ तक नासा ने संस्कृत में कार्य करने का लक्ष्य रखा है. अतः अंग्रेजी भाषा के साथ साथ वे अपने बच्चों को संस्कृत का ज्ञान जरूर दिलाएं ,और संस्कृत भाषा को भारत में उपहास का कारन न बनाये ,क्यों की संस्कृत हमारी देव भाषा है ,संस्कृत का उपहास करके हम अपनी जननी का उपहास हीं करते हैं ।
          जय श्री राम ।

स्वदेशी विदेशी वस्तुओ की सूची

स्वदेशी विदेशी वस्तुओ की सूची

दन्त मंजन / पेस्ट =
स्वदेशी — विको वज्रदंती, बैद्यनाथ, चोइस, नीम, डाबर , एंकर, मिस्वाक, बबूल, प्रोमिस, दन्त कांति दन्त मंजन।
विदेशी — अधिकतर दन्त पेस्ट हड्डियों के पावडर से बनते है, जेसे कोलगेट, हिंदुस्तान यूनिलीवर ( पहले हिन्स्तान लीवर ), क्लोस-अप, पेप्सोडेंट, एम, सिबाका, एक्वा फ्रेश, एमवे, ओरल बी, क्वांटम आदि ।

टुथ ब्रश ( दन्त साफ करने का उपकरण ) ==
स्वदेशी — प्रोमिस, अजय, अजंता, मोनेट, रोयल, क्लास्सिक, डोक्टर स्ट्रोक ।
विदेशी — कोलगेट, क्लोस-अप, पेप्सोडेंट, सिबाका, अक्वा फ्रेश, ओरल-बी, हिंदुस्तान यूनिलीवर ।

बाथ सोप (स्नान करने का साबुन) ==
स्वदेशी — निरमा , मेदिमिक्स, निम्, नीमा, जस्मीन, मेसोर सेंडल, कुटीर, सहारा, पार्क अवेन्यु, सिंथोल, हिमानी ग्लिसरीन, फिर फ्लो, न १, शिकाकाई, गंगा, विप्रो, संतूर, काया कांति, काया कांति एलो वेरा ।
विदेशी — हिंदुस्तान यूनिलीवर, लो’ ओरीअल , लाइफ ब्वाय ( कोई डर नहीं ) , ले सेंसि, डेनिम, चेमी, डव, रेविओं, पिअर्स, लक्स, विवेल, हमाम, ओके, पोंड्स, क्लिअर्सिल, पमोलिवे, एमवे, जोनसन बेबी, रेक्सोना, ब्रिज , डेटोल ।

शेम्पू, ( बाल धोने के लिए ) ==
स्वदेशी — विप्रो, पार्क अवेन्यु, स्वस्तिक, आयुर, केश निखर, हेअर एंड केअर, नैसिल, अर्निका, वेलवेट, डाबर, बजाज, नेल, लेवेंडर, गोदरेज, वाटिका ।
विदेशी –हेलो कोलगेट पामोलिव, हिंदुस्तान यूनिलीवर, लक्स, क्लिनिक प्लस, रेव्लों, लक्मे, पी एंड जी , हेड एंड शोल्डर, पेंटीन, डव, पोंड्स, ओल्ड स्पेस, शोवर तो शोवर, जोहानसन बेबी ।

कपडे / बर्तन धोने का पावडर ==
स्वदेशी — टाटा शुद्ध, नीमा, सहारा, लो’ ओरीअल , निरमा, स्वस्तिक, विमल, हिपोलिन, देना, ससा, टी सीरिज, डोक्टर देत, घडी डिटर्जन, गेंतिल, उजाला, रानिपल, निरमा, चमको, दीप
विदेशी — हिंदुस्तान यूनिलीवर, सर्फ़, रीन, सनलाईट, व्हील, विम, अरिअल, टाइड, हेंको, रेविअल, एमवे, क्वांटम, वुल्वाश, इजी, रोबिन ब्लू, टिनापोल, स्काईलार्क

दाढ़ी / शेविंग बनाने की क्रीम ==
स्वदेशी — पार्क अवेन्यु, प्रिमीअम, वि जोन, लो’ ओरीअल , इमामी, बलसारा, गोदरेज
विदेशी — ओल्ड स्पाइस, पामोलिव, पोंड्स, जिलेट, एरास्मिक, डेनिम, यार्डली

दाढ़ी / शेविंग पत्ती / ब्लेड ==
स्वदेशी — टोपाज, गेलंत ( gallant), सुपरमेक्स, लसर, एस्क्वेर, सिल्वर प्रिंस, प्रिमिअम
विदेशी — जिलेट, सेवन ‘ओ’ क्लोक, एरास्मिक, विल्मेन, विल्तेज आदि

क्रीम / पावडर ==
स्वदेशी — बोरोसिल, आयुर, इमामी, विको, बोरोप्लस, बोरोलीन, हिमामी, नेल, लावेंदर, हेअर एंड केअर, निविय, हेवन्स, सिंथोल, ग्लोरी, वेलवेट (बेबी)
विदेशी — हिंदुस्तान यूनिलीवर, फेअर एंड लवली, लक्मे, लिरिल, डेनिम, रेव्लों, पी एंड जी, ओले, क्लिएअर्सिल, क्लिएअर्तोन, चारमी, पोंड्स, ओल्ड स्पाइस, डेटोल ( ले १००% श्योर) , जॉन्सन अँड जॉन्सन

वस्त्र रेडीमेड ==
स्वदेशी — केम्ब्रिज, पार्क अवेन्यु, ओक्जेम्बर्ग ( ओक्सेम्बेर्ग) बॉम्बे डाइंग, रफ एंड टफ, ट्रिगर, किलर जींस, पिटर इंग्लेंड, डीजे अँड सी ( DJ&C ) ये हमारी ही मानसिकता है की हमारी कंपनिया हमें लुभाने के लिए अपने उत्पादों का विदेशी नाम रखती है ।
विदेशी — व्रेंग्लर, नाइकी, ड्यूक, आदिदास, न्यूपोर्ट, पुमा आदि

धड़ियाँ ==
स्वदेशी — एच एम टी, टाइटन, मेक्सिमा, प्रेस्टीज, अजंता आदि
विदेशी — राडो, तेग हिवर, स्विसको, सेको, सिटिजन, केसिओ

पेन पेन्सिल ==
स्वदेशी — शार्प, सेलो, विल्सन, टुडे, अम्बेसेडर, लिंक, मोंतेक्स, स्टिक, संगीता, लक्जर, अप्सरा, कमल, नटराज, किन्ग्सन, रेनोल्ड, अप्सरा,
विदेशी — पारकर, निच्कोल्सन, रोतोमेक, स्विसएअर , एड जेल, राइडर, मिस्तुबिशी, फ्लेअर, यूनीबॉल, पाईलोट, रोल्डगोल्ड

पेय ==
स्वदेशी — दुग्ध, लस्सी, ताजे फलों के रस, निम्बू पानी,नारियल का पानी, मिल्कशेक, ठंडाई, जलजीरा, रूह अफजा, रसना, फ्रूटी, एपी फ़िज़, ग्रेपो, जम्पिं, शरबत , डावर्स , एलएमएन, जलानी जलजीरा आदि
विदेशी — ( एक घंटे में चार कोल्ड ड्रिंक पिने से मृत्यु निश्चित है ) धीमा जहर कोका कोला, पेप्सी, फेंटा स्प्राईट, थम्स-अप, गोल्ड स्पोट, लिम्का, लहर, सेवन अप, मिरिंडा, स्लाइस, मेंगोला, निम्बुज़ आदि

चाय काफी ==
स्वदेशी — टाटा, ब्रह्मपुत्र, असम, गिरनार, वाघ बकरी, दिव्य पेय
विदेशी — लिप्टन, टाइगर, ग्रीन लेबल, येलो लेबल, चिअर्स, ब्रुक बोंड रेड लेबल, ताज महल, गोद्फ्रे फिलिप्स, पोलसन, गूद्रिक, सनराइस, नेस्ले, नेस्केफे, रिच , ब्रू आदि

शिशु आहार एवं दूध पावडर ===
स्वदेशी — शहद, डाल पानी, उबले चावल, तजा फलों का रस, अमूल, इंडाना, सागर, तपन, मिल्क केअर
विदेशी — नेस्ले, लेक्टोजन सेरेलेक, एल पी ऍफ़, मिल्क मेड, नेस्प्रे, ग्लेक्सो, फेरेक्स

कुल्फी / आइसक्रीम ==
स्वदेशी — घर की बनी कुल्फी, अमूल, वाडीलाल, दिनेश, हवमोर, गोकुल, दिनशा, जय , पेस्तोंजी
विदेशी — वाल्स, क्वालिटी, डोलोप्स, बास्किन एंड रोबिनस, केडबरी.. अधिकतर आइसक्रीम में जनवरी की आंतो की परत होती है

नमक ==
स्वदेशी — टाटा, अंकुर , सूर्य, ताजा, तारा, निरमा, सेंधव नमक.
विदेशी — अन्नपुर्णा , आशीर्वाद आटा, केप्टन कुक, हिंदुस्तान लीवर , किसान, पिल्सबरी आदि

नमकीन / स्नेक्स / चिप्स ==
स्वदेशी — बीकाजी, बिकानो, हल्दीराम, बालाजी, हिपो , पार्ले, A1, गार्डन आदि
विदेशी — अंकल चिप्स, पेप्सी, रफेल्स, होस्टेस, फन्मच, कुरकुरे, लेज आदि

टमाटर सौस, चटनिया, फ्रूट जेम ==
स्वदेशी — घर के बने हुए चटनिया, इंडाना, प्रिया, रसना, फ्रूट जाम, टिल्लूराम , मनोज, सिल, निलंस, रसना, कर्नल, पंतजलि
विदेशी — नेस्ले, ब्रुक बोंड, किसान, हेंज, फिल्ड फ्रेश, मेगी सौस

