Cross collum

Monday, February 27, 2017

अनमोल संदेश"

 *"अनमोल संदेश"* 👌🏿

दुनिया की ताकतवर चीज है *"लोहा"*🔩
       जो सबको काट डालता है ....

लोहे से ताकतवर है *"आग"*🔥
        जो लोहे को पिघला देती है....

आग से ताकतवर है *"पानी"*🌧
        जो आग को बुझा देता है....

और पानी से ताकतवर है *"इंसान"*👦
        जो उसे पी जाता है....

इंसान से भी ताकतवर है *"मौत"*😭
         जो उसे खा जाती है....

और मौत से भी ताकतवर है *"दुआ"* 👏🏿
      जो मौत को भी टाल सकती है...!

 🙏🏿बहुत ही सुन्दर वर्णन है🙏🏿

👌🏿मस्तक को थोड़ा झुकाकर देखिए
....अभिमान मर जाएगा

👌🏿आँखें को थोड़ा भिगा कर देखिए
.....पत्थर दिल पिघल जाएगा

👌🏿दांतों को आराम देकर देखिए
.........स्वास्थ्य सुधर जाएगा

👌🏿जिव्हा पर विराम लगा कर देखिए
.....क्लेश का कारवाँ गुज़र जाएगा

👌🏿इच्छाओं को थोड़ा घटाकर देखिए
......खुशियों का संसार नज़र आएगा

👌🏿पूरी जिंदगी हम इसी बात में गुजार देते हैं कि "चार लोग क्या कहेंगे",

........और अंत में चार लोग बस यही कहते हैं कि "राम नाम सत्य है"...

                  👁🙏🏿

*"उड़ा भी दो सारी रंजिशें इन हवाओं में*
                        *यारो"*

  *"छोटी सी जिंदगी है नफ़रत कब*
                   *तक करोगे"*

*"घमंड न करना जिन्दगी मे तकदीर बदलती*
                          *रहती है"*

*"शीशा वही रहता है  बस तस्वीर बदलती रहती है"*

      🙏🏿🙏🏿🙏🏿🙏🏿🙏🏿
*1. जिदंगी मे कभी भी किसी को*
      *बेकार मत समझना,क्योक़ि*
        *बंद पडी घडी भी दिन में*
          *दो बार सही समय बताती है।*zindagi......✍🏻
2. किसी की बुराई तलाश करने*
     *वाले इंसान की मिसाल उस*
       *मक्खी की तरह है जो सारे*
        *खूबसूरत जिस्म को छोडकर*
          *केवल जख्म पर ही बैठती है।*zindagi.....✍🏻
*5
..जल्द मिलने वाली चीजे*
      *ज्यादा दिन तक नही चलती,*
        *और जो चीजे ज्यादा*
           *दिन तक चलती है*
            *वो जल्दी नही मिलती।*
zindagi........✍🏻

*6. बुरे दिनो का एक*
      *अच्छा फायदा*
         *अच्छे-अच्छे दोस्त*
            *परखे जाते है ।*
zindagi.......✍🏻

एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं.... वैज्ञानिक कारण हैं

एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं....
वैज्ञानिक कारण हैं..

एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक
बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम
देख रहा था ... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़
जींस".. मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी
रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड
बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और
एल्बोनिज्म होने की १००% चांस होती है ..
फिर मुझे
बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये
दिखाया गया की आखिर हिन्दूधर्म में
हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में
कैसे
लिखा गया है ? हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते
है
और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर
सकते
ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. उस वैज्ञानिक ने
कहा की आज पूरे विश्व
को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का
एकमात्र
ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !
हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क:

1- कान छिदवाने की परम्परा:

भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।

2-: माथे पर कुमकुम/तिलक

महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता

3- : जमीन पर बैठकर भोजन

भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है।
वैज्ञानिक तर्क- पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये।

4- : हाथ जोड़कर नमस्ते करना

जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें। दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।

5-: भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से

जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है।
वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।

6-: पीपल की पूजा
तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता ह

7-: दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना

दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें।
वैज्ञानिक तर्क- जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।

8-सूर्य नमस्कार
हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है।

9-सिर पर चोटी

हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।

10-व्रत रखना

कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते।

11-चरण स्पर्श करना

हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें।
वैज्ञानिक तर्क- मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।

12-क्यों लगाया जाता है सिंदूर

शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं।
वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है। यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।

13- तुलसी के पेड़ की पूजा
तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है। सुख शांति बनी रहती है।
वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।

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Sunday, February 26, 2017

चन्द्रशेखर आजाद बलिदान दिवस - 27 फरवरी

🚩चन्द्रशेखर आजाद बलिदान दिवस - 27 फरवरी

🚩#चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को एक आदिवासी ग्राम #भाबरा ( म.प्र.) में हुआ था।
काकोरी ट्रेन डकैती और साण्डर्स की हत्या में सम्मिलित निर्भीक महान #देशभक्त व क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का नाम #भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अहम स्थान रखता है।

🚩ऐतिहासिक दृष्टि से वे भारतीय #स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता #सेनानी थे। #वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे #क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे।

🚩सन् 1922 में #गाँधीजी द्वारा असहयोग #आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को #काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् 1927 में 'बिस्मिल' के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में #लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।


🚩चंद्रशेखर आजाद का आत्म-बलिदान!!

🚩साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- #भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ 3 ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। 11 फरवरी 1931 को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आजाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। #विद्यार्थी ने उन्हें इलाहाबाद जाकर जवाहर लाल नेहरू से मिलने को कहा। #चंद्रशेखर आजाद जब नेहरू से मिलने आनंद भवन गए तो उन्होंने चंद्रशेखर की बात सुनने से भी इन्कार कर दिया। गुस्से में वहाँ से निकलकर चंद्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ एल्फ्रेड पार्क चले गए। #किसी मुखबिर ने पुलिस को यह सूचना दी कि चन्द्रशेखर आजाद  'अल्फ़्रेड पार्क' में अपने एक साथी के साथ बैठे हुए हैं। वह 27 फरवरी 1931 का दिन था। चन्द्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे। मुखबिर की सूचना पर पुलिस अधीक्षक 'नाटबाबर' ने आजाद को इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में घेर लिया। "तुम कौन हो" कहने के साथ ही उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना नाटबाबर ने अपनी गोली आजाद पर छोड़ दी। नाटबाबर की #गोली #चन्द्रशेखर आजाद की जाँघ में जा लगी। आजाद ने घिसटकर एक जामुन के वृक्ष की ओट लेकर अपनी गोली दूसरे वृक्ष की ओट में छिपे हुए नाटबाबर के ऊपर दाग दी। आजाद का निशाना सही लगा और उनकी गोली ने नाटबाबर की कलाई तोड़ दी। एक घनी झाड़ी के पीछे सी.आई.डी. इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह छिपा हुआ था, उसने स्वयं को सुरक्षित समझकर आजाद को एक गाली दे दी। गाली को सुनकर आजाद को क्रोध आया। जिस दिशा से गाली की आवाज आई थी, उस दिशा में आजाद ने अपनी गोली छोड़ दी। निशाना इतना सही लगा कि आजाद की गोली ने विश्वेश्वरसिंह का जबड़ा तोड़ दिया।


🚩शहादत!!

🚩बहुत देर तक #आजाद ने जमकर अकेले ही मुकाबला किया। उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज को पहले ही भगा दिया था। आखिर पुलिस की कई #गोलियाँ आजाद के शरीर में समा गई थी । उनके माउजर में केवल एक आखिरी गोली बची थी तो उन्हें पुलिस का सामना करना मुश्किल लगा। चंद्रशेखर आजाद ने  यह प्रण लिया हुआ था कि वह कभी भी जीवित पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। इसी प्रण को निभाते हुए एल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को उन्होंने वह बची हुई गोली स्वयं पर दाग के #आत्म-बलिदान कर लिया।

🚩 पुलिस के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर गोलियाँ चलाकर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही चंद्रशेखर की मृत्यु की पुष्टि की गई।


🚩#पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आजाद का #अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद के बलिदान की खबर #जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड़ पड़ा । जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। #वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयी। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते #सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सड़को पर आ गये।

🚩आजाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। #अगले दिन आजाद की #अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक #जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि इलाहाबाद की मुख्य सड़को पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा #हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड़ पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस के बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आजाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व 6 फरवरी 1927 को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आजाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे।

🚩व्यक्तिगत जीवन!!

