विश्व का राजनैतिक अर्थशास्त्र :--
देंग जियाओ पिंग के समय से राजनैतिक मतभेदों के बावजूद चीन अमरीका का सबसे भरोसेमन्द आर्थिक साथी रहा है जहाँ अमरीका की सबसे अधिक पूँजी लगती रही है |
विदेशी पूँजी आयात करने के आरम्भिक काल में चीन बड़ा खुश था कि तेजी से उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन अब विदेशी कम्पनियों द्वारा बाहर भेजने वाले मुनाफ़े की मात्रा इतनी बढ़ गयी है कि चीन त्राहि-त्राहि कर रहा है |
दूसरी तरफ अमरीका में बढ़ती बेरोजगारी का प्रमुख कारण है अमरीका की अधिकाँश पूँजी का चीन में पलायन जहाँ मजदूरी कम है और हड़ताल पर पाबन्दी है |
इन कारणों से अब अमरीका और चीन के सम्बन्धों में खटास आने लगी है | फिर भी अमरीका की ताकत नहीं है कि चीन से पूँजी वापस मंगा ले, क्योंकि वह पूँजी कैश तो है नहीं जो जब चाहे बैंक से निकाल लें, वह पूँजी कारखाने आदि के रूप में है जिन्हें उठाकर अमरीका लाना सम्भव नहीं |
पश्चिमी देशों और जापान की उस विशाल पूँजी की रक्षा के लिए अमरीका चिन्तित है | उस पूँजी से होने वाले भारी मुनाफे के बाहर भागने से चीन भी चिन्तित है | निकट भविष्य में यह समस्या और भी बढ़ेगी, जिसका समाधान है विश्वव्यापी युद्ध, जिसके दो अन्य कारण भी रहेंगे -- (1) तेल के भंडारों के सूखने पर बचे-खुचे तेल के लिए मारामारी, जो ईराक और लीबिया पर कब्जा करके और सीरिया में ISIS को बढ़ावा देकर अमरीका आरम्भ कर चुका है, ISIS द्वारा सीरिया का जो तेल लूटा जा रहा है वह तुर्की के रास्ते पश्चिमी देशों को ही जाता है ; और (2) कट्टरपन्थी जेहाद, जिसे तेल के भंडारों के सूखने के बाद अमरीका, फ्रांस, इजराईल, आदि देश सहन नहीं करेंगे और मुल्लों के घरों में घुस-घुसकर हज़ार सालों का बदला लेंगे |
चीन अपने को मार्क्स-लेनिन के रास्ते पर चलने वाला साम्यवादी देश कहता है, किन्तु देंग जियाओ पिंग ने नया सिद्धान्त बनाया -- "बिल्ली यदि चूहे को पकड़ती है तो हमें इससे कोई मतलब नहीं कि बिल्ली काली है या सफ़ेद" (अर्थात आर्थिक विकास यदि तेज हो तो हमें इससे कोई मतलब नहीं कि हमारी नीति साम्यवादी है या पूँजीवादी)| नेहरु ने काले में सफ़ेद को मिलाकर चितकबरी बिल्ली बनायी और उसे महालनोबिस के "मिश्रित अर्थव्यवस्था" का नाम दिया (जो वास्तव में फ्रेंक्लिन रूजवेल्ट के 'न्यू डील' का अन्धानुकरण था), जबकि देंग जियाओ पिंग ने काले के साथ सफ़ेद का सामंजस्य दूसरे तरीके से बिठाया -- सत्ता में कम्युनिस्ट पार्टी तानाशाही तरीके से रहे और आर्थिक मामले में विशुद्ध पूँजीवादी मॉडल का अनुसरण किया जाय |