चोकलेट / दूध पावडर ==
स्वदेशी — गुड के साथ मूंगफली या बादाम लाभप्रद है, पार्ले, बेक्मंस, क्रिमिचा, शंगरीला, इंडाना, अमूल, रावलगाँव, ब्रिटानिया.
विदेशी — अधिकतर चोकलेट में अर्सेलिक जहर मिला होता है केडबरी, बोर्नविटा , होर्लिक्स, न्यूट्रिन, विक्स, मिल्किबर, इक्लेअर्स , मंच, पार्क, डेरिमिल्क, बोर्नविले, बिग बबल, एलपेनलिबें, सेंटरफ्रेश, फ्रूट फ्रेश, परफीती आदि

रेडीमेड खाना ==
स्वदेशी — घर का खाना, हाथो से बनाया हुआ या किसी पास के स्वच्छ शाकाहारी होटल का
विदेशी — मेगी, हेंज, नौर , डोमिनोज, पिज्जा हट , फ्रिन्तो-ले

पानी ==
स्वदेशी — घर का उबला हुआ पानी, बिसलेरी, हिमालय, रेल नीर, यस, गंगा आदि
विदेशी — एक्वाफिना, किनली, बिल्ले, पुरे लाइफ, एवियन, सेन पिल्ग्रिमो, पेरिअर आदि

शक्तिवर्धक ===
स्वदेशी — च्यवनप्राश सबसे उत्तम ८०% तक , न्युत्रमुल, मल्तोवा, अमृत रसायन, बादाम पाक. आदि
विदेशी — बूस्ट, पोलसन, बोर्नविटा, होर्लिक्स, प्रोतिनेक्स, स्प्राउट्स, कोमप्लैन

इलेक्ट्रोनिक्स वस्तु ==
स्वदेशी — ओनिडा, बी पी एल, विडियोकोन, अकाई ( आज कल नाम सुनने को नहीं मिलता ) , टी- सीरिज , सलोरा, वेस्टर्न, क्रोवन, टेक्सला, गोदरेज उषा, ओरीअंट, खेतान, पी एस पी औ, बजाज, सिन्नी, शंकर, टी-सीरिज, क्राम्पटन,
विदेशी —- सोनी, फिलिप्स, हुंदा , सेन्सुई, शार्प, एलजी, देवू , सेन्यो, नेशनल पेनासोनिक केनवुड, थोमसन, सेमसंग, हिताची, तोशिबा, कोनिका, पयोनिअर, केल्विनेटर, वर्ल्फुल, इलेक्ट्रोलक्स आई ऍफ़ बी, हायर सिंगर, महाराजा, जी इ, रेलिमिक्स, केनस्टार, मृत, ब्रोउन, नेशनल, फिलिप्स

मोबाइल फ़ोन / सेवाए ===
स्वदेशी — मेक्स, ओनिडा, माइक्रोमेक्स, उषा-लक्सस, अजंता, ओर्पट, आइडिया, एअरटेल, रिलाइंस, टाटा इंडिकोम, एमटीएनएल, लूप, कार्बन, लावा, लेमन, भारती बीटल
विदेशी — नोकिया, फ्लाई, मोटोरोला, एचटीसी, सोनी एरिक्सन, एसर, वर्जिन, वोडाफोन, एम टी एस , एल जी, सेमसंग, हायर, डॉकोमो आदि

खाद्य तेल सरसों का तेल ====
स्वदेशी —-, कच्ची घानी का तेल,
विदेशी —- डालडा ब्रांड, आई टी सी ब्रांड, हिंदुस्तान यूनिलीवर ब्रांड, फिल्ड फ्रेश ब्रांड के सभी वस्तुओ का बहिष्कार करे

कंप्यूटर ===
स्वदेशी — एच सी एल, विप्रो
विदेशी —- तोशिबा, एसर, एच पी, डेल, लिनोवो, सेमसंग, सोनी, आई. बी. एम. कोम्पेक आदि

दुपहिया वाहन ====
स्वदेशी —- हीरो, बजाज ( बजाज स्कूटर के बारे में सबको पता है, एक्टिवा से कड़ी टक्कर मिलने के कारण बजाज स्कूटर की जगह एक्टिवा दीखता है हमारी सडको पर,) टी वि एस, महिंद्रा, काइनेटिक
विदेशी — कावासाकी, होंडा, हुंडई, एक्टिवा, इटरनो, रोयल एनफील्ड, हर्ली डेविडसन, स्प्लेंडर , पेशन

वाहन ===
स्वदेशी — लेंड रोवर, जगुआर, इंडिका, नेनो, टाटा मेजिक, बोलेरो, सुमो, सफारी, प्रेमिअर, अम्बसेदर, अशोक लेलेंड, स्वराज, महिंद्रा ट्रेक्टर, जाइलो, रेवा, अतुल, टी.व्ही.एस
विदेशी — हुंडई, सेंट्रो, वोल्सवेगन, मर्सडीज, टोयोटा, निसान, स्कोडा, रोल्स रोयस, फेंटम, फोर्ड, जनरल, शेर्वोलेट, जोन डिअर, मारुति सुजुकी, लोगन

बैंक ===
स्वदेशी — इलाहाबाद बैंक, बैंक ऑफ़ बड़ोदा, बैंक ऑफ़ इंडिया, बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र, आई डी बी आई, केनरा बैंक, सेन्ट्रल बैंक, देना बैंक, कोर्पोरेशन बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसिस बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, सिंडिकेट बैंक, युको बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक, यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया, युनाइटेड बैंक ऑफ़ इंडिया, विजया बैंक, आंध्र बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, कोटक महिंद्रा, एक्सिस बैंक, यस बैंक, इडुसलेंड बैंक, धनलक्ष्मी, बैंक, सारस्वत बैंक, फेडरल बैंक, आई एन जी वैश्य बैंक, करुर वैश्य बैंक, कर्नाटका बैंक , लक्ष्मी विलाश बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ बीकानेर एंड जयपुर, साउथ इंडियन बैंक, नैनीताल बैंक आदि
विदेशी —- बैंक एचडीएफसी (HDFC), आई.सी.आई.सी.आई ( ICICI ), एबीएन एमरो, अबू धाबी बैंक, बीएनपी परिबास, सिटी बैंक, डच बैंक (Deutsche Bank), एच इस बी सी (HSBC), जे पि मोर्गन, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, तयब बैंक, स्कोटिया बैंक, अमेरिकन एक्सप्रेस बैंक, एंटवर्प बैंक, अरब बंगलादेश, बैंक ऑफ़ अमेरिका, बहरीन कुवैत, टोक्यो मित्सुबिशी बैंक, बार्कले बैंक, चाइना ट्रस्ट, क्रुंग थाई बैंक, सोनाली बैंक, शिन्हन बैंक, ओमान इंटरनेशनल बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ मौरिशश, डी बैंक ऑफ़ न्युयोर्क, ऑस्ट्रेलियन बैंक, फोर्टिस बैंक, कोमन वेल्थ बैंक, रोयल बैंक ऑफ़ कनाडा, अमीरात बैंक, जर्मन बैंक,

जूते / चप्पल ===
स्वदेशी — लिबर्टी, लखानी, स्काई, भारत लेदर, एक्शन, रिलेक्सो, पेरगोन, पोद्दार, वाइकिंग, बिल्ली, कार्नोबा, डीजे अँड सी ( DJ&C ), बफेलो, रिग
विदेशी — पुमा, बाटा, पॉवर, बीएमसी, एडीडास, नाइकी, रिबोक, फीनिक्स, वुडलेंड, लाबेल, चेरी ब्लोसम, कीवी, ली कूपर, रेड चीफ, कोलंबस

ऐसी विदेशी कंपनियाँ भी है जिसमे आधे से भी कम % भारतीय पैसा लगा हुआ है तो वे भी विदेशी हुई, इसी तरह भारतीय कंपनी मे विदेशी ५०% से ज्यादा पैसा लगा है तो वह विदेशी है,  आप यह पता भी लगाए की आप जिस कंपनी का माल खरीद रहे है है क्या वह पूर्णतया स्वदेशी है ? जेसे मारुति कंपनी मे ५४% पैसा सुजुकी कंपनी का है , और अब सरकार का इस कंपनी मे कुछ भी हिस्सा नहीं है, उसने अपना १८% हिस्सा भी शिक्षण संस्थानो को बेच दिया ! ये जरूरी नहीं की बिग बाजार कुछ विदेशी ब्रांड को अपने मॉल / ब्रांड के तले बेचता हो तो वे स्वदेशी है…

ललित कुमार रायसेन (म.प्र.) 8878382418

भारत : राजनीति का आयरिश कनेक्शन

भारत : राजनीति का आयरिश कनेक्शन

By :- आनंद कुमार

भारत में मार्च के अंत का दौर अलग अलग पार्टियों द्वारा सरदार भगत सिंह को हथियाने की कोशिशों का होता है। इसकी वजह से ज्यादातर लोगों ने उनकी पार्टी का नाम “हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी” (HRA) सुना-पढ़ा होगा। ये नाम उन्होंने आयरिश रिपब्लिकन आर्मी से प्रेरित होकर रखा था। बाद में इसी में सोशलिस्ट शब्द भी जोड़ा गया। आयरिश आंदोलनों से सिर्फ भगत सिंह प्रभावित नहीं हुए थे, उसका भारत पर और भी प्रभाव पड़ा था। जब 1870-90 के दौर में आयरिश लैंड वॉर चल रहा था तो स्थिति करीब करीब वैसी ही थी जैसी फिरंगी हुक्मरानों ने भारतीय किसानों की बना रखी थी।



सन 1880 में फसलें बहुत खराब हुई थी और एक जमींदार, लार्ड अर्ने के किसानों को बड़ी दिक्कत हो रही थी। आयरलैंड के काउंटी मायो में बल्लिनरोब के इलाके के पास लार्ड अर्ने की जमींदारी ही लेकिन वो वहां पर कम ही रहते थे। लिहाजा उनका काम काज देखने वाले कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट से किसानों ने बात की। वो “लगान” में कुछ छूट की मांग लेकर आये थे। लार्ड अर्ने ने दस प्रतिशत की छूट घोषित की, लेकिन किसान उस से संतुष्ट नहीं थे। वो 25% की छूट चाहते थे। कैप्टेन चार्ल्स ने पूरा “लगान” ना चुकाने वाले ग्यारह किसानों को निकाल बाहर करने का फैसला किया। इस खबर से बल्लिनरोब के लोउघ मास्क नाम की उस जमींदारी में हलचल मच गई।