🚩चंद्रशेखर आजाद को वेष बदलना बहुत अच्छी तरह आता था।#वह रूसी क्रान्तिकारी की कहानियों से बहुत प्रभावित थे। उनके पास हिन्दी में लेनिन की लिखी पुस्तक भी थी। किंतु उनको स्वयं पढ़ने से अधिक दूसरों को पढ़कर सुनाने में अधिक आनंद आता था।चंद्रशेखर आजाद सदैव सत्य बोलते थे।#चंद्रशेखर आजाद ने साहस की नई कहानी लिखी। उनके बलिदान से स्वतंत्रता के लिए आंदोलन तेज हो गया। हजारों युवक स्‍वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।आजाद के शहीद होने के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्त सन् 1947 को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा हुआ।

🚩बाद में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जिस पार्क में उनका निधन हुआ था #उसका नाम परिवर्तित कर चंद्रशेखर आजाद पार्क और मध्य प्रदेश के जिस गांव में वह रहे थे उसका धिमारपुरा नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया।

🚩यह #देश का दुर्भाग्य है कि आज हमें चॉक्लेट डे, वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे जैसे विदेशी दिवस तो याद रहते हैं लेकिन जिन #देशभक्तों ने अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरो से बंधे देश को छुड़ाने के लिए बलिदान दिया वो किसी को याद नही ।

🚩जरा विचार कीजिये कि देश को आजादी दिलाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनेवाले इन #वीर शहीदों के सपने को हम कहाँ तक साकार कर सके हैं..???

🚩हमने उनके बलिदानों का कितना आदर किया है...???

🚩वास्तव में, हमने उन अमर शहीदों के बलिदानों को कोई सम्मान ही नहीं दिया है । तभी तो स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी हमारा देश पश्चिमी संस्कृति की गुलामी में जकड़ा हुआ है।

🚩इन महापुरुषों की सच्ची #पुण्यतिथि तो तभी मनाई जाएगी, जब प्रत्येक #भारतवासी उनके जीवन को अपना आदर्श बनायेंगे, उनके सपनों को साकार करेंगे तथा जैसे भारत का निर्माण वे महापुरुष करना चाहते थे, वैसा ही हम करके दिखायें ।
यही उनका #बलिदान दिवस मनाना है ।


   🚩🇮🇳🚩 आज़ाद भारत🚩🇮🇳🚩

मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ?

मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ?