आर्थिक मामले में मार्क्स-लेनिन के विचारों को त्याग दिया जाय तो मार्क्सवाद-लेनिनवाद में कूड़ा ही बचेगा | मार्क्स और लेनिन के अनेक आर्थिक विचार बड़े ही महत्वपूर्ण हैं, यह दूसरी बात है कि स्टालिन और माओ जैसे लोगों ने मार्क्सवाद को गलत तरीके से लागू किया | मार्क्सवाद को सोवियत संघ से बेहतर अमरीका ने लागू किया जहाँ मार्क्स के जमाने में हड़ताल पर सख्त पाबन्दी थी (साम्यवादी लाल झण्डे की खोज अमरीका ने की थी, शिकागो में हड़ताली मजदूरों के जुलुस पर पुलिस फायरिंग से मरने वाले मजदूरों के कुर्तों को झंडा बनाकर जुलुस बढ़ता गया जिसने साम्यवादी लाल झण्डे का रूप ले लिया) लेकिन आज अमरीका का मजदूर अपनी फैक्ट्री में बने कार पर चढ़कर फैक्ट्री जाता है और उस फैक्ट्री की कम्पनी का शेयरहोल्डर अर्थात मालिक भी है और पूँजीवादी शोषण के बावजूद साम्यवादी देशों के मजदूरों से बहुत अधिक सम्पन्न, स्वतन्त्र तथा खुश है |
यही देखकर देंग जियाओ पिंग भ्रम में पड़ गए, किन्तु अमरीकी मॉडल का अनुसरण करने की बजाय आँख मूँदकर विदेशी पूँजी का आयात करने लगे | इस मामले में भारत ने अधिक सावधान रास्ता चुना और उस संकट से बच गया जिसमें चीन हाल के वर्षों में फँस चुका है और अब निकल नहीं सकता | वह संकट क्या है इसे समझने के लिए लेनिन के सबसे महत्वपूर्ण विचार को समझना पड़ेगा जिसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भूल गयी |
लेनिन का वह विचार था "आधुनिक साम्राज्यवाद" की सही परिभाषा (जो पूँजीवादी देशों के शिक्षा संस्थान नहीं पढ़ाते)| उन्नीसवीं शती के अन्त तक साम्राज्यवाद का अर्थ था तलवार के बलपर दूसरे देश पर कब्जा जमाकर उसे लूटना | किन्तु शिक्षा, मीडिया, आदि के विकास के कारण बीसवीं शती के आरम्भ से ही साम्राज्यवाद का स्वरुप बदलने लगा और दो विश्वयुद्धों की त्रासदी के बाद अब यह नए किस्म का आधुनिक साम्राज्यवाद एक स्थायी स्वरुप ले चुका है | आधुनिक साम्राज्यवाद को लेनिन ने परिभाषित किया -- "पूँजी का निर्यात"| दूसरे देश में अपनी पूँजी का निवेश करके वहाँ से मुनाफ़ा लूटकर लाने को लेनिन ने आधुनिक साम्राज्यवाद कहा | इस परिभाषा के अनुसार आज संसार का सबसे बड़ा आर्थिक उपनिवेश है चीन जहाँ विदेशी कम्पनियों की इतनी पूँजी लगी है कि वे विश्व के कुल औद्योगिक उत्पादन का 45% उत्पादित करती हैं | विदेशी निवेश के आरम्भिक दो-तीन दशकों तक चीन बड़ा प्रसन्न था, किन्तु अब चीन में जितनी विदेशी पूँजी हर वर्ष आती है उससे अधिक मुनाफ़ा हर वर्ष चीन से बाहर जाने लगा है |