उसी दौर में वहां पहुचे चार्ल्स स्टीवर्ट पर्नेल ने इलाके के लोगों से अपील की कि शांति बनाए रखें। जमीनें किसानों से खाली किये जाने के खिलाफ हिंसा करने के बदले बहिष्कार का सहारा लें। पर्नेल के भाषण में जमींदारों या उसके बिचौलियों का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन जैसे ही कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट ने ग्यारह किसानों से जमीन खाली करवाने की कोशिश की, ये बहिष्कार उसपर ही लागू हो गया। स्थानीय लोगों को दिक्कत तो हुई लेकिन कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट के लिए पूरी आफत खड़ी हो गई। उसके खेतों में फसल काटने के लिए कोई ना था। अस्तबलों और घर में भी काम करने के लिए कोई तैयार नहीं होता। स्थानीय व्यापारियों ने उसके साथ सौदा करने से इनकार कर दिया। और तो और, डाकिये ने उसके घर चिट्ठियां पहुँचाने से भी मना कर दिया।



अब चूँकि खेतों में फसल काटने के लिए कोई स्थानीय आदमी तैयार नहीं था, इसलिए दूर कहीं के केवन और मोनाघन से 50 लोगों को बॉयकाट ने बुलवाया। उनकी सुरक्षा जरूरी थी, कहीं स्थानीय लोग बाहर से आये मजदूरों से मार-पीट ना करें, इसलिए सुरक्षा के लिए उनके साथ हज़ार पुलिसकर्मी-सैनिक भी आये। स्थानीय लैंड लीग (land league) के नेताओं ने पहले ही कह दिया था कि बहिष्कार अहिंसक है, कोई हिंसा हुई भी नहीं। नतीजा ये हुआ कि जितनी फसल की कीमत नहीं थी, उतना खर्चा हज़ार सुरक्षाकर्मी लगाने में हो गया ! ऊपर से सैनिक लाकर दबाव बनाने से भड़के स्थानीय लोगों ने बहिष्कार आगे भी जारी रखा।

थोड़े ही दिनों में बहिष्कार की वजह से सब कैप्टेन चार्ल्स बॉयकाट का नाम जानने लगे। न्यू यॉर्क ट्रिब्यून के एक रिपोर्टर जेम्स रेडपाथ ने सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय ख़बरों में बॉयकाट के बारे में लिख दिया। आयरिश लेखक जॉर्ज मूर ने कहा कि “एक धूमकेतु की तरह बॉयकाट विशेषण उभर आया”। नवम्बर 1880 में समाज के सामूहिक बहिष्कार, बोलें तो, हुक्का पानी बंद के लिए ‘द टाइम्स’ ने बॉयकाट शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया। माइकल डेविट की “द फॉल ऑफ़ फ्यूडलिस्म इन आयरलैंड” में भी बॉयकाट शब्द का जिक्र है। “द डेली न्यूज़” दिसम्बर 1880 में इस शब्द का इस्तेमाल करने लगा था। यानि जिन किसानों के अस्तित्व को स्वीकारने से ही मना कर दिया था, उन्होंने बॉयकाट का मतलब ही 1881 की जनवरी तक बदल डाला था।



आयरिश क्रांति का प्रभाव सिर्फ सरदार भगत सिंह की क्रन्तिकारी पार्टी पर ही नहीं पड़ा था, सविनय अवज्ञा के गांधीवादी तरीकों में जिस बॉयकाट का इस्तेमाल होता है वो शब्द भी वहीँ से आया है। भारत का पिछला स्वतंत्रता आन्दोलन देखेंगे तो पता चलेगा कि 1940 के दशक में जब गांधीजी कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर अलग हो चुके थे, उस वक्त भी आंदोलनों में कई लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे। गांधीजी कांग्रेस में नहीं थे, इसलिए कांग्रेस की वर्किंग कमिटी की बैठक, सन 1942 में वर्धा में हुई थी। गांधीजी कांग्रेस छोड़ने के बाद वर्धा, महाराष्ट्र में रहते थे। चूँकि गांधीजी वर्धा में रहते थे, इसलिए वर्धा को “गांधीवादी जिला” बनाने की कोशिशें 1980 के दौर में भी की गई थी। वो अभी भी महाराष्ट्र का शराबबंदी वाला इलाका है, वहां शराब बेचना-पीना कानून जुर्म है।



इन अजीबोग़रीब वाकयों की वजह से 1940-47 के बीच और उसके बाद पुलिस की गोली से मरे दस हज़ार से ज्यादा स्वतंत्रता सेनानियों का कोई नाम भी नहीं लेता। नाम इसलिए भी नहीं लिया जाता क्योंकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सिर्फ कॉमरेडों के आकाओं का नाम लेने की परंपरा है। नेहरु के इस बगलबच्चा गिरोह ने कभी हमारी आजादी के लिए वीरगति को प्राप्त हुए हुतात्माओं को सम्मान देना जरूरी ही नहीं समझा। आश्चर्यजनक ये भी है कि समय के चक्र पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। भारत में जो 1720-50 के दौर में हुआ ठीक वही राष्ट्रवाद का ज्वर 1820-50 में आया, फिर से वो 1920-50 के दौर में दिखा। जो कभी 1990 में सोचा भी नहीं होगा, सन 2020 आते आते भारतीय फिर से बॉयकाट का इस्तेमाल करते दिखने लगे हैं। फिल्मों और कंपनियों पर इसका लागू होना सिर्फ शुरुआत भर है।



बिहार-बंगाल की राजनैतिक स्थितियां फिर से बॉयकाट को आमंत्रित कर रही हैं। चम्पारण आन्दोलन के सौ साल मनाने की जल्दी में सुशासन बाबू उन किसानों को भूल रहे हैं, जिन्होंने भूखे रहकर ये लड़ाई लड़ी थी। स्थानीय किसान नेताओं को गायब कर रहे हैं जिनके घरों के सामने से गुजरने पर रिक्शे वाले बताते जाते हैं कि फलां बाबु यहीं रहते थे। कांग्रेस तो खैर चार कदम और आगे है, चम्पारण आन्दोलन की जयंती मानाने आ रहे राहुल गाँधी के सम्मान में पोस्टर लगाये गए हैं। उसपर राजमाता और युवराज तो हैं, चम्पारण आन्दोलन भी लिखा है, मगर गांधीजी ही गायब हो गए हैं। पोस्टर नब्बे के दशक से पहले के नोट जैसे लगते हैं जिसपर गांधीजी नहीं होते थे।



बाकी आँखें खुली हो तो देखने की कोशिश कीजिये, बिना शोर मचाये, बिना किसी शिकायत जनता कैसे कब “बॉयकाट” कर जाती है, वो भी दिखने लगेगा। अभिजात्यों की इस जय-जयकार में आम आदमी की आवाज कहीं सुनाई देती है क्या ?

एक_हजार_वर्ष_पूर्व_रूस_में_था_हिन्दू_धर्म

#एक_हजार_वर्ष_पूर्व_रूस_में_था_हिन्दू_धर्म?

एक हजार वर्ष पहले रूस ने ईसाई धर्म स्वीकार किया। माना जाता है कि इससे पहले यहां असंगठित रूप से हिन्दू धर्म प्रचलित था और उससे पहले संगठित रूप से वैदिक पद्धति के आधार पर हिन्दू धर्म प्रचलित था। वैदिक धर्म का पतन होने के कारण यहां मनमानी पूजा और पुजारियों का बोलबाला हो गया अर्थात हिन्दू धर्म का पतन हो गया। यही कारण था कि 10वीं शताब्दी के अंत में रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर चाहते थे कि उनकी रियासत के लोग देवी-देवताओं को मानना छोड़कर किसी एक ही ईश्वर की पूजा करें।

उस समय व्लादीमिर के सामने दो नए धर्म थे। एक ईसाई और दूसरा इस्लाम, क्योंकि रूस के आस-पड़ोस के देश में भी कहीं इस्लाम तो कहीं ईसाइयत का परचम लहरा चुका था। राजा के समक्ष दोनों धर्मों में से किसी एक धर्म का चुनाव करना था, तब उसने दोनों ही धर्मों की जानकारी हासिल करना शुरू कर दी।

उसने जाना कि इस्लाम की स्वर्ग की कल्पना और वहां हूरों के साथ मौज-मस्ती की बातें तो ठीक हैं लेकिन स्त्री स्वतंत्रता पर पाबंदी, शराब पर पाबंदी और खतने की प्रथा ठीक नहीं है। इस तरह की पाबंदी के बारे में जानकर वह डर गया। खासकर उसे खतना और शराब वाली बात अच्छी नहीं लगी। ऐसे में उसने इस्लाम कबूल करना रद्द कर दिया।

इसके बाद रूसी राजा व्लादीमिर ने यह तय कर लिया कि वह और उसकी कियेव रियासत की जनता ईसाई धर्म को ही अपनाएंगे। ईसाई धर्म में किसी भी तरह की पाबंदी की चर्चा नहीं थी। लोगों को स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार था और उनमें किसी भी प्रकार का सामाजिक भय भी नहीं था। उसने ईसाई धर्म अपनाने के लिए यूनानी वेजेन्टाइन चर्च से बातचीत करनी शुरू कर दी। वेजेन्टाइन चर्च कैथोलिक ईसाई धर्म से थोड़ा अलग है और उसे मूल ईसाई धर्म या आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म कहा जाता है। इस तरह रूस के एक बहुत बड़े भू-भाग पर ईसाई धर्म की शुरुआत हुई।

रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर ने जब आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और अपनी जनता से भी इस धर्म को स्वीकार करने के लिए कहा तो उसके बाद भी कई वर्षों तक रूसी जनता अपने प्राचीन देवी और देवताओं की पूजा भी करते रहे थे। बाद में ईसाई पादरियों के निरंतर प्रयासों के चलते रूस में ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो सका है और धीरे-धीरे रूस के प्राचीन धर्म को नष्ट कर दिया गया।