 इस छोटे से प्रश्न का सही समाधान न कर सकने के कारण ‘मैं’ को कितनी विषम विडम्बनाओं में उलझना पड़ता है और विभीषिकाओं में संत्रस्त होना पड़ता है, यदि यह समय रहते समझा जा सके तो हम वह न रहें, जो आज हैं। वह न सोचें जो आज सोचते हैं। वह न करें जो आज करते हैं।
हम कितने बुद्धिमान हैं कि धरती आकाश का चप्पा-चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया। इस बुद्धिमत्ता की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम और अपने आपके बारे में जितनी उपेक्षा बरती गई उसकी जितनी निन्दा की जाय वह भी कम ही है।
जिस काया को शरीर समझा जाता है क्या यही मैं हूँ? क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत, आतप आदि से पग-पग पर व्याकुल होने वाला अपनी सहायता के लिए बजाज दर्जी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही मैं हूँ? दूसरों की सहायता के बिना जिसके लिए जीवन धारण कर सकना कठिन हो-जिसकी सारी हँसी-खुशी और प्रगति दूसरों की कृपा पर निर्भर हो, क्या वही असहाय, असमर्थ, मैं हूँ? मेरी आत्म निर्भरता क्या कुछ भी नहीं है? यदि शरीर ही मैं हूँ तो निस्सन्देह अपने को सर्वथा पराश्रित और दीन, दुर्बल ही माना जाना चाहिए।
परसों पैदा हुआ, खेल-कूद, पढ़ने-लिखने में बचपन चला गया। कल जवानी आई थी। नशीले उन्माद की तरह आँखों में, दिमाग में छाई रही। चञ्चलता और अतृप्ति से बेचैन बनाये रही। आज ढलती उम्र आ गई। शरीर ढलने गलने लगा। इन्द्रियाँ जवाब देने लगी। सत्ता, बेटे, पोतों के हाथ चली गई। लगता है एक उपेक्षित और निरर्थक जैसी अपनी स्थिति है। अगली कल यही काया जरा जीर्ण होने वाली है। आँखों में मोतियाबिन्द, कमर-घुटनों में दर्द, खाँसी, अनिद्रा जैसी व्याधियाँ, घायल गधे पर उड़ने वाले कौओं की तरह आक्रमण की तैयारी कर रही हैं। अपाहिज और अपंग की तरह कटने वाली जिन्दगी कितनी भारी पड़ेगी। यह सोचने को जी नहीं चाहता वह डरावना और घिनौना दृश्य एक क्षण के लिए भी आँखों के सामने आ खड़ा होता है रोम-रोम काँपने लगता है? पर उस अवश्यंभावी भवितव्यता से बचा जाना सम्भव नहीं? जीवित रहना है तो इसी दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में पिसना पड़ेगा। बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। क्या यही मैं हूँ? क्या इसी निरर्थक विडम्बना के कोल्हू के चक्कर काटने के लिए ही ‘मैं’ जन्मा? क्या जीवन का यही स्वरूप है? मेरा अस्तित्व क्या इतना ही तुच्छ है?
आत्म चिन्तन कहेगा-नहीं-नहीं-नहीं। आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता। वह इतना अपंग और असमर्थ-पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़-पौधों जैसा-मक्खी, मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर-मात्र जीने के लिए मैं जन्मा। सो भी जीना ऐसा जिसमें न चैन, न खुशी, न शान्ति, न आनन्द, न सन्तोष। यदि आत्मा-सचमुच परमात्मा का अंश है तो वह ऐसी हेय स्थिति में पड़ा रहने वाला हो ही नहीं सकता। या तो मैं हूँ ही नहीं। नास्तिकों के प्रतिपादन के अनुसार या तो पाँच तत्वों के प्रवाह में एक ‘भंवर जैसी बबूले जैसी क्षणिक काया लेकर उपज पड़ा हूँ और अगले ही क्षण अभाव के विस्मृति गर्त में समा जाने वाला हूँ। या फिर कुछ हूँ तो इतना तुच्छ और अपंग हूँ जिसमें उल्लास और सन्तोष जैसा-गर्व और गौरव जैसा-कोई तत्व नहीं है। यदि मैं शरीर हूँ तो-हेय हूँ। अपने लिए और इस धरती के लिए भारभूत। पवित्र अन्न को खाकर घृणित मल में परिवर्तन करते रहने वाले-कोटि-कोटि छिद्रों वाले इस कलेवर से दुर्गन्ध और मलीनता निसृत करते रहने वाला-अस्पर्श्य-घिनौना हूँ ‘मैं’। यदि शरीर हूँ तो इससे अधिक मेरी सत्ता होगी भी क्या?
यदि शरीर हूँ तो उसका अन्त क्या है? लक्ष्य क्या है? परिणाम क्या है? मृत्यु-मृत्यु-मृत्यु। कल नहीं तो परसों वह दिन तेजी से आँधी तूफान की तरह उड़ता उमड़ता चला आ रहा है, जिसमें आज की मेरी यह सुन्दर सी काया-जिसे मैंने अत्यधिक प्यार किया-प्यार क्या जिसमें पूरी तरह समर्पित हो गया-घुल गया। अब वह मुझसे विलग हो जायगी। विलग ही नहीं अस्तित्व भी गँवा बैठेगी। काया में घुला हुआ ‘मैं’-मौत के एक ही थपेड़े में कितना कुरूप-कितना विकृत-कितना निरर्थक-कितना घृणित हो जायगा कि उसे प्रिय परिजन तक-कुछ समय और उसी घर में रहने देने के लिए सहमत न होंगे जिसे मैंने ही कितने अरमानों के साथ-कितने कष्ट सहकर बनाया था। क्या यही मेरे परिजन हैं? जिन्हें लाड़-चाव से पाला था। अब ये मेरी इस काया को-घर में से हटा देने के लिए-उसका अस्तित्व सदा के लिए मिटा देने के लिए क्यों आतुर हैं? कल वाला ही तो मैं हूँ।
मौत के जरा से आघात से मेरा स्वरूप यह कैसा हो गया। अब तो मेरी मृत काया-हिलती डुलती भी नहीं-बोलती, सोचती भी नहीं? अब तो उसके कुछ अरमान भी नहीं है। हाय, यह कैसी मलीन, दयनीय, घिनौनी बनी जमीन पर लुढ़क रही है। अब तो यह पलंग बिस्तर पर सोने तक का अधिकार खो बैठी। कुशाओं बान से ढकी-गोबर से लिपी गीली भूमि पर यह पड़ी है। अब कोई चिकित्सक भी इसका इलाज करने को तैयार नहीं। कोई बेटा, पोता गोदी में नहीं आता। पत्नी छाती तो कूटती है पर साथ सोने से डरती है। मेरा पैसा-मेरा वैभव-मेरा सम्मान हाय रे! सब छिन गया-हार से मैं बुरी तरह लुट गया। मेरे कहलाने वाले लोग ही-मेरा सब कुछ छीन कर मुझे इस दुर्गति के साथ घर से निकाल रहें हैं। क्या यही अपनी दुर्दशा कराने के लिए मैं जन्मा? यही है क्या मेरा अन्त-यही था मेरा लक्ष्य, यही है क्या मेरी उपलब्धि। जिसके लिए कितने पुरुषार्थ किये थे-क्या उसका निष्कर्ष यही है? यही हूँ मैं-जो मुर्दा बना पड़ा हूँ-और लकड़ियों की चिता में जल कर अगले ही क्षण अपना अस्तित्व सदा के लिए खोने जा रहा हूँ।
लो अब पहुँच गया मैं चिता पर। लो, मेरा कोमल मखमल जैसा शरीर-जिसे सुन्दर, सुसज्जित, सुगन्धित बनाने के लिए घण्टों शृंगार किया करता था, अब आ गया अपनी असली जगह पर। लकड़ियों का ढेर-उसके बीच दबाया हुआ मैं। लो यह लगी आग। लो, अब मैं जला। अरे मुझे जलाओ मत। इन खूबसूरत, हड्डियों में मैं अभी और रहना चाहता हूँ, मेरे अरमान बहुत हैं, इच्छायें तो हजार में से एक भी पूरी नहीं हुई। मुझे उपार्जित सम्पदाओं से अलग मत करो, प्रियजनों का वियोग मुझे सहन नहीं। इस काया को जरा सा कष्ट होता था तो चिकित्सा, उपचार मैं बहुत कुछ करता था। इस काया को इस निर्दयतापूर्वक मत जलाओ। अरे स्वजन और मित्र कहलाने वाले लोगों-इस अत्याचार से मुझे बचाओ। अपनी आँखों के आगे ही मुझे इस तरह जलाया जाना तुम देखते रहोगे। मेरी कुछ भी सहायता न करोगे। अरे यह क्या-बचाना तो दूर उलटे तुम्हीं मुझमें आग लगा रहे हो। नहीं-नहीं, मुझे जलाओ मत-मुझे मिटाओ मत। कल तक मैं तुम्हारा था-तुम मेरे थे-आज ही क्या हो गया जो तुम सबने इस तरह मुझे त्याग दिया? इतने निष्ठुर तुम सब क्यों बन गये? मैं और मेरा संसार क्या इस चिता की आग में ही समाप्त हुआ? सपनों का अन्त-अरमानों का विनाश-हाय री चिता-हत्यारी चिता-तू मुझे छोड़। मरने का जलने का मेरा जरा भी जी नहीं है। अग्नि देवता, तुम तो दयालु थे। सारी निर्दयता मेरे ही ऊपर उड़ेलने के लिए क्यों तुल गये?
लो, सचमुच मर गया। मेरी काया का अन्त हो ही गया। स्मृतियाँ भी धुँधली हो चलीं। कुछ दिन चित्र फोटो जिये। श्राद्ध तर्पण का सिलसिला कुछ दिन चला। दो तीन पीढ़ी तक बेटे पोतों को नाम याद रहे। पचास वर्ष भी पूरे न हो पाये कि सब जगह से नाम निशान मिट गया। अब किसी को बहुत कहा जाय कि इस दुनिया में ‘मैं’ पैदा हुआ था। बड़े अरमानों के साथ जिया था, जीवन को बहुत सँजोया, सँभाला था, उसके लिए बहुत कुछ जिया था, पर वह सारी दौड़, धूप ऐसे ही निरर्थक चली गई। मेरी काया तक ने मेरा साथ न दिया-जिसमें मैं पूरी तरह घुल गया था। जिस काया के सुख को अपना सुख और जिसके दुःख को अपना दुःख समझा। सच तो यह है कि मैं ही काया था-और काया ही मैं था हम दोनों की हस्ती एक हो गई थी; पर यह क्या अचम्भा हुआ, मैं अभी भी मौजूद हूँ।
वायुभूत हुआ आकाश में मैं अभी भी भ्रमण कर रहा हूँ। पर वह मेरी अभिन्न सहचरी लगने वाली काया न जाने कहाँ चली गई। अब वह मुझे कभी नहीं मिलेगी क्या? उसके बिना मैं रहना नहीं चाहता था, रह नहीं सकता था, पर हाय री निर्दय नियति। तूने यह क्या कर डाला। काया चली गई। माया चली गई। मैं अकेला ही वायुभूत बना भ्रमण कर रहा हूँ। एकाकी-नितान्त एकाकी। जब काया ने ही साथ छोड़ दिया तो उसके साथ जुड़े हुए परिवारी भी क्या याद रखते-क्यों याद रखते? याद रखे भी रहे हों तो अब उससे अपना बनना भी क्या है?
मैं काया हूँ। यह जन्म के दिन से लेकर-मौत के दिन तक मैं मानता रहा। यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ थी कि कथा पुराणों की चर्चा में आत्मा काया की पृथकता की चर्चा आये दिन सुनते रहने पर भी गले से नीचे नहीं उतरती थी। शरीर ही तो मैं हूँ-उससे अलग मेरी सत्ता भला किस प्रकार हो सकती है? शरीर के सुख-दुख के अतिरिक्त मेरा सुख-दुख अलग क्योंकर होगा? शरीर के लाभ और मेरे लाभ में अन्तर कैसे माना जाय? यह बातें न तो समझ में आती थीं और न उन पर विश्वास जमता था। परोक्ष पर प्रत्यक्ष कैसे झुठलाया जाय? काया प्रत्यक्ष है-आत्मा अलग है, उसके स्वार्थ, सुख-दुःख अलग हैं, यह बातें कहने सुनने भर की ही हो सकती हैं। सो रामायण गीता वाले प्रवचनों की हाँ में हाँ तो मिलाता रहा पर उसे वास्तविकता के रूप में कभी स्वीकार न किया।
पर आज देखता हूँ कि वह सचाई थी जो समझ में नहीं आई और वह झुठाई थी जो सिर पर हर घड़ी सवार रही। शरीर ही मैं हूँ। यही मान्यता-शराब की खुमारी की तरह नस-नस में भरी रही। बोतल पर बोतल छानता रहा तो वह खुमारी उतरती भी कैसे? पर आज आकाश में उड़ता हुआ वायुभूत-एकाकी-’मैं’ सोचता हूँ। झूठा जीवन जिया गया। झूठ के लिए जिया गया, झूठे बनकर जिया गया। सचाई आँखों से ओझल ही बनी रही। मैं एकाकी हूँ, शरीर से भिन्न हूँ। आत्मा हूँ। यह सुनता जरूर रहा पर मानने का अवसर ही नहीं आया। यदि उस तथ्य को जाना ही नहीं-माना भी होता तो वह अलभ्य अवसर जो हाथ से चला गया, इस बुरी तरह न जाता। जीवन जिस मूर्खता पूर्ण रीति-नीति से जिया गया वैसा न जिया जाता।
शरीर मेरा है-मेरे लिए है, मैं शरीर नहीं हूँ। यह छोटी-सी सच्चाई यदि समय रहते समझ में आ गई होती तो कितना अच्छा होता। तब मनुष्य जीवन जैसे सुर-दुर्लभ सौभाग्य का लाभ लिया गया होता, पर अब क्या हो सकता है। अब तो पश्चाताप ही शेष है। भूल भरी मूर्खता के लिए न जाने कितने लम्बे समय तक रुदन करना पड़ेगा?          
 आदेश....... 💀🚩