अतः वास्तविक विदेशी निवेश में भारत अब चीन को पीछे छोड़ चुका है और संसार में अव्वल है | कई तथाकथित "राष्ट्रवादी" बड़े खुश हैं, देंग जियाओ पिंग की तरह | कल रोयेंगे -- आज के चीन की तरह ! अमरीका से हथियार आयात करके भी वे बड़े खुश हैं, भूल जाते हैं कि पाकिस्तान को हथियार देने वाला प्रमुख देश अमरीका ही है | पाकिस्तान से भारत का सम्बन्ध सुधर जाय तो अमरीका का हथियार कैसे बिकेगा ? नए सामरिक कारखाने लगाने में समय लगता है, अतः सोनिया-राज में नष्टप्रायः सेना को मजबूत बनाने के लिए तत्काल आयात अनिवार्य है, किन्तु नए सामरिक कारखाने लगाने में कितनी प्रगति हो रही है यह कोई नहीं बतलाता | रक्षा बजट में बढ़ोतरी हुई है जो स्वागतयोग्य है, किन्तु वास्तविक वृद्धि कितनी हुई है यह तभी पता लगेगा जब हथियारों के आयात और वेतन आदि के भुगतान को किनारे रखकर आकलन किया जाय -- तब वृद्धि सन्तोषप्रद नहीं है |
अमरीका के अन्त का आरम्भ हो चुका है | अमरीकी कम्पनियों द्वारा पूँजी चीन को निर्यात के कारण अमरीका से रोजगार का भी चीन को निर्यात हो गया, और अमरीका में बेरोजगारों की बाढ़ आ गयी जिनकी भावना को भड़काकर डोनाल्ड ट्रम्प सत्ता में आ गए, किन्तु चीन से पूँजी वापस लाना उनके वश की बात नहीं | मार्क्स ने एक पते की बात कही थी -- पूँजी की कोई धर्म, राष्ट्र, जाति, नस्ल, आदि नहीं होती, पूँजी का एकमात्र धर्म है मुनाफ़ा, जिधर अधिक मुनाफ़ा हो पूँजी उधर ही भागती है |
अमरीका में मजदूरी अधिक है, अतः वहाँ निवेश करना लाभप्रद नहीं रह गया है | दुनियाभर में आतंकवादी या युद्ध जैसी परिस्थितियाँ भड़काकर अपने हथियार बेचना, सामरिक बलपर अपने डॉलर को स्वर्ण से स्वतन्त्र रखकर सबपर थोपना और उन कागज़ के टुकड़ों द्वारा दुनिया भर के सामान खरीदना -- इन दो "उद्योगों" के अलावा अन्य सभी उद्यमों में अमरीका अब पिछड़ रहा है, केवल कैलिफ़ोर्निया के पोर्न-इंडस्ट्री, कामोत्तेजक औषधियाँ, चकलाघरों और जुएखाने जैसे "उद्योगों" में पूँजी लगाना अब अमरीका में लाभप्रद रह गया है ! जापान की सोनी कॉरपोरेशन जैसी औद्योगिक कम्पनी भी अब अमरीका में नए उद्योग लगाने के बदले हॉलीवुड में फ़िल्में बनाने लगी है ! अमरीका ने "औद्योगिक पूँजीवाद" का चीन को निर्यात कर दिया, अब अमरीका में "लम्पट पूँजीवाद" बच रहा है | काम-क्रोध-लोभ-मोह से पीड़ित ऐसे बीमार अमरीका को डोनाल्ड ट्रम्प किस बैसाखी के बलपर खड़ा करेंगे ?