प्राचीनकाल के रूस में लोग जिन शक्तियों की पूजा करते थे, उन्हें तथाकथित विद्वान लोग अब प्रकृति-पूजा कहकर पुकारते हैं। प्रकृति-पूजकों के लिए तो सूरज भी ईश्वर था और वायु भी ईश्वर थी और प्रकृति में होने वाला हर परिवर्तन, प्रकृति की हर ताकत को वे ईश्वर की हरकत ही समझते थे।

वे अग्नि, सूर्य, पर्वत, वायु या पवित्र पेड़ों की पूजा किया करते थे जैसा कि आज भारत में हिन्दू करता है। हालांकि वे प्रकृति को सम्मान देने के अलावा यह भी मानते थे कि कोई एक ईश्‍वर है जिसके कारण संपूर्ण संसार संचालित हो रहा है।

सबसे प्रमुख देवता थे- विद्युत देवता या बिजली देवता। आसमान में चमकने वाले इस वज्र-देवता का नाम पेरून था। कोई भी संधि या समझौता करते हुए इन पेरून देवता की ही कसमें खाई जाती थीं और उन्हीं की पूजा मुख्य पूजा मानी जाती थी। विद्वानों का कहना है कि प्राचीनकाल में रूसियों द्वारा की जाने वाली प्रकृति की यह पूजा बहुत कुछ हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों और रस्मों से मिलती-जुलती थी।

प्राचीनकाल में रूस के दो और देवताओं के नाम थे- रोग और स्वारोग। सूर्य देवता के उस समय के जो नाम हमें मालूम हैं, वे हैं- होर्स, यारीला और दाझबोग।

सूर्य के अलावा प्राचीनकालीन रूस में कुछ मशहूर देवियां भी थीं जिनके नाम हैं- बिरिगिन्या, दीवा, जीवा, लादा, मकोश और मरेना। प्राचीनकालीन रूस की यह मरेना नाम की देवी जाड़ों की देवी थी और उसे मौत की देवी भी माना जाता था। हिन्दी का शब्द मरना कहीं इसी मरेना देवी के नाम से तो पैदा नहीं हुआ? हो सकता है न? इसी तरह रूस का यह जीवा देवता कहीं हिन्दी का ‘जीव’ ही तो नहीं? ‘जीव’ यानी हर जीवंत आत्मा। रूस में यह जीवन की देवी थी।

रूस में आज भी पुरातत्ववेताओं को कभी-कभी खुदाई करते हुए प्राचीन रूसी देवी-देवताओं की लकड़ी या पत्थर की बनी मूर्तियां मिल जाती हैं। कुछ मूर्तियों में दुर्गा की तरह अनेक सिर और कई-कई हाथ बने होते हैं। रूस के प्राचीन देवताओं और हिन्दू देवी-देवताओं के बीच बहुत ज्यादा समानता है। यह हो सकता है कि रूस में भी पहले लोग हिन्दू ही होंगे। लेकिन बाद में वे ईसाई और मुसलमान हो गए। लेकिन रूस के प्राचीन धर्म के बहुत से निशान अभी भी रूसी संस्कृति में बाकी रह गए हैं। रूस के विद्वान अक्सर इस बारे में लिखते हैं और इस ओर इशारा करते हैं कि रूस का पुराना धर्म और हिन्दू धर्म करीब-करीब एक जैसे हैं।

 #कुछ_प्रमाण :--
वोल्गा क्षेत्र में मिली विष्णु की मूर्ति : कुछ वर्ष पूर्व ही रूस में वोल्गा प्रांत के स्ताराया मायना (Staraya Maina) गांव में विष्णु की मूर्ति मिली थी जिसे 7-10वीं ईस्वी सन् का बताया गया। यह गांव 1700 साल पहले एक प्राचीन और विशाल शहर हुआ करता था। स्ताराया मायना का अर्थ होता है गांवों की मां। उस काल में यहां आज की आबादी से 10 गुना ज्यादा आबादी में लोग रहते थे। माना जाता है कि रूस में वाइकिंग या स्लाव लोगों के आने से पूर्व शायद वहां भारतीय होंगे या उन पर भारतीयों ने राज किया होगा।

महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है। कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी। उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। महाभारत में उत्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है।

अर्जुन के बाद बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख मिलता है। यह विष्णु की मूर्ति शायद वही मूर्ति है जिसे ललितादित्य ने स्त्री राज्य में बनवाया था। चूंकि स्त्री राज्य को उत्तर कुरु के दक्षिण में कहा गया है तो शायद स्ताराया मैना पहले स्त्री राज्य में हो। खैर...!

2007 को यह विष्णु मूर्ति पाई गई। 7 वर्षों से उत्खनन कर रहे समूह के डॉ. कोजविनका कहना है कि मूर्ति के साथ ही अब तक किए गए उत्खनन में उन्हें प्राचीन सिक्के, पदक, अंगूठियां और शस्त्र भी मिले हैं।

मौजूदा रूस की जगह पहले ग्रैंड डची ऑफ मॉस्को का गठन हुआ। आमतौर से यह माना जाता है कि ईसाई धर्म करीब 1,000 वर्ष पहले रूस के मौजूदा इलाके में फैला। यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी के प्रख्यात विद्वान डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार रूसी भाषा के करीब 2,000 शब्द संस्कृत मूल के हैं।

यूक्रेन की राजधानी कीव से भी पहले का यह गांव 1,700 साल पहले आबाद था। अब तक कीव को रूस के सभी शहरों की जन्मस्थली माना जाता रहा है, लेकिन अब यह अवधारणा बदल गई है।

ऊल्यानफस्क स्टेट यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग के रीडर डॉ. एलिग्जैंडर कोझेविन ने सरकारी न्यूज चैनल को बाताया कि हम इसे अविश्वनीय मान सकते हैं, लेकिन हमारे पास इस बात के ठोस आधार मौजूद हैं कि मध्यकालीन वोल्गा क्षे‍त्र प्राचीनकालीन रूस की मुख्य भूमि है।

डॉ. कोझेविन पिछले साल साल से मैना गांव की खुदाई से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि वोल्गा की सहायक नदी स्तराया के हर स्क्वैयर मीटर जमीन अपने आप में अनोखी है और पुरातत्व का खजाना मालूम होती है।

#साभार

अज्ञेय आत्मन की वॉल से

भारत और चीन का सांस्कृतिक इतिहास एवं सम्बन्ध...

भारत और चीन का सांस्कृतिक इतिहास एवं सम्बन्ध...

Written by :- रवि शंकर

भारत और चीन दोनों पड़ोसी देश ही नहीं हैं, बल्कि दोनों में काफी कुछ साझा भी है। जब भी विश्व की प्राचीन सभ्यताओं की चर्चा होती है, भारत के साथ चीन का ही नाम लिया जाता है।

आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से चीन भारत के सर्वाधिक नजदीक माना जाता है। विश्व को अधिकांश तकनीकें इन्हीं दोनों देशों ने दी हैं। विश्व व्यापार पर कई हजार वर्षों तक इन्हीं दोनों देशों का कब्जा रहा है और आज फिर विश्व व्यापार पर इनका कब्जा होने वाला है। स्वाभाविक ही है कि भारत और चीन अच्छे पड़ोसी होते। दुर्भाग्यवश ऐसा है नहीं। मित्रता और शांति के सभी प्रयासों के बाद भी चीन भारत का शत्रु ही बना हुआ है। ऐसा क्यों है? और प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर हम चीन के साथ कैसा संबंध रखें? उसके साथ हम कैसा व्यवहार करें? क्या वास्तव में भारत और चीन के संबंध ऐतिहासिक रूप से प्राचीन हैं? क्या भारत और चीन की संस्कृति में कुछ साझा भी है?

यहां हमें यह समझने की आवश्यकता है कि चीन सामान्य पड़ोसी देश नहीं है, वह एक आक्रामक पड़ोसी है। वह लगातार भारत के अनेक भूभागों पर दावा ठोकता रहा है और उसने वर्ष 1962 में आक्रमण करके भारत के एक विशाल भूभाग पर कब्जा भी कर रखा है। पाकिस्तान ने भी उसे भारत से कब्जाए गए प्रदेश में से एक भाग सौंप रखा है। अभी भी अरुणाचल प्रदेश पर चीन ने दावा ठोंकना बंद नहीं किया है। अभी हाल तक चीन अपने यहां नक्शे में अरुणाचल प्रदेश को चीन में ही दिखाता रहा है। ऐसे में कोई भी रणनीति बनाने से पहले हमें चीन के इतिहास और वर्तमान दोनों को ही ठीक से ध्यान में रखना होगा। भारत द्वारा मित्रता के निरंतर प्रयासों के बाद भी आखिर क्यों चीन लगातार भारत के साथ संघर्ष की स्थिति बनाए हुए है? इस प्रश्न को समझने के लिए हमें चीन के इतिहास को ठीक से खंगालना होगा। तभी हम उसकी इस मनोवृत्ति की पृष्ठभूमि को समझ पाएंगे और उसका निराकरण भी कर पाएंगे।

चीन के मिथक
सबसे पहले हमें चीन के बारे में कुछ मिथकों को सुधार लेना चाहिए। वर्तमान चीन का क्षेत्रफल भारत से लगभग तीन गुणा है। परंतु चीन की जनसंख्या भारत से थोड़ी सी ही अधिक है। समझने की बात यह है कि चीन आज जितना बड़ा हमें दिखता है, वह वास्तव में उतना बड़ा है नहीं। चीन का वास्तविक प्रदेश भारत जितना ही है। यदि हम इतिहास में थोड़ा और पीछे जाएंगे तो चीन भारत जितना भी नहीं रहा है। बारहवीं शताब्दी से पहले तक उसका वास्तविक क्षेत्रफल भारत से काफी छोटा रहा है। इसे हम विभिन्न शताब्दियों में चीन के नक्शे से समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए आभ्यंतर मंगोलिया, तिब्बत, शिन ज्याङ् और मांचूरिया कभी भी चीन का हिस्सा नहीं रहे।