*पृथ्वी का अमृत.. तिल का तेल...*

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*पृथ्वी का अमृत.. तिल का तेल...*

( 5 मिनिट का समय निकाल कर पोस्ट को जरूर पढ़े )

यदि इस पृथ्वी पर उपलब्ध सर्वोत्तम खाद्य पदार्थों की बात की जाए तो तिल के तेल का नाम अवश्य आएगा और यही सर्वोत्तम पदार्थ बाजार में उपलब्ध नहीं है. और ना ही आने वाली पीढ़ियों को इसके गुण पता हैं. क्योंकि नई पीढ़ी तो टी वी के इश्तिहार देख कर ही सारा सामान ख़रीदती है.
और तिल के तेल का प्रचार कंपनियाँ इसलिए नहीं करती क्योंकि इसके गुण जान लेने के बाद आप उन द्वारा बेचा जाने वाला तरल चिकना पदार्थ जिसे वह तेल कहते हैं लेना बंद कर देंगे.
तिल के तेल में इतनी ताकत होती है कि यह पत्थर को भी चीर देता है. प्रयोग करके देखें.... आप पर्वत का पत्थर लिजिए और उसमे कटोरी के जैसा खडडा बना लिजिए, उसमे पानी, दुध, धी या तेजाब संसार में कोई सा भी कैमिकल, ऐसिड डाल दीजिए, पत्थर में वैसा की वैसा ही रहेगा, कही नहीं जायेगा... लेकिन... अगर आप ने उस कटोरी नुमा पत्थर में तिल का तेल डाल दीजिए, उस खड्डे में भर दिजिये.. 2 दिन बाद आप देखेंगे कि, तिल का तेल... पत्थर के अन्दर भी प्रवेश करके, पत्थर के नीचे आ जायेगा. यह होती है तेल की ताकत, इस तेल की मालिश करने से हड्डियों को पार करता हुआ, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है. तिल के तेल के अन्दर फास्फोरस होता है जो कि हड्डियों की मजबूती का अहम भूमिका अदा करता है.
और तिल का तेल ऐसी वस्तु है जो अगर कोई भी भारतीय चाहे तो थोड़ी सी मेहनत के बाद आसानी से प्राप्त कर सकता है. तब उसे किसी भी कंपनी का तेल खरीदने की आवश्यकता ही नही होगी. तिल खरीद लीजिए और किसी भी तेल निकालने वाले से उनका तेल निकलवा लीजिए. लेकिन सावधान तिल का तेल सिर्फ कच्ची घाणी (लकडी की बनी हुई) का ही प्रयोग करना चाहिए.
तैल शब्द की व्युत्पत्ति तिल शब्द से ही हुई है। जो तिल से निकलता वह है तैल। अर्थात तेल का असली अर्थ ही है "तिल का तेल".
तिल के तेल का सबसे बड़ा गुण यह है की यह शरीर के लिए आयुषधि का काम करता है.. चाहे आपको कोई भी रोग हो यह उससे लड़ने की क्षमता शरीर में विकसित करना आरंभ कर देता है. यह गुण इस पृथ्वी के अन्य किसी खाद्य पदार्थ में नहीं पाया जाता.
सौ ग्राम सफेद तिल 1000 मिलीग्राम कैल्शियम प्राप्त होता हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है।
काले और लाल तिल में लौह तत्वों की भरपूर मात्रा होती है जो रक्तअल्पता के इलाज़ में कारगर साबित होती है।
तिल में उपस्थित लेसिथिन नामक रसायन कोलेस्ट्रोल के बहाव को रक्त नलिकाओं में बनाए रखने में मददगार होता है।
तिल के तेल में प्राकृतिक रूप में उपस्थित सिस्मोल एक ऐसा एंटी-ऑक्सीडेंट है जो इसे ऊँचे तापमान पर भी बहुत जल्दी खराब नहीं होने देता। आयुर्वेद चरक संहित में इसे पकाने के लिए सबसे अच्छा तेल माना गया है।
तिल में विटामिन  सी छोड़कर वे सभी आवश्यक पौष्टिक पदार्थ होते हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। तिल विटामिन बी और आवश्यक फैटी एसिड्स से भरपूर है।
इसमें मीथोनाइन और ट्रायप्टोफन नामक दो बहुत महत्त्वपूर्ण एमिनो एसिड्स होते हैं जो चना, मूँगफली, राजमा, चौला और सोयाबीन जैसे अधिकांश शाकाहारी खाद्य पदार्थों में नहीं होते। ट्रायोप्टोफन को शांति प्रदान करने वाला तत्व भी कहा जाता है जो गहरी नींद लाने में सक्षम है। यही त्वचा और बालों को भी स्वस्थ रखता है। मीथोनाइन लीवर को दुरुस्त रखता है और कॉलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखता है।
तिलबीज स्वास्थ्यवर्द्धक वसा का बड़ा स्त्रोत है जो चयापचय को बढ़ाता है।
यह कब्ज भी नहीं होने देता।
तिलबीजों में उपस्थित पौष्टिक तत्व,जैसे-कैल्शियम और आयरन त्वचा को कांतिमय बनाए रखते हैं।
तिल में न्यूनतम सैचुरेटेड फैट होते हैं इसलिए इससे बने खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद कर सकता है।
सीधा अर्थ यह है की यदि आप नियमित रूप से स्वयं द्वारा निकलवाए हुए शुद्ध तिल के तेल का सेवन करते हैं तो आप के बीमार होने की संभावना ही ना के बराबर रह जाएगी. जब शरीर बीमार ही नही होगा तो उपचार की भी आवश्यकता नही होगी. यही तो आयुर्वेद है.. आयुर्वेद का मूल सीधांत यही है की उचित आहार विहार से ही शरीर को स्वस्थ रखिए ताकि शरीर को आयुषधि की आवश्यकता ही ना पड़े.
एक बात का ध्यान अवश्य रखिएगा की बाजार में कुछ लोग तिल के तेल के नाम पर अन्य कोई तेल बेच रहे हैं.. जिसकी पहचान करना मुश्किल होगा. ऐसे में अपने सामने निकाले हुए तेल का ही भरोसा करें. यह काम थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है किंतु पहली बार की मेहनत के प्रयास स्वरूप यह शुद्ध तेल आपकी पहुँच में हो जाएगा. जब चाहें जाएँ और तेल निकलवा कर ले आएँ.

तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड (mono-unsaturated fatty acid) होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. (HDL) को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य (atherosclerosis) के संभावना को कम करता है।
कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता है-
तिल में सेसमीन (sesamin) नाम का एन्टीऑक्सिडेंट (antioxidant) होता है जो कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ है और उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है। यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।
तनाव को कम करता है-
इसमें नियासिन (niacin) नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।
हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है-
तिल में ज़रूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है।
शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है-
तिल में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिल में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है।
गर्भवती महिला और भ्रूण (foetus) को स्वस्थ रखने में मदद करता है-
तिल में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।
शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता है-
अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।
अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-
तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।
मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है-
डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।
दूध के तुलना में तिल में तीन गुना कैल्शियम रहता है। इसमें कैल्शियम, विटामिन बी और ई, आयरन और ज़िंक, प्रोटीन की भरपूर मात्रा रहती है और कोलेस्टरोल बिल्कुल नहीं रहता है। तिल का तेल ऐसा तेल है, जो सालों तक खराब नहीं होता है, यहाँ तक कि गर्मी के दिनों में भी वैसा की वैसा ही रहता है.
तिल का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। इससे अगर आप महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो ठंड का एहसास नहीं होता। इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।
 तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।
जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए।इससे मर्दानगी की ताकत मिलती है!
हमारे धर्म में भी तिल के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है, जन्म, मरण, परण, यज्ञ, जप, तप, पित्र, पूजन आदि में तिल और तिल का तेल के बिना संभव नहीं है अतः इस पृथ्वी के अमृत को अपनायें और जीवन निरोग बनायें।
...........................तिल सरसों मूंगफली नारियल बादाम आदि का . लकडी की बनी हुई, कच्ची घाणी से निकाला हुआ गारंटीड 💯 %शुद्ध तेल यहां उपलब्ध है !

एल एस नगर... नया खेडा.. बियानी गर्ल्स कॉलेज के पास... विधाधर नगर..
जयपुर 🚩
97823 41154

  संपर्क सुत्र -
*राजकुमार जैन ( हनुमानगढ़ )*
*99282 97065*

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Friday, February 24, 2017

*ऋषि चिंतन*

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🌴//२५फरवरी २०१७ शनिवार //🌴
🌱फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी 🌱
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🙏🙏🙏
                 ‼ *प्रणाम*‼
            ❗ *ऋषि चिंतन*❗
*हम उत्कृष्ट बनेंगे, दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे*

👉  *गई गुजरी स्थिति में पड़े हुए लोग जब ऊँची सफलताओं के सपने देखते हैं* तो स्थिति और *लक्ष्य के बीच भारी अन्तर होने से* लगता है कि इतनी चौड़ी खाई पाटी न जा सकेगी, किन्तु अनुभव से यह देखा गया है कि *कठिनाई उतनी बड़ी थी नहीं जितनी कि समझी* गई थी। *धीमी किन्तु अनवरत चाल से चलने वाली चींटी भी पहाड़ों के पार* चली जाती है, फिर *धैर्य, साहस, लगन, मनोयोग और विश्वास के साथ कठोर पुरुषार्थ* में संलग्न व्यक्ति को प्रगति की मंजिलें पार करते चलने से कौन रोक सकेगा?

👉  *ज्ञानयोग की साधना यह है कि मस्तिष्कीय गतिविधियों पर-विचारधाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय।* मस्तिष्क को चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो, चाहे जिस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। *मात्र औचित्य ही चिंतन का आधार हो सकता है, यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।*

👉  *असत्य से किसी प्रकार के लाभ, सुख अथवा संतोष की आशा करना मृगतृष्णा में भटकने के समान है। असत्य से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र किसी का भी हित नहीं होता।* असत्य आत्मिक और भौतिक दोनों प्रकार का दोष है। इससे आत्मा का पतन होता है और समाज में विघटन। असत्यवाद के स्वभाव को बलपूर्वक त्याग देने में ही कल्याण है। *सत्य का आश्रय ईश्वर का आश्रय है। इसको स्वीकार कर चलने वाला व्यक्ति जीवन में न तो कभी अशान्त होता है और न अपमानित।*

     🌹 *पं.श्रीराम शर्मा आचार्य*🌹
   🙏🙏🙏 *सुप्रभात*🙏🙏🙏

#सोलंकी_चालुक्या_राजपूत

#सोलंकी_चालुक्या_राजपूत
जय श्री राम मनीषा सिंह की कलम से भारत के धर्मयुद्ध में केवल पुरुषों ने ही अपने जीवन का बलिदान नहीं किया बल्कि यहाँ की वीरांगनाएँ भी घर से निकलकर साहस के साथ युद्ध-भूमि में शत्रुओं से लोहा लिया। उन वीरांगनाओं में अग्रणी थीं लीलादेवी चौहान ।
जालोर राज्य का चौहान राज्यवंश का राजा समर सिंह (Samarasimha) की पुत्री लीलादेवी चौहान से अन्हिलवाड़ा (वर्त्तमान गुजरात) नरेश भीमदेव सोलंकी का विवाह हुआ इस बात का उल्लेख Kadi inscription भीमदेव सोलंकी एवं लीलादेवी कि विवाह का उललेख हैं ।
लीलादेवी चौहान बचपन से युद्धकला में अत्यधिक रूचि रखती थी और १२वि से १३वि सताब्दी (13th century) यह समय भी ऐसा था जब रणरागिनी बनकर हरदम धर्म एवं अपनी खुद शील रक्षा के लिए तैयार रहना पड़ता था यह कोई आश्चर्यजनक जानकारी नही होगी जब भारत में अरब के मलेच्छों का आक्रमण बढ़ गया भारतवर्ष में इन अरबी अश्शूरों का प्रथम लक्ष्य होता था सुन्दर सुन्दर रानियो का हरण करना पर भारतवर्ष माँ सीता की भूमि हैं यहाँ कोई रावन किसी सीता को अपवित्र करने से पहले ही काल को बली चढ़ जाता था ।
लीलादेवी चौहान एक अत्यंत पराक्रमी क्षत्राणी थी कब कौनसी परिस्तिथि से सामना होजये इसलिए हमेशा अपने साथ एवं अपनी सवारी पालकी में भी शस्त्र रखती थी ।
Battle of Anahilapataka or Nahrwala नाहरवाला की युद्ध -:
तारीख- ए- फिरीश्ता एवं मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी ने इस युद्ध का वर्णन अपने पुस्तक में किया हैं Battle of Anahilapataka or Nahrwala नाहरवाला की युद्ध सन ४ फरवरी ११९७ ईस्वी  कुतुबुद्दीन ऐबक भाड़ी संख्या की सेना के साथ नाहरवाल से होते हुए चालुक्या साम्राज्य की राजधानी अनाहीलापताका पर आक्रमण किया भीमदेव की सेना पर्याप्त नही थे कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना लाखों की संख्या थी । चालुक्या साम्राज्य का सेनापति था राव करण , वाल्लन एवं धरावर्षा था जिनकी शौर्य एवं पराक्रम की ख्याति दिल्ली के मलेच्छ अश्शूरों का नींद हरम कर चुके थे।
भीमदेव सोलंकी की सेना ७०,००० (70,000) से अधिक नहीं था (The 13th century Muslim historian Hasan Nizami boasts that the Chaulukyas lost 50,000 men in this battle. ) एवं ऐबक की सेना इस हिसाब से चौगुनी थी भीमदेव सोलंकी की हार होती हैं इस युद्ध में ऐबक ने महाराज भीमदेव के सेनापतिओं को बंदी बना कर मार देते हैं एवं भीमदेव सोलंकी की ३५,००० सैनिक रणभूमि में वीरगति को प्राप्त होते हैं एवं २०,००० सैनिको को बंदी बना लिया जाता हैं (The 16th century chronicler Firishta gives the numbers as 35,000 killed and 20,000 captured) ऐबक महाराज भीमदेव की प्राण दान के बदले राजकोष की धन संपत्ति ऐबक लूटकर ले जाता हैं अनाहलियापताका (Anahliapataka) राज्य में महाराज भीमदेव को नज़रबंद करने के लिए उनके दरबार में अपने सिपहासलाकर को छोड़ दिया जिससे महाराज भीमदेव दोबारा ऐबक के खिलाफ युद्ध घोषणा ना कर पाए ।
ऐबक अपनी सेना के साथ अनाहलियापताका (Anahliapataka) राज्य के अन्दर प्रवेश कर लूटमार किया एवं लूटने के बाद मंदिरों को लूटा एवं सोने की मुर्तिओं को लूटकर ले गया ।
अनाहलियापताका (Anahliapataka) राज्य की गद्दी पर भले ही महाराज भीमदेव बैठते थे परन्तु शसन ऐबक का चलता था महाराज भीमदेव को घुटन महसूस हो रही थी रानी लीलादेवी ने योजना बनाया की ऐबक के सिपहासलाकर भीमदेव को नज़रबंद किया था उनके परिवार को नही इस बात का लाभ उठाते हुए महारानी लीलादेवी ने महाराज भीमदेव के सेनापति लावण्य प्रसाद एवं श्रीधर को सूचित किया अनाहलियापताका (Anahliapataka) राज्य से दूर किसी गुप्त जगह पर ऐबक के विरुद्ध युद्ध की योजनायें बनायी गयी राष्ट्र , धर्म पर छाये पराधीनता के काले बादल को छांट कर स्वाधीनता का सूर्योदय होने का समय आगया था।  (There are some references to Under the leadership of Queen Liladevi , Bhima's generals Lavanaprasada and Shridhara having achieved military successes against the Ghurids (called "Turushka" and "Hammira"). It is known that Bhima was in control of Anahilapataka by 1201 CE.)
महारानी लीलादेवी ३०,००० (30,000) की सेना लिए सेनापति लावण्य प्रसाद एवं श्रीधर के साथ एक गुप्त सुरंग से होते हुए (अब कीचड़ और पत्थरों से अवरुद्ध) पाटन से अनाहलियापताका राज्य में प्रवेश किया एवं महाराज भीमदेव अपने दरबार में उपस्थित सैन्यबल को इस युद्ध के लिए आगम सुचना दे चुके थे इसलिए दरबार एवं राज्य में उपस्थित सभी सैनिक सजग थे ।
महारानी लीलादेवी ने दरबार में उपस्थित ऐबक के दूत के हाथों युद्ध घोषणा पत्र भेज दिया  ।  सन १२०१ ईस्वी में ऐबक अपनी सेना के साथ फिर से आक्रमण किया अनाहीलापताका राज्य पर भिमदेव सोलंकी स्वयं १५,००० से १६,००० सैनिको का नेतृत्व कर रहे थे , लावण्या प्रसाद के साथ १०,००० से १२,००० अश्व सैन्य दल था एवं श्रीधर महारानी लीलादेवी के साथ २०,००० सैनिको का नेतृत्व कर रहे थे ।
ऐबक की ९५,००० से एक लाख की (95,000 - 1,000,00) विशाल सेना थी चालुक्या साम्राज्य की सैन्यबल तनिक चिंतित लगे डर नही चिंतित थे क्योंकि इस बार हारने का अर्थ राज्य , स्त्री , धन , मदिर , संस्कृत सब मिट जायेगा तभी महारानी लीलादेवी ने हुँकार भड़ी “वीरो धर्म एवं भगवा ध्वज की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ । धर्म रक्षार्थ के लिए रिपु दल की सेना को परास्त कर शुद्धि यज्ञ करवाना हैं , संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। मेरे प्राण रहते एक पग पीछे नहीं हटाऊंगी । प्रतिज्ञा करती हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगी । रणरागिनी की इस हुँकार से वीरता की लहर दौड़ गई धर्म योद्धाओ ने प्रण किया “जब तक हमारे धर पर सर रहेगा मलेच्छों का धर सर विहीन होता रहेगा”
कुतुबुद्दीन ऐबक ने फरमान भेजा की रानी को उनके हवाले कर दे एवं आत्मसमर्पण कर ले इतनी विशाल सेना से युद्ध करने से कुछ हासिल नहीं होगा चालुक्या साम्राज्य का ध्वंश निश्चित हैं परन्तु भीमदेव सोलंकी ने फल की चिंता ना करते हुए युद्ध घोषणा किया  ।