चीन का मूल प्रदेश हान प्रदेश है। इसका क्षेत्रफल भारत के बराबर है। हान जाति ही मूल चीनी जाति है। हानों की संस्कृति ही मूल चीनी संस्कृति है। और हानों का प्रदेश काफी सीमित रहा है। इन पर तुर्क, मंगोल और मांचू जातियों ने शताब्दियों तक राज किया। परंतु जैसे ही इनके राज्य समाप्त हुए, चीन ने इनके प्रदेशों को हड़प लिया। परिणामस्वरूप आज चीन में तुर्क, मंगोल और मांचू प्रदेश भी शामिल है। यही कारण भी है कि चीन में इन सभी क्षेत्रों में खासकर शिन ज्याङ् और तिब्बत में चीन विरोधी प्रदर्शन हमेशा चलते रहते हैं जो कभी-कभी हिंसक रूप भी ले लेते हैं। मंगोलिया के अलावा शेष प्रदेशों के नाम चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने बदल दिए हैं। संभवतः वे उन क्षेत्रों की जनता को अपना इतिहास भुलवा देना चाहते होंगे। तुर्किस्तान का नाम शिन ज्याङ् रखा है जिसका अर्थ होता है नया प्रदेश। मांचू प्रदेश को मंचु कुओ के पुराने नाम से पुकारने की बजाय तीन प्रदेशों में बांट कर ल्याओ निङ्, कीरिन और हाइ लुङ् ज्याङ् नाम दिया गया है। तीनों को मिला कर उत्तर पूर्वी प्रदेश कहा जाता है। इसी प्रकार चीन ने तिब्बत को भी तीन भागों में बांट दिया है। तिब्बत, छाम्दो और चिङ् हाइ। मूलतः हान और वर्तमान कम्यूनिस्ट चीन ने इन सभी क्षेत्रों को अपने रंग में रंगने की भरपूर कोशिशें की हैं।

बहरहाल, चीन देश का उल्लेख भारत में पुराणों के अलावा कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी पाया जाता है। चाणक्य ने चीन से रेशम का व्यापार किये जाने की चर्चा की है। चीन का नाम भी वहां का अपना नहीं है। चीन शब्द संस्कृत भाषा का है चीनी भाषा का नहीं। चीन का वहां की भाषा में नाम है झोंगुओ जिसका अर्थ होता है मध्य प्रदेश। सीधी-सी बात है कि दुनिया चीन को भारतीय नाम से ही जानती और पुकारती है और वे स्वयं भी अपनी भाषा के नाम की बजाय भारतीय भाषा के नाम को ही स्वीकारते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि चीन भी कभी भारत का ही एक प्रदेश रहा होगा। महाभारत में एक स्थान पर संजय धृतराष्ट्र को उनके विशाल साम्राज्य का स्मरण दिलाते हैं, तो उसमें चीन देश का भी नाम लेते हैं। इससे प्रतीत होता है कि कम से कम महाभारत के काल में तो चीन भारत का ही एक प्रदेश रहा होगा। यदि वह भारत का प्रदेश न भी रहा हो तो भी इतना तो इससे साफ हो जाता है कि चीन को भारत के द्वारा ही दुनिया ने जाना और समझा था। इसीलिए उसका भारतीय नाम ही प्रसिद्ध हुआ। यदि हम चीन के वर्तमान विभिन्न भूराजनीतिक तथा भूसांस्कृतिक क्षेत्रों की पड़ताल करें, यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाएगी।
तिब्बत और भारत

वर्तमान चीन का एक बड़ा भाग है तिब्बत। तिब्बत का उल्लेख भारतीय ग्रंथों में त्रिविष्टप के नाम से पाया जाता है। त्रिविष्टप से ही तिब्बत शब्द बना है। तिब्बत और भारत के सांस्कृतिक संबंधों को तो बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता है। वर्ष 1951 से पहले तक तिब्बत एक अलग राज्य था जो सांस्कृतिक रूप से पूरी तरह भारत का अंग था। तिब्बत के निवासी भारतीय मूल के बौद्ध मत को मानते रहें हैं। तिब्बती भाषा में संस्कृत और पाली के बड़ी संख्या में अनुवादित ग्रंथ पाए जाते हैं जिनमें से कई तो अभी मूल रूप में अप्राप्य हो चुके हैं। तिब्बत वर्ष 1950 तक चीन का हिस्सा नहीं रहा है और यदि भारतीय नेताओं ने थोड़ी समझदारी दिखाई होती तो आज भी वह चीन का हिस्सा नहीं होता। इतिहास देखें तो भी मंगोलों के शासन के अलावा तिब्बत कभी भी चीन का हिस्सा नहीं रहा। दुखद बात यह है कि जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तो भारत की तत्कालीन सरकार ने तिब्बत का सहयोग नहीं किया। आज भी तिब्बत की निर्वासित सरकार का केंद्र भारत में ही है।

शिन ज्याङ् और खोतान

तिब्बत के अलावा वर्तमान चीन का एक बड़ा भूभाग है शिन ज्याङ्। यह वास्तव में तुर्किस्तान है जिसे चीनी तुर्किस्तान भी कहा जाता है। शिन ज्याङ् भी एक भारतीय राज्य रहा है। यहां हजार वर्ष लंबे बौद्ध राज्य के होने के पुरातात्विक प्रमाण बड़ी संख्या में पाए गए हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से यह पूरा प्रदेश खोतान कहा जाता था। तिब्बती और भारतीय स्रोतों से ज्ञात होता है कि खोतान आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले तक एक वीरान प्रदेश था। एक वर्णन के अनुसार मौर्य शासकों के काल में अशोक ने हिमालयी क्षेत्रों में बसे लोगों से नाराज होकर उन्हें इधर भेज दिया था। उन्हीं भारतीय लोगों, जिनकी संख्या लगभग 7000 बताई जाती है, ने खोतान को बसाया। उसके कुछ समय पश्चात् चीन से लोगों का एक समूह भी खोतान के पूर्वी इलाके में आकर बस गया। कालांतर में खोतान पर प्रभुत्व के लिए दोनों गुटों में संघर्ष हुआ और बाद में दोनों ने मिल कर शासन करना स्वीकार किया। परंतु खोतान पर सांस्कृतिक रूप से भारतीय अधिक प्रभावी रहे। इसलिए वहां की लिपि, साहित्य और संस्कृति सभी भारतीय ही बनी रही। केवल राजनीतिक प्रभुत्व चीन के साथ साझा करना पड़ा। यही कारण है कि खोतान में पुरातात्विक खुदाई में बड़ी संख्या में भारतीय संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

खोतान के संबंध में अनेक कथाएं भारतीय और तिब्बती संदर्भों में मिलती हैं। उनमें काफी साम्यता भी है और कुछ भेद भी। इन कथाओं के आधार पर चंद्रगुप्त वेदालंकार लिखते हैं, “भगवान् बुद्ध के निर्वाण पद को प्राप्त करने के चार सौ वर्ष उपरान्त और धर्माशोक की मृत्यु के 165 वर्ष बाद 53 ई. पू. खोतान के राजा विजयसम्भव के शासनकाल के पांचवें वर्ष अर्हत वैरोचन ने पहले-पहले खोतान में बौद्धधर्म का प्रचार किया। इस समय भारत में मौर्यों का शासन समाप्त हो चुका था। मौर्यों के बाद कण्व आये। कण्व राजा भूमिमित्रा को शासन करते हुए जब 10 वर्ष हो चुके थे जब कश्मीर से अर्हत वैरोचन नामक एक भिक्षु खोतान गया। इसने राजा को बौद्धधर्म की दीक्षा दी। ’ली’ भाषा और ’ली’ लिपि का प्रचार किया।“

विभिन्न तिब्बती और भारतीय वर्णनों के अनुसार निम्न बातें सामने आती हैं-
(क) अशोक से बहुत वर्ष पूर्व कुछ ऋषि (धर्मप्रचारक) खोतान गये थे। परन्तु वहां के निवासियों ने उनका स्वागत न कर अपमान किया, जिससे उन्हें वापिस लौटना पड़ा।

(ख) किन्हीं दैवीय कारणों से खोतान में भयंकर जल-विप्लव हुआ और वहां की जन-संख्या बिलकुल नष्ट हो गई।

(ग) पानी सूखने पर अशोक का मंत्राी यश और राजकुमार कुस्तन स्थान ढूंढ़ते हुए खोतान पहुंचे। देश को जनशून्य देखकर और स्थान की सुन्दरता से मुग्ध होकर दोनों ने उसे बसा लिया।

(घ) इन्हीं कथानकों से एक परिणाम और निकलता है और वह यह है कि खोतान एक भारतीय उपनिवेश था। जिन लोगों ने उसे बसाया वे भारतीय थे। उनके देवता वैश्रवण और श्री महादेवी थे। उनके मन्दिरों की मूर्तियां भी इन्ही देवताओं की थीं।

शिन ज्याङ् में भारतीय धर्म

अर्हत वैरोचन कश्मीर से खोतान गया। वहां जाकर उसने बौद्धधर्म का प्रचार किया। राजा उससे प्रभावित होकर बुद्ध का भक्त बन गया और कुछ समय पश्चात् उसने एक विहार बनवाया जो खोतान का सर्वप्रथम बौद्धविहार था। खोतान के बारे में चीनी यात्राी फाह्यान ने जो वर्णन किया है, वह भी भारतीय प्रभावों की पुष्टि करता है। 404 ई. में फाह्यान लिखता है, “देश बहुत समृद्ध है। लोग खूब सम्पन्न हैं। जनसंख्या बढ़ रही है। यहां के सब निवासी बौद्ध है और मिल कर बुद्ध की पूजा करते हैं। प्रत्येक घर के सामने एक स्तूप है। छोटे-से छोटे स्तूप की ऊंचाई पच्चीस फीट है। संघारामों में यात्रियों का खूब स्वागत किया जाता है। राज्य में बहुत से भिक्षु निवास करते हैं। इनमें अधिकांश महायान सम्प्रदाय के हैं। अकेले गोमति विहार में ही महायान सम्प्रदाय के तीन सहस्त्रा भिक्षु निवास करते हैं, तथा घण्टा बजने पर भोजन करने के लिए भोजनालय में प्रविष्ट होते हैं और चुपचाप अपने स्थान पर बैठ जाते है। भोजन करते हुए ये परस्पर बात-चीत नहीं करते और न बांटने वाले के साथ ही बोलते हैं। प्रत्युत हाथ से ही ’हां’ और ’न’ का इशारा कर देते हैं।” इसी प्रकार एक और चीनी यात्राी सुड्.-युन् 519 ई. में खोतान पहुंचा। वह लिखता है, ’’इस देश का राजा सिर पर मुर्गे की आकृति का मुकुट धारण करता है। उत्सवों के समय राजा के पीछे तलवार और धनुष उठाने वालों के अतिरिक्त विविध वाद्य-उपकरणों को बजाने वाले भी चलते हैं। यहां की स्त्रिायों पुरुषों की भांति घोड़ों पर चढ़ती हैं। मुर्दे जलाये जाते हैं।“

प्राचीन खोतान नगर के बारे में चंद्रगुप्त वेदालंकार ने लिखा है, “युरङ्काश नदी के पश्चिमीय किनारे पर योतकन नामक नगर विद्यमान है। यहां पर प्राचीन समय के भग्नावशेष प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हुए हैं। गम्भीर अन्वेषण से ज्ञात हुआ है कि इसी स्थान पर खोतान देश की प्राचीन राजधानी खोतान नगर विद्यमान था। यहां से मध्यकालीन भारतीय राजाओं के आठ सिक्के उपलब्ध हुए हैं। इसमें से छः काश्मीर के राजाओं के है और शेष दो सिक्के काबुल के हिन्दु राजा ’’सामन्तदेव’’ के हैं। यहां से मिट्टी का बना हुआ एक छोटा-सा बर्तन मिला है। इसके सिर पर एक बन्दर बैठा हुआ है जो सितार बजा रहा हैं। एक अन्य बर्तन के दोनों ओर दो स्त्रियों की मूर्तियां बनी हुई हैं। ये गन्धर्वियों की मूर्तियां है। मिट्टी के बने हुए वैश्रवण के सिर मिले हैं। घन्टे की आकृति की एक मोहर भी प्राप्त हुई है। एक अन्य मोहर पर गौ का चित्र बना हुआ है। पीतल की बनी एक बुद्ध मूर्ति भी मिली है। इसका दायां हाथ ऊपर की ओर है और अंगुलियां ऊपर उठाई हुई हैं। एक दीवार पर ’मार’ और उसकी स्त्राी द्वारा भगवान् बुद्ध को प्रलोभित करने का दृश्य दिखाया गया है। एक आले में बोधिसत्व की मूर्ति विराजमान हैं। इसका दाहिना स्कंध तथा छाती नंगी है। देह पर चीवर पहरा हुआ है। दायां हाथ पृथ्वी की ओर झुका हुआ है। समीप ही तीन स्त्रियों की मूर्तियां हैं। इनमें से एक मूर्ति नागिन की है। सामने ’मार’ का भयावह चित्र है। इसने हाथ में वज्र पकड़ हुआ है और मुंह बुद्ध की ओर फेरा हुआ है।“
ये वर्णन साबित करते हैं कि प्राचीन खोतान और वर्तमान शिन ज्याङ् एक समय में भारतीय प्रदेश ही रहे हैं। वहां भारतीय परंपराओं के अनुसार ही लोग जीवन जीते रहे हैं। कालांतर में यहां इस्लाम का आगमन हुआ और यहां के लोगों ने पराजित होने पर इस्लाम स्वीकार कर लिया। परंतु इसके बाद भी यह स्वाधीन प्रदेश था। मंगोलों ने पहली बार इसे अपने साम्राज्य में शामिल किया।
मंगोलिया में भारतीय प्रभाव

चीन के उत्तर में स्थित मंगोलिया के भी भारत से काफी नजदीकी संबंध रहे हैं। प्रसिद्ध विद्वान तथा भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे आचार्य रघुवीर पचास के दशक में मंगोलिया की यात्रा पर गए थे। बीसवीं शताब्दी में भारत से मंगोलिया जाने वाले वे पहले आचार्य थे। 1956 में जब वे वहां गए तो वहां की जनता के लिए मानो एक युगप्रवर्तक घटना घटी हो। प्रधानमंत्राी से लेकर विद्वान, पत्राकार, जनता-जनार्दन का अपार स्नेह उन्हें मिला। जिस-जिस तम्बू में वे गए, माताओं ने अपने बच्चों को उनकी गोद में बिठा दिया, सब उनका आशीर्वाद पाने को आतुर थे। उस समय उनके अनुसंधान का विषय था – मंगोलिया की भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म। वह इतिहास जिसमें छठी शताब्दी के उन भारतीय आचार्यों का वर्णन है जो धर्म की ज्योति लिए मंगोल देश में गये, और 6000 संस्कृत ग्रन्थों का मंगोल भाषा में भाषान्तर किया, जिनके द्वारा निर्मित दास लाख मूर्तियां, सात सौ पचास विहारों में सुरक्षित थीं, जिनके द्वारा लिखी अथवा लिखवायी गयीं बत्तीस लाख पाण्डुलिपियां 1940 तक विहारों में सुरक्षित थीं, लाखों प्रभापट थे। वहां उन्होंने चंगेज खां के वंशजों के अति दिव्य मन्दिर देखे जो गणेशजी की मूर्तियों से सुशोभित थे।

यहां से आचार्य जी मंगोल भाषा में अनूदित अनेक ग्रन्थ लाये जिनमें कालिदास का मेघदूत, पाणिनि का व्याकरण, अमरकोश, दण्डी का काव्यादर्श आदि सम्मिलित हैं। इनमें से एक, गिसन खां अर्थात् राजा कृष्ण की कथाओं का उनकी सुपुत्राी डॉ. सुषमा लोहिया ने अनुवाद किया है। वे भारतीयों को भारतीयता के गौरव की अनुभूति करवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मंगोल-संस्कृत और संस्कृत-मंगोल कोश भी लिख डाले। उन्होंने मंगोल भाषा का व्याकरण भी लिखा ताकि भावी पीढ़ियां उसका अध्ययन कर सकें। वहां आलि-कालि-बीजहारम् नामक, संस्कृत पढ़ाने की एक पुस्तक आचार्य जी को उपलब्ध हुई। इसमें लाञ्छा और वर्तुल दो लिपियों का प्रयोग किया गया है। भारत में ये लिपियां खो चुकी हैं। मंगोलिया में बौद्ध भिक्षु संस्कृत की धारणियों को लिखने और पढ़ने के लिए इस पुस्तक का अध्ययन किया करते थे। इसमें संस्कृत अक्षरों का तिब्बती और मंगोल लिपियों में लिप्यन्तर कर उन्हीं भाषाओं में वर्णन प्रस्तुत किए गए हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि इसकी छपाई चीन में हुई थी। यह पुस्तक, मात्र भारत के चीन, मंगोलिया और तिब्बत के साथ सांस्कृतिक सम्बंधों की गाथा ही नहीं सुनाती अपितु नेवारी, देवनागरी तथा बंगाली लिपियों का विकास जानने में भी सहायक है। इस प्रकार मंगोलिया भी चीन की बजाय भारत के अधिक नजदीक रहा है, सांस्कृतिक ही नहीं, वरन् राजनीतिक रूप से भी। इनर मंगोलिया वास्तव में मंगोलिया का ही एक हिस्सा है और इसलिए वह भी चीनी होने की बाजय भारतीय संस्कृति के रंग में रंगा हुआ रहा है, बहुत कुछ आज भी है।

चीन पर भारतीय प्रभाव
यही कारण है कि चीन आदि में भारत के राजनीतिक प्रभाव के सूत्र भी प्राप्त होते हैं। समझने की बात यह है कि भारतीय राजाओं ने कभी भी अपने उपनिवेश बनाने का प्रयास नहीं किया है। वे हमेशा स्थानीय शासन को ही वरीयता देते रहे हैं। इतिहास में ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिलते हैं, जिसमें भारतीय राजा ने किसी अत्याचारी राजा को मारा, परंतु फिर वहीं के किसी व्यक्ति को वहां का शासक बना दिया। भारतीय राजाओं ने हमेशा केवल धर्म के शासन को सुनिश्चित किया न कि किसी व्यक्ति या राजवंश के शासन को। यही कारण है कि पूरी दुनिया में भारतीय शासकों ने धर्म का शासन स्थापित किया था और उसके कारण वे वहां अत्यंत लोकप्रिय भी हुए थे। इसलिए आज की औपनिवेशिक मानसिकता से यदि हम भारतीय राजनीतिक प्रभावों को तलाशने का प्रयास करेंगे तो संभवतः हमें कुछ भी हाथ नहीं लगेगा, परंतु यदि हम भारत की राजनीतिक परंपरा को ध्यान में रखेंगे तो हमें काफी कुछ प्राप्त हो सकता है। उदाहरण के लिए कण्व वंश के शासकों का शासन जब खोतान पर था तब चीन से राजनयिक विवाह संबंध भी होते रहे हैं। वर्ष 68 में भारत से एक विद्वत् मंडल चीन बुलाया गया। इसका वर्णन रेवरेंड जोसेफ एडकिन्स ने अपनी पुस्तक चाइनिज बुद्धीज्म में किया है। एडकिन्स ने इसकी तुलना अफ्रीका से पहली बार यूरोप पहुँचे पहली ईसाई मिशनरी के साथ हुए व्यवहार से की है। भारतीय धर्मप्रचारकों को जहां शासकीय सम्मान और स्वागत मिला था, ईसाई मिशनरियों को बंदी बना लिया गया था और सार्वजनिक रूप से जलील करते हुए उन्हें बाहर खदेड़ दिया गया था। इससे अफ्रीका-यूरोप के संबंधों और साथ ही भारत-चीन के राजनीतिक संबंधों की जानकारी मिलती है। सांस्कृतिक स्वागत भी तभी होते हैं जब राजनीतिक संबंध प्रगाढ़ होते हैं।