रानी लीलादेवी ने अपने सेनापति श्रीधर के साथ योजना बनायीं युद्ध का परिणाम कुछ भी हो परन्तु कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना को राज्य की सीमा से बहार खदेड़ना हैं जिससे राज्य की स्त्रियाँ अपनी शील रक्षा हेतु राज्य छोड़ किसी सुरक्षित स्थान पर आश्रय ले सके  ।

ऐबक का सेनापति आमिर अताबेग ने ६२,००० सेना (62,000) के साथ हमला किया रानी की सेना को परास्त कर रानी माँ को जीवित पकड़कर ऐबक की हरम में पेश करना चाहते थे रानी लीलादेवी की तलवार का गति हवाओं को काट रही थी सेनापति बेग की सेना उलटे पांव भागना उचित समझा रानी लीलादेवी के हाथो सेनापति आमिर अताबेग की मृत्यु हुआ एवं आमिर अताबेग का सेना उलटे पांव भागा

ऐबक की सेनापति फखरुद्दीन (Fakhr ad-Din) ने रानी लीलादेवी को घेड़ लिया रानी लीलादेवी रणरागिनी बन फखरुद्दीन के सेना को गाजर मुली की भांति काटना आरंभ किया यह देख भयभीत होकर फखरुद्दीन ऐबक के पास भागा कहा रानी को ख़तम नहीं किया तो हम जंग हार जायेंगे ऐबक ने योजना बनाया रानी को जान से नही मारना मूर्छित कर राज्य से बहार लेकर जाना हैं सही सलामत फखरुद्दीन ने रानी लीलादेवी को फिर से घेड़ा फखरुद्दीन ने जैसे ही प्रहार किया रानी पर रानी ने अपनी तलवार से प्रहार को रोकते हुए फखरुद्दीन को बीचो बीच से चिड़कर रख दिया ।

दो दो सेनापति की मृत्यु से ऐबक की सेना मनोबल टूट चूका था भीमदेव की सेना अत्याल्प था परन्तु ऐबक की जहा सौ मर रहे थे भीमदेव का एक सैनिक वीरगति को प्राप्त कर कर रहे थे ऐबक अपनी सेना को एक किया एवं इस्लाम की तालीम को याद करवाया एवं नयी जोश भड़ते हुए अपने बिखरे सेना को एक कर फिर आक्रमण किया राजा भीमदेव सोलंकी एवं उनके सेनापति लावण्या प्रसाद ने ऐबक को परास्त कर उस मलेच्छ को २०० कोड़े मारे एवं नाख़ून निकाल लिया क्योंकि मंदिर ध्वस्त कर मंदिर को अपवित्र किया था एवं अनाहीलापताका राज्य के लुटे हुए धन संपत्ति वापस लिया एवं ३,००० हरज़ाना वसूला गया एवं मलेच्छों की सेना को पाटन (वर्त्तमान गुजरात) सीमा से बहार खदेड़ा ।  

अंतत: अनाहीलापताका पर पुनः सोलंकी राजपूतो का राज स्थापित हुआ यह सत्य हैं नारी हिन्दू धर्म की उत्थान एवं पतन की कारन रही हैं आज हमारे पाठ्यक्रम में इन वीरांगनाओ की इतिहास लिखी नही जाती राम , रहीम एक हैं की चक्कर में हिन्दू की बेटी रहीम के साथ भाग रही हैं । घर पर एकता कपूर का सीरियल और भांड शाहरुख़ खान और दुसरे खानों का कार्यक्रम चलता हैं माँ बेटी से कहती हैं बेटी दामाद हो तो ऐसा चिकना बेटी के मन में किसी खान की रखैल बनने का ख्वाब जाग जाता हैं फिर क्या सैफीना , संगीता बिजलानी , अमृता सिंह , किरण राव बन जाती हैं ।
काश!! आजकल की नारियाँ जान जाती कितनी वीरांगनाओ ने मलेच्छों का सर उतारा था कितनी वीरांगनाओ ने अग्निदेव को खुद का तन समर्पित कर दिया तो जौहर कर आज सती माता सीता , द्रौपदी एवं पद्मिनी की धरती पर कोई युवती लव जिहाद का शिकार नहीं बनती ।
वैलेंटाइन दिवस के दिन कुछ भाई लवर्स पार्क में जाकर प्रेमी जोड़े को मारते हैं तो कुछ ज़बरदस्ती video बनाते हैं पर क्या इससे समस्याओं का समाधान हो जाता हैं मेरे ख्याल से नही समस्या और बढ़ जाती हैं हिन्दू धर्म के प्रति उनके मन में गृहणा उत्पन्ना होती हैं।
अब मुझसे पूछा जायेगा तो इसका समाधान क्या हैं इसका समाधान हैं गुरुकुल निर्माण अंग्रेजो का लागू किया हुआ Indian Education System को जड़ से उखाड़ कर फ़ेंक देना चाहिए एवं गुरुकुल लागू करनी चहिये जहाँ भारतीय होने पर गर्व महसूस करवाया जाए एवं भारत की समृद्धि एवं उपलब्धियों के विषयों में पढाया जाए ऐसे रुकेगी लव जिहाद एवं पश्चिमीकरण ।  
संदर्भ-:
१) James Tod, had written a book "Early history of Solankis”
२) Rajput Kingdom of Western Asia Volume IV Rajendra Mishra
३) तारीख- ए- फिरीश्ता


मनीषा सिंह

विश्व का राजनैतिक अर्थशास्त्र :--

विश्व का राजनैतिक अर्थशास्त्र :--
देंग जियाओ पिंग के समय से राजनैतिक मतभेदों के बावजूद चीन अमरीका का सबसे भरोसेमन्द आर्थिक साथी रहा है जहाँ अमरीका की सबसे अधिक पूँजी लगती रही है |
विदेशी पूँजी आयात करने के आरम्भिक काल में चीन बड़ा खुश था कि तेजी से उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन अब विदेशी कम्पनियों द्वारा बाहर भेजने वाले मुनाफ़े की मात्रा इतनी बढ़ गयी है कि चीन त्राहि-त्राहि कर रहा है |
दूसरी तरफ अमरीका में बढ़ती बेरोजगारी का प्रमुख कारण है अमरीका की अधिकाँश पूँजी का चीन में पलायन जहाँ मजदूरी कम है और हड़ताल पर पाबन्दी है |
इन कारणों से अब अमरीका और चीन के सम्बन्धों में खटास आने लगी है | फिर भी अमरीका की ताकत नहीं है कि चीन से पूँजी वापस मंगा ले, क्योंकि वह पूँजी कैश तो है नहीं जो जब चाहे बैंक से निकाल लें, वह पूँजी कारखाने आदि के रूप में है जिन्हें उठाकर अमरीका लाना सम्भव नहीं |
पश्चिमी देशों और जापान की उस विशाल पूँजी की रक्षा के लिए अमरीका चिन्तित है | उस पूँजी से होने वाले भारी मुनाफे के बाहर भागने से चीन भी चिन्तित है | निकट भविष्य में यह समस्या और भी बढ़ेगी, जिसका समाधान है विश्वव्यापी युद्ध, जिसके दो अन्य कारण भी रहेंगे -- (1) तेल के भंडारों के सूखने पर बचे-खुचे तेल के लिए मारामारी, जो ईराक और लीबिया पर कब्जा करके और सीरिया में ISIS को बढ़ावा देकर अमरीका आरम्भ कर चुका है, ISIS द्वारा सीरिया का जो तेल लूटा जा रहा है वह तुर्की के रास्ते पश्चिमी देशों को ही जाता है ; और (2) कट्टरपन्थी जेहाद, जिसे तेल के भंडारों के सूखने के बाद अमरीका, फ्रांस, इजराईल, आदि देश सहन नहीं करेंगे और मुल्लों के घरों में घुस-घुसकर हज़ार सालों का बदला लेंगे |
चीन अपने को मार्क्स-लेनिन के रास्ते पर चलने वाला साम्यवादी देश कहता है, किन्तु देंग जियाओ पिंग ने नया सिद्धान्त बनाया -- "बिल्ली यदि चूहे को पकड़ती है तो हमें इससे कोई मतलब नहीं कि बिल्ली काली है या सफ़ेद" (अर्थात आर्थिक विकास यदि तेज हो तो हमें इससे कोई मतलब नहीं कि हमारी नीति साम्यवादी है या पूँजीवादी)| नेहरु ने काले में सफ़ेद को मिलाकर चितकबरी बिल्ली बनायी और उसे महालनोबिस के "मिश्रित अर्थव्यवस्था"  का नाम दिया (जो वास्तव में फ्रेंक्लिन रूजवेल्ट के  'न्यू डील'  का अन्धानुकरण था), जबकि देंग जियाओ पिंग ने काले के साथ सफ़ेद का सामंजस्य दूसरे तरीके से बिठाया -- सत्ता में कम्युनिस्ट पार्टी तानाशाही तरीके से रहे और आर्थिक मामले में विशुद्ध पूँजीवादी मॉडल का अनुसरण किया जाय |
आर्थिक मामले में मार्क्स-लेनिन के विचारों को त्याग दिया जाय तो मार्क्सवाद-लेनिनवाद में कूड़ा ही बचेगा | मार्क्स और लेनिन के अनेक आर्थिक विचार बड़े ही महत्वपूर्ण हैं, यह दूसरी बात है कि स्टालिन और माओ जैसे लोगों ने मार्क्सवाद को गलत तरीके से लागू किया | मार्क्सवाद को सोवियत संघ से बेहतर अमरीका ने लागू किया जहाँ मार्क्स के जमाने में हड़ताल पर सख्त पाबन्दी थी (साम्यवादी लाल झण्डे की खोज अमरीका ने की थी, शिकागो में हड़ताली मजदूरों के जुलुस पर पुलिस फायरिंग से मरने वाले मजदूरों के कुर्तों को झंडा बनाकर जुलुस बढ़ता गया जिसने साम्यवादी लाल झण्डे का रूप ले लिया) लेकिन आज अमरीका का मजदूर अपनी फैक्ट्री में बने कार पर चढ़कर फैक्ट्री जाता है और उस फैक्ट्री की कम्पनी का  शेयरहोल्डर अर्थात मालिक भी है और पूँजीवादी शोषण के बावजूद साम्यवादी देशों के मजदूरों से बहुत अधिक सम्पन्न, स्वतन्त्र तथा खुश है |
यही देखकर देंग जियाओ पिंग भ्रम में पड़ गए, किन्तु अमरीकी मॉडल का अनुसरण करने की बजाय आँख मूँदकर विदेशी पूँजी का आयात करने लगे | इस मामले में भारत ने अधिक सावधान रास्ता चुना और उस संकट से बच गया जिसमें चीन हाल के वर्षों में फँस चुका है और अब निकल नहीं सकता | वह संकट क्या है इसे समझने के लिए लेनिन के सबसे महत्वपूर्ण विचार को समझना पड़ेगा जिसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भूल गयी |
लेनिन का वह विचार था "आधुनिक साम्राज्यवाद"  की सही परिभाषा (जो पूँजीवादी देशों के शिक्षा संस्थान नहीं पढ़ाते)| उन्नीसवीं शती के अन्त तक साम्राज्यवाद का अर्थ था तलवार के बलपर दूसरे देश पर कब्जा जमाकर उसे लूटना | किन्तु शिक्षा, मीडिया, आदि के विकास के कारण बीसवीं शती के आरम्भ से ही साम्राज्यवाद का स्वरुप बदलने लगा और दो विश्वयुद्धों की त्रासदी के बाद अब यह नए किस्म का आधुनिक साम्राज्यवाद एक स्थायी स्वरुप ले चुका है | आधुनिक साम्राज्यवाद को लेनिन ने परिभाषित किया -- "पूँजी का निर्यात"| दूसरे देश में अपनी पूँजी का निवेश करके वहाँ से मुनाफ़ा लूटकर लाने को लेनिन ने आधुनिक साम्राज्यवाद कहा | इस परिभाषा के अनुसार आज संसार का सबसे बड़ा आर्थिक उपनिवेश है चीन जहाँ विदेशी कम्पनियों की इतनी पूँजी लगी है कि वे विश्व के कुल औद्योगिक उत्पादन का 45% उत्पादित करती हैं | विदेशी निवेश के आरम्भिक दो-तीन दशकों तक चीन बड़ा प्रसन्न था, किन्तु अब चीन में जितनी विदेशी पूँजी हर वर्ष आती है उससे अधिक मुनाफ़ा हर वर्ष चीन से बाहर जाने लगा है |
अतः वास्तविक विदेशी निवेश में भारत अब चीन को पीछे छोड़ चुका है और संसार में अव्वल है | कई तथाकथित  "राष्ट्रवादी"  बड़े खुश हैं, देंग जियाओ पिंग की तरह | कल रोयेंगे -- आज के चीन की तरह ! अमरीका से हथियार आयात करके भी वे बड़े खुश हैं, भूल जाते हैं कि पाकिस्तान को हथियार देने वाला प्रमुख देश अमरीका ही है | पाकिस्तान से भारत का सम्बन्ध सुधर जाय तो अमरीका का हथियार कैसे बिकेगा ? नए सामरिक कारखाने लगाने में समय लगता है, अतः सोनिया-राज में नष्टप्रायः सेना को मजबूत बनाने के लिए तत्काल आयात अनिवार्य है, किन्तु नए सामरिक कारखाने लगाने में कितनी प्रगति हो रही है यह कोई नहीं बतलाता | रक्षा बजट में बढ़ोतरी हुई है जो स्वागतयोग्य है, किन्तु वास्तविक वृद्धि कितनी हुई है यह तभी पता लगेगा जब हथियारों के आयात और वेतन आदि के भुगतान को किनारे रखकर आकलन किया जाय -- तब वृद्धि सन्तोषप्रद नहीं है |