एडकिन्स के इस वर्णन का साक्ष्य अनेक तिब्बती ग्रंथों से भी मिलता है। चंद्रगुप्त वेदालंकार लिखते हैं, “अशोक द्वारा राजकीय सहायता मिलने से बौद्वधर्म भारत की प्राकृतिक सीमाओं को पार कर एशिया, योरुप और अफ्रीका तीनों महाद्वीपों में फैल गया। तदनन्तर कुशन राज कनिष्क ने बौद्वधर्म के प्रचारार्थ भारी प्रयत्न किया। इसी के समय पेशावर में चतुर्थ बौद्धसभा बुलाई गई। जिस समय पश्चिम-भारत में कुशान राजा राज्य कर रहे थे उस समय तक चीन में बौद्धधर्म का प्रचार प्रारम्भ हो चुका था।”

चीन में बौद्ध धर्म

“चीनी पुस्तक ’को-वैन्-फिड्.-ची’ से ज्ञात होता है कि चीन के ’हान’ वंशीय राजा मिङ्ती ने 65 ई. में 18 व्यक्तियों का एक दूतमण्डल भारत भेजा जो लौटते हुए अपने साथ बहुत से बौद्ध ग्रन्थ तथा दो भिक्षु ले गया। इस प्रकार चीनी विवरण के अनुसार मिङ्ती के शासनकाल में ही चीन में प्रथम बार बौद्धधर्म प्रविष्ट हुआ। परन्तु प्रश्न पैदा होता है कि यह दूतमण्डल भेजा क्यों गया? इसका उत्तर चीनी पुस्तकें इस प्रकार देती है-’’ हान वंशीय राजा मिङ्ती ने अपने शासन के चौथे वर्ष स्वप्न में 12 1/2 फीट ऊंचे एक स्वर्णीय पुरुष को देखा। उसनके सिर से सूर्य की भांति तीव्र प्रकाश निकल रहा था। राजा की ओर आता हुआ वह दिव्य पुरुष महल में प्रविष्ट हुआ। स्वप्न से बहुत अधिक प्रभावित होकर राजा ने मंत्राी से इस स्वप्न का रहस्य पूछा। मंत्राी ने उत्तर दिया- आप जानते हैं कि भारतवर्ष में एक बहुत विद्वान् पुरुष रहता है जिसे बुद्ध कहा जाता है। यह पुरुष निश्चय से वही था। यह सुनकर राजा ने अपने सेनापति तथा 17 अन्य व्यक्तियों को महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का पता लगाने के लिये भारत भेजा।” यह कहानी बताती है कि चीन पर भारत का प्रभाव बौद्धों के आविर्भाव के पहले से रहा है। भारत में हो रही सभी गतिविधियों की जानकारी चीन के लोगों को बखूबी है। इतना ही नहीं, वे उनसे इतने प्रभावित हैं कि उनके राजा को उसके सपने तक आते हैं।

वेदालंकार आगे लिखते हैं, “चीन में बौद्धधर्म के प्रवेश की यह कथा तद्देशीय 13 अन्य ग्रन्थों में भी पाई जाती है। बिल्कुल यही कथानक तिब्बती ग्रन्थ ’तब्था-शैल्ख्यी-मीलन्’ में भी इसी प्रकार संगृहीत है। इन सब ग्रन्थों के अनुसार चीन में बौद्धधर्म का सर्वप्रथम उपदेष्टा ’काश्यप् मातङ्ग’ था। मातङ्ग इसका नाम था और क्योंकि यह कश्यप गोत्रा में उत्पन्न हुआ था इसलिये यह काश्यप् मातङ्ग नाम से प्रसिद्ध था। यह मगध का रहने वाला था। जिस समय चीनी दूतमण्डल भारत आया तब यह गान्धार में था । दूतमण्डल की प्रेरणा पर यह चीन जाने को उद्यत हो गया। उस समय गान्धार से चीन जाने वाला मार्ग खोतान और गौबी के मरुस्थल में से होकर जाता था। मार्ग की सैकड़ों विपत्तियों को सहता हुआ कश्पय मातङ्ग चीन पहुंचा। चीन पहुंचने पर राजा ने इसके निवासार्थ ’लोयड्.’ नामक विहार बनवाया। मिङ्ती द्वारा भारतीय पण्डितों के प्रति पक्षपात दिखाने पर कन्फ्यूशस और ताऊ धर्म वालों ने बौद्धधर्म के विरुद्ध आवाज उठाई। इस पर तीनों धर्मां की परीक्षा की गई। इस परीक्षा में बौद्धधर्म सफल हुआ।”

“इस प्रकार चीन में बौद्धधर्म के जड़ पकड़ते ही भारतीय पण्डित इस ओर आकृष्ट हुए और बहुत बड़ी संख्या में चीन जाने लगे। प्रथम जत्थे में आर्यकाल, श्रमण सुविनय, स्थविर चिलुकाक्ष आदि के नमा उल्लेखनीय है। दूसरी शताब्दी के अन्य होने से पूर्व ही महाबल चीन गया। इसने लोयड्. विहार में रह कर संस्कृतग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद किया। तीसरी शताब्दी में धर्मपाल चीन गया और अपने साथ कपिलवस्तु से एक संस्कृत ग्रन्थ भी ले गया। 207 ई. में इसका अनुवाद किया गया। तदुपरान्त ’महायान इत्युक्तिसूत्र’ का अनुवाद हुआ। 222 ई. में धर्मपाल चीन पहुंचा। इसने देखा कि चीनी लोग विनय के नियमों से सर्वथा अपरिचित हैं। ये नियम ’प्रातिमोक्ष सूत्र’ में संगृहीत थे। धर्मपाल ने प्रातिमोक्ष का अनुवाद करना आरम्भ किया। 250 ई. में इसका पूर्णतया अनुवाद हो गया। विनय पिटक की यह प्रथम ही पुस्तक थी जो अनुदित की गई थी। 224 ई. में विघ्व और तुहयान, ये दो पण्डित चीन गये और अपने साथ ’धम्मपद’ सूत्र ले गये। दोनों ने मिलकर इसका अनुवाद किया। तीसरी शताब्दी समाप्त होते होते कल्याणरन, कल्याण और गोरक्ष चीन पहुंचे। ये भी अनुवादकार्य में जुट गये। इस प्रकार तीसरी शताब्दी तक निरन्तर भारतीय पण्डितों का प्रवाह चीन की ओर प्रवृत्त रहा। इस बीच में 350 बौद्धधर्मग्रंथ चीनी भाषा में अनुदित किये जा चुके थे। जनता में बौद्धधर्म के प्रति पर्याप्त अनुराग पैदा हो गया था और बहुत से लोग बुद्ध, धर्म तथा संघ की शरण में आ चुके थे।”
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि आज से ढाई हजार वर्ष पहले तक चीन की भौगोलिक रचना काफी छोटी थी और महाभारत काल में चीन भारत के कुरूराज के साम्राज्य से जुड़ा भी रहा है। भारत के लोग मध्य, पश्चिम और उत्तरी एशिया के सभी क्षेत्रों में इसी प्रकार आया जाया करते थे, जैसे आज हम भारत के किसी एक राज्य से दूसरे राज्य में चले जाया करते हैं। इस पूरे क्षेत्रा में भारत की स्थिति राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से प्रेरक तथा नायक की थी। इस पूरे इलाके के लोग भारत को अपना श्रद्धा केंद्र मानते थे। चीन भी इसमें शामिल रहा है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखें तो फिर चीन के साथ हम अपने संबंधों और भावी रणनीति पर विचार कर सकते हैं। चीन का वास्तविक क्षेत्र भारत से काफी छोटा है और यदि हम उसका बढ़ा हुआ क्षेत्राफल स्वीकार कर लें, तो भी वह भारत के बराबर ही ठहरता है। साथ ही यह भी समझने की बात है कि चीन का वह क्षेत्र भारत से खासा दूर है। चीन को इस इतिहास की याद दिलाने की आवश्यकता है। वर्तमान चीन के जो प्रदेश भारत की सीमा से लगते हैं, वे वास्तव में कम्यूनिस्ट साम्राज्यवादी चीन के अंग हैं। चूंकि कम्यूनिस्ट स्वभाव से विस्तारवादी होते हैं, इसलिए वर्तमान चीन की हम चाहे जितनी लल्लो-चप्पो कर लें, वह अपना विस्तारवादी रवैया नहीं छोड़ेगा। कम्यूनिस्ट चीन और पाकिस्तान की आपस में बनती भी इसी कारण से है कि ये दोनों ही भारत को अपना शिकार समझते हैं। ऐसे में भारत के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह चीन के साथ प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को जीवित करने के प्रयास करे। जब भी चीन द्वारा भारतीय प्रदेशों की चर्चा की जाए, तब-तब तिब्बत, शिन ज्यांङ् और मंगोलिया के भारतीय इतिहास को सामने लाया जाना चाहिए। भारत को तो शिन ज्याङ् और तिब्बत के इतिहास को बौद्धिक विश्व पटल पर निरंतर उठाते ही रहना चाहिए। इसमें ध्यान रखने की बात यह है कि चीन की भांति भारत इन प्रदेशों पर अपनी सत्ता जमाने की बात न करे, बल्कि प्राचीन परंपरा के अनुसार इन्हें स्वाधीन राज्य बनाने की बात उठाए जिससे ये भारत के मित्रा राज्य बन कर रह सकें।
भारत को मंगोलिया से अपने सदियों पुराने सांस्कृतिक व राजनीतिक संबंधों को भी पुनर्जीवित करना चाहिए। आभ्यंतर मंगोलिया चीन का प्रदेश कभी नहीं रहा है, वह मंगोलिया का ही हिस्सा होना चाहिए, इस बात को भी उचित स्थानों पर सामने लाना चाहिए। इससे चीन की आक्रामकता पर लगाम तो लगेगी ही, भारत के सांस्कृतिक मित्रों की संख्या भी बढ़ेगी जो कालांतर में भारत के राजनीतिक मित्रा भी साबित होंगे।

संदर्भः

1. चाइनीज बुद्धिज्म, रेव. जोसेफ एडकिन्स, 1893
2. एनशिएंट खोतान, औरील स्टीन, 1907
2. वृहत्तर भारत, शिव कुमार अस्थाना
3. वृहत्तर भारत, चंद्रगुप्त वेदालंकार, 1935
4. वैदिक संपत्ति, पंडित रघुनंदन शर्मा, 1932
5. कौटिलीय अर्थशास्त्रा, उदयवीर शास्त्राी
6. आचार्य रघुवीर, शशिबाला
7- http://www.ancient.eu/china/
8- www.wikipedia.com

हमारे परम्पराओ का विनाश

काफी पहले पंद्रहवीं शताब्दी में ही जब फ्रांसिस ज़ेवियर जैसे लोग भारत में आत्माओं की फसल काटने आये तभी उन्हें समझ आ गया था कि कई पर्तों वाले इस समाज को पूरी तरह कुचलना आसान नहीं है। जहाँ बाकी जगह उनकी लड़ाइयों में पूरा पूरा देश एक बार में अपना पुराना धर्म अपनी संस्कृति छोड़ कर उनके रंग में रंग जाता था, वैसा करना भारत पर मुमकिन नहीं हो रहा था। वर्ण व्यवस्था के कारण सब के सब एक बार में बदलते ही नहीं थे ! भारत से जाने के समय तक फ्रांसिस ज़ेवियर हत्याएं करवाता रहा, ब्राह्मणों को गालियाँ देता रहा, लेकिन कामयाब नहीं हुआ।

करीब तीन सौ साल में सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के बाद फिरंगियों के सामने कोई बड़ा विरोध नहीं बचा था। जो इक्का दुक्का सरदार बचे भी थे उनकी हत्या के बाद करीब तीस साल में फिरंगी पूरी तरह भारत पर काबिज़ हो चुके थे। अब उनकी जरूरत किसी विद्रोह को कुचलने की नहीं थी, वो चाहते थे कि भारत में अगला कोई विद्रोह शुरू ही ना हो सके। इस काम के लिए सबसे पहले तो सांस्कृतिक एकता के स्थलों यानि कि मंदिरों को शक्तिहीन किया गया। उनके आर्थिक स्रोत हथिया लिए गए जिस से वो लड़ने की सोच ना सकें।

जब तक विचारों को ना कुचला जाता तब तक इसाई मजहब और उसके जरिये सांस्कृतिक विरोध को दबाना मुमकिन नहीं था। इसी कड़ी में भारत में कई प्रचारकों और प्रशासनिक इकाइयों ने काम करना शुरू किया। उनका हथियार था साहित्य, जिस से सभ्यता के पुराने रूप को या तो विकृत किया जाना था या नए को पनपने से रोकना था। 1860 के बाद के दौर में अच्छे लेखकों और वक्ताओं को प्रश्रय देना शुरू किया गया। मुग़ल शासन का अंत होने पर मिर्जा ग़ालिब भी कुछ समय अंग्रेजों की सेवा में रहे थे।

सन 1890 के आस पास जब ब्रिटिश भारत में जम चुके थे तो भारत में उनका सिक्का जमाने वालों में से एक जॉन स्ट्राचे (Sir John Strachey) कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में भारत पर लेक्चर दे रहे थे। इन सारे लेक्चर्स को बाद में संकलित कर के एक किताब की शक्ल दी गई जिसका ना था “इंडिया”। ब्रिटिश राज के शुरुआती दौर में उसकी फ़ौज और उसके सिविल सर्विस की जब बात होती है तो ज्यादातर इसी किताब से उदाहरण दिए जाते हैं। हाल में जो एक झूठ प्रचारित करने की दोबारा कोशिश की गई थी कि “भारत अंग्रेजों से पहले कोई एक देश नहीं था” वो दरअसल इसी किताब से इसी जॉन स्ट्राचे का आईडिया था।

स्ट्राचे के हिसाब से यूरोप के देशों के आपसी मतभेदों की तुलना में भारत के “देशों” के आपसी मतभेद बहुत ज्यादा थे। उनके हिसाब से स्कॉटलैंड और स्पेन में कुछ चीज़ें मिलती जुलती हो सकती हैं, लेकिन बंगाल और पंजाब बिलकुल अलग अलग हैं। उनके हिसाब से भारत के अलग अलग हिस्सों में कभी कभी “राष्ट्रवाद” पनप सकता था, लेकिन वो सिर्फ एक छोटे से हिस्से के लिए होगा, मद्रास, पंजाब, बंगाल और उत्तर-पश्चिम के प्रान्त सब एक साथ एक राष्ट्रवाद की बात करें ऐसा नहीं हो सकता। जिस वक्त स्ट्राचे ये बातें कर रहे थे ठीक उसी समय भारत में एक फिरंगी ए.ओ.ह्यूम्स की सहायता से भारतीय कांग्रेस नाम का एक संगठन बना रहे थे।

सभी हिन्दुस्तानियों की एक साथ बात करने वाले एक डिबेट क्लब से फिर लाल, बाल, पाल के दौर तक आने और अंत में गाँधी के शामिल होने और उनके छोड़ने तक कांग्रेस का अपना ही इतिहास रहा है। लेकिन सन 1890 से लकर 1940 हो जाने के और पचास लम्बे सालों में भी भारत के शत्रुओं ने कभी भारत को एक राष्ट्र के तौर पर स्वीकार नहीं किया। सन 1930-31 के बीच के अपने भाषणों में विंस्टन चर्चिल (थोड़ी सी सभ्य भाषा में) करीब करीब वही दोहराता रहा जो पहले ही फ्रांसिस ज़ेवियर काफी पहले कह गया था।

“आवर ड्यूटी टू इंडिया” में अल्बर्ट हॉल के अपने भाषण में 1931 की शुरुआत में चर्चिल का कहना था कि वो भारत को ब्राह्मणों के शासन के लिए नहीं छोड़ सकता। ये एक भारतीय जनता के प्रति अपराधिक और क्रूर उपेक्षा होगी। उसके हिसाब से अंग्रेजों के जाते ही अंग्रेजों द्वारा स्थापित, न्यायिक, रेलवे, चकित्सा जैसे सारे तंत्र ख़त्म हो जाते और भारत वापस मध्ययुगीन बर्बरता के समय में पहुँच जाता। इस दौर के “नमक सत्याग्रह” के दौरान जब भारत को उपनिवेश बनाने की चर्चा चल रही थी तो चर्चिल इसे कपोल कल्पना और कपट भरी साजिश बता रहा था। सन 1947 के बाद भी ऐसी चर्चा बंद हो गई हो ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ। फ्रांसिस ज़ेवियर की परंपरा का निर्वाह करते हुए रोबर्ट डाह्ल भारतीय गणतंत्र के लम्बे समय टिकने को संदिग्ध बताता है। भारत में लोकतंत्र के दो दशक बीतने के बाद एक भारत के प्रति “सहानुभूति” रखने वाले ब्रिटिश पत्रकार डॉन टेलर का सवाल था कि क्या भारत एक रह पायेगा ? 524 मिलियन लोगों और पंद्रह प्रमुख भाषाओँ वाला देश टूटेगा कब इस इंतजार में 1970 के दशक का डॉन टेलर भी रहा।

अपने सांस्कृतिक नजरिये से आक्रमणकारियों को भारत हमेशा अप्राकृतिक लगता रहा।

आश्चर्य की बात थी कि सर सोच सकता है, हाथ सोच नहीं सकता फिर दोनों ही एक शरीर क्यों हैं ? दिमाग हाथ को अलग क्यों नहीं करता ? हाथ के किसी काम से पैर का कोई फायदा होता भी नहीं दिखता था। पैर को पूरे शरीर का वजन भी उठाना पड़ता, गंदगी में भी चलने के लिए पैर इस्तेमाल होता था, फिर भी वो हाथ को अपने से अलग करने की जिद नहीं मचा रहा था। जब स्वाद का सुख सारा मूंह को मिल रहा था तो फिर उसके खाए को पेट क्यों पचाए ? एक दूसरे के लिए, मुफ्त की मेहनत करने वाले शरीर के हिस्से, एक साथ क्यों हैं, ये आक्रमणकारी सभ्यता को समझ में ही नहीं आ पा रहा था। ये सवाल अब भी बाकी है।

ऐसा ही एक बड़ा सा सवाल है कि राष्ट्र पर, लम्बे समय के वैचारिक हमले पर ये लेख लिखा कैसे गया ? इस दूसरे साधारण से सवाल का जवाब हम दे सकते हैं। हमने रामचंद्र गुहा की लिखी इंडिया आफ्टर गांधी से कुछ जानकारी उठाई है, (करीब करीब हुबहू नक़ल है!) उसमें अपनी धूर्तता मिलाई है और सामने रख दिया है। आम तौर पर पूछने से रामचंद्र गुहा कोई राष्ट्रवादी नहीं माने जायेंगे। आम भारतीय जो सोचता है, उस हिसाब से वो कुछ भी बोल या लिख नहीं रहे होते।

तो सवाल है उनके ही लिखे को ये भगवा कैसे रंग दिया ? आसान है। भारत में हमेशा से नीर-क्षीर विवेक की बात की जाती है। भावना में बहे जाते मूर्ख लोग उसे भक्ति से जोड़ते हैं। हमने बिलकुल वही उठा कर गुहा के लिखे में से तथ्य निकाले, और फिर उन्हें उनके निकाले हुए अर्थ को हटा कर अपने हिसाब के अर्थ के साथ एक जगह कर डाला है। ये काम बिलकुल आसान है और ये किसी भी किताब पर किया जा सकता है। क्या पढ़ना जरूरी है, क्या सच है, और किसे पढ़े बिना छोड़ देना चाहिए, कौन सा इंटरप्रिटेशन है वो तय किया जा सकता है।

सालों पे गौर कीजिये तो दिखेगा की 1890 से 1947 सिर्फ पांच दशक ही हैं। पचास साल भी इतिहास होता है। अपना इतिहास खुद लिखना सीखिए। तथ्य आपको अख़बारों में मिलते हैं, मोबाइल के कैमरे में ले सकते हैं। कोई और आकर नहीं करने वाला है, ये आपका काम है। आपका इतिहास कोई और आकर क्यों लिखेगा भला ? कामचोरी छोड़कर खुद को कष्ट दीजिये। सावरकर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर लिख कर जा चुके। इस दौर का आपको खुद ही लिखना होगा। आह वाह करते सर हिलाने के बदले हाथ पैर हिलाइए।

----
आनन्द कुमार
धन्यवाद}