अमरीका के अन्त का आरम्भ हो चुका है | अमरीकी कम्पनियों द्वारा पूँजी चीन को निर्यात के कारण अमरीका से रोजगार का भी चीन को निर्यात हो गया, और अमरीका में बेरोजगारों की बाढ़ आ गयी जिनकी भावना को भड़काकर डोनाल्ड ट्रम्प सत्ता में आ गए, किन्तु चीन से पूँजी वापस लाना उनके वश की बात नहीं | मार्क्स ने एक पते की बात कही थी -- पूँजी की कोई धर्म, राष्ट्र, जाति, नस्ल, आदि नहीं होती, पूँजी का एकमात्र धर्म है मुनाफ़ा, जिधर अधिक मुनाफ़ा हो पूँजी उधर ही भागती है |
अमरीका में मजदूरी अधिक है, अतः वहाँ निवेश करना लाभप्रद नहीं रह गया है | दुनियाभर में आतंकवादी या युद्ध जैसी परिस्थितियाँ भड़काकर अपने हथियार बेचना, सामरिक बलपर अपने डॉलर को स्वर्ण से स्वतन्त्र रखकर सबपर थोपना और उन कागज़ के टुकड़ों द्वारा दुनिया भर के सामान खरीदना -- इन दो "उद्योगों" के अलावा अन्य सभी उद्यमों में अमरीका अब पिछड़ रहा है, केवल कैलिफ़ोर्निया के पोर्न-इंडस्ट्री, कामोत्तेजक औषधियाँ, चकलाघरों और जुएखाने जैसे "उद्योगों"  में पूँजी लगाना अब अमरीका में लाभप्रद रह गया है ! जापान की सोनी कॉरपोरेशन जैसी औद्योगिक कम्पनी भी अब अमरीका में नए उद्योग लगाने के बदले हॉलीवुड में फ़िल्में बनाने लगी है ! अमरीका ने "औद्योगिक पूँजीवाद"  का चीन को निर्यात कर दिया, अब अमरीका में "लम्पट पूँजीवाद"  बच रहा है | काम-क्रोध-लोभ-मोह से पीड़ित ऐसे बीमार अमरीका को डोनाल्ड ट्रम्प किस बैसाखी के बलपर खड़ा करेंगे ?
जिस दिन सैन्य बलपर टिके डॉलर को दूसरे देश लेने से मना कर देंगे, उसी दिन अमरीका चूर-चूर होकर उसी अवस्था में लौट जाएगा जिसमें कोलम्बस से पहले था | डॉलर की ताकत को तोड़ने के लिए ही ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन (BRIC) ने करेंसी के बदले आपसी वस्तु-विनिमय (barter) का निर्णय लिया था ताकि बिना डॉलर के ही विदेश-व्यापार करके अमरीका के चंगुल से निकल सके | इन चार देशों का सम्मिलित औद्योगिक उत्पादन शेष संसार से भी बहुत अधिक है (शेष संसार का लगभग दोगुना है, केवल सेवा-क्षेत्र में विकसित देश बहुत आगे हैं) |
लेकिन अमरीका के टूटने पर भी वहाँ के धन्नासेठ नहीं टूटेंगे, जैसे कि ब्रिटेन के पतन होने के बावजूद वहाँ के सेठों का पतन नहीं हुआ, और वे अमरीका को पलायन कर गए |
सर्वांगीण वैश्विक संक्रमण का काल है | यही अवसर है भारत को महाशक्ति बनाने का | महाशक्ति बनाने के लिए पूँजी चाहिए | विकसित देशों में पूँजी का भण्डार है किन्तु मंहगे श्रम के कारण वहाँ निवेश लाभप्रद नहीं है | चीन अब पूँजी का आयात करने से हिचक रहा है क्योंकि पहले जो पूँजी आ चुकी है वह अत्यधिक मुनाफ़ा बाहर भेजने लगी है जिस कारण चीन और अमरीका में वैमनस्य बढ़ने लगा है - चीन में लगी अपनी पूँजी की रक्षा के लिए अमरीका चीन की सैन्य घेराबन्दी चाहता है जिसमें भारत को भी साथ रखने का इच्छुक है | अतः विकसित देशों की पूँजी का सबसे आकर्षक निवेश स्थल अब भारत है | यदि भारत की सरकार विदेशी पूँजी के निवेश में अड़चनों को दूर करे तो कुछ ही वर्षों में भारत चीन को पछाड़ देगा -- पहले औद्योगिक उत्पादन में और फिर स्वयं अपने ही शोषण में भी ! हमें चीन का रास्ता नहीं चुनना है | विदेशी पूँजी को आँख मूँदकर बुलाना आत्महत्या है |
अतः इस समय भारत को सबसे अधिक आवश्यकता है एक तीव्र बुद्धि के राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री को वित्त मन्त्री बनाने की, जिसके लिए सुब्रमण्यम स्वामी से बेहतर कोई नहीं है - जो राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी होने के साथ साथ हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी रह चुके हैं और अरुण जेटली को सात जन्मों तक अर्थशास्त्र पढ़ा सकते हैं |
लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी से हर कोई घबड़ाता है, क्योंकि जब बात भ्रष्टाचार की हो तब यह पट्ठा अपने सगे की भी नहीं सुनता !! भारत के बड़े-बड़े पूँजीपति भी ऐसा वित्तमन्त्री नहीं चाहते जो उनको घोटाला ही नहीं करने दे ! पूँजीवाद का अर्थ ही है घोटाला ! कांग्रेस के बड़े-बड़े घोटालों पर मोदी सरकार ने कानूनी कार्यवाई करके एक भी कांग्रेसी नेता को जेल नहीं भेजा, क्योंकि उन नेताओं के साथ साथ कई बड़े-बड़े पूँजीपति भी जेल चले जायेंगे जो ऐसा होने पर भाजपा की सरकार को भी गिरा देंगे | उदाहरणार्थ -- 2G घोटाला केवल कांग्रेस या DMK के नेताओं ने ही नहीं किया, उन सारी टेलिकॉम कम्पनियों के मालिकों ने भी किया !!
चीन के समक्ष एक दूसरा संकट भी खड़ा हो गया है -- विदेश व्यापार में लगातार भारी लाभ के कारण बड़ी मात्रा में वहाँ पूँजी एकत्र हो गयी है जिसका कहाँ निवेश करे यह चीन की समझ में नहीं आ रहा है ! विकसित देश तो पहले से ही अतिरिक्त पूँजी से परेशान हैं ! भारत को पूँजी की आवश्यकता है किन्तु चीन को विशाल पैमाने पर निवेश की छूट भारत दे नहीं सकता |
अतः संसार में अतिरिक्त पूँजी के दो बड़े भण्डार हैं -- एक तरफ चीन है तो दूसरी तरफ अमरीका के नेतृत्व में विकसित देशों का सम्प्फ है जिसमें पेट्रोलियम वाले देश भी सम्मिलित हैं क्योंकि उनकी नब्ज अमरीका के हाथों में है | चीनी पूँजी के अधिकाँश का स्वामित्व भी विकसित देशों के ही हाथों में है, किन्तु चीन के सत्ताधारी वर्ग का अमरीकी गुट से तालमेल नहीं है | चीन में साम्यवादी दल का पतन भी हो जाय तो परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आयेगा, क्योंकि लोकतन्त्र चीन के DNA में ही नहीं रहा है |
सारा झगडा "आधुनिक साम्राज्यवाद" का है -- पूँजी के निवेश और उनके मुनाफे को लेकर | वैश्विक साम्राज्यवाद के इस दलदल में भारत को अपना कमल खिलाना है जो सोनिया राज में बिलकुल असम्भव था !

विनय झा जी की वॉल से