जिस दिन सैन्य बलपर टिके डॉलर को दूसरे देश लेने से मना कर देंगे, उसी दिन अमरीका चूर-चूर होकर उसी अवस्था में लौट जाएगा जिसमें कोलम्बस से पहले था | डॉलर की ताकत को तोड़ने के लिए ही ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन (BRIC) ने करेंसी के बदले आपसी वस्तु-विनिमय (barter) का निर्णय लिया था ताकि बिना डॉलर के ही विदेश-व्यापार करके अमरीका के चंगुल से निकल सके | इन चार देशों का सम्मिलित औद्योगिक उत्पादन शेष संसार से भी बहुत अधिक है (शेष संसार का लगभग दोगुना है, केवल सेवा-क्षेत्र में विकसित देश बहुत आगे हैं) |
लेकिन अमरीका के टूटने पर भी वहाँ के धन्नासेठ नहीं टूटेंगे, जैसे कि ब्रिटेन के पतन होने के बावजूद वहाँ के सेठों का पतन नहीं हुआ, और वे अमरीका को पलायन कर गए |
सर्वांगीण वैश्विक संक्रमण का काल है | यही अवसर है भारत को महाशक्ति बनाने का | महाशक्ति बनाने के लिए पूँजी चाहिए | विकसित देशों में पूँजी का भण्डार है किन्तु मंहगे श्रम के कारण वहाँ निवेश लाभप्रद नहीं है | चीन अब पूँजी का आयात करने से हिचक रहा है क्योंकि पहले जो पूँजी आ चुकी है वह अत्यधिक मुनाफ़ा बाहर भेजने लगी है जिस कारण चीन और अमरीका में वैमनस्य बढ़ने लगा है - चीन में लगी अपनी पूँजी की रक्षा के लिए अमरीका चीन की सैन्य घेराबन्दी चाहता है जिसमें भारत को भी साथ रखने का इच्छुक है | अतः विकसित देशों की पूँजी का सबसे आकर्षक निवेश स्थल अब भारत है | यदि भारत की सरकार विदेशी पूँजी के निवेश में अड़चनों को दूर करे तो कुछ ही वर्षों में भारत चीन को पछाड़ देगा -- पहले औद्योगिक उत्पादन में और फिर स्वयं अपने ही शोषण में भी ! हमें चीन का रास्ता नहीं चुनना है | विदेशी पूँजी को आँख मूँदकर बुलाना आत्महत्या है |
अतः इस समय भारत को सबसे अधिक आवश्यकता है एक तीव्र बुद्धि के राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री को वित्त मन्त्री बनाने की, जिसके लिए सुब्रमण्यम स्वामी से बेहतर कोई नहीं है - जो राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी होने के साथ साथ हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी रह चुके हैं और अरुण जेटली को सात जन्मों तक अर्थशास्त्र पढ़ा सकते हैं |
लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी से हर कोई घबड़ाता है, क्योंकि जब बात भ्रष्टाचार की हो तब यह पट्ठा अपने सगे की भी नहीं सुनता !! भारत के बड़े-बड़े पूँजीपति भी ऐसा वित्तमन्त्री नहीं चाहते जो उनको घोटाला ही नहीं करने दे ! पूँजीवाद का अर्थ ही है घोटाला ! कांग्रेस के बड़े-बड़े घोटालों पर मोदी सरकार ने कानूनी कार्यवाई करके एक भी कांग्रेसी नेता को जेल नहीं भेजा, क्योंकि उन नेताओं के साथ साथ कई बड़े-बड़े पूँजीपति भी जेल चले जायेंगे जो ऐसा होने पर भाजपा की सरकार को भी गिरा देंगे | उदाहरणार्थ -- 2G घोटाला केवल कांग्रेस या DMK के नेताओं ने ही नहीं किया, उन सारी टेलिकॉम कम्पनियों के मालिकों ने भी किया !!
चीन के समक्ष एक दूसरा संकट भी खड़ा हो गया है -- विदेश व्यापार में लगातार भारी लाभ के कारण बड़ी मात्रा में वहाँ पूँजी एकत्र हो गयी है जिसका कहाँ निवेश करे यह चीन की समझ में नहीं आ रहा है ! विकसित देश तो पहले से ही अतिरिक्त पूँजी से परेशान हैं ! भारत को पूँजी की आवश्यकता है किन्तु चीन को विशाल पैमाने पर निवेश की छूट भारत दे नहीं सकता |
अतः संसार में अतिरिक्त पूँजी के दो बड़े भण्डार हैं -- एक तरफ चीन है तो दूसरी तरफ अमरीका के नेतृत्व में विकसित देशों का सम्प्फ है जिसमें पेट्रोलियम वाले देश भी सम्मिलित हैं क्योंकि उनकी नब्ज अमरीका के हाथों में है | चीनी पूँजी के अधिकाँश का स्वामित्व भी विकसित देशों के ही हाथों में है, किन्तु चीन के सत्ताधारी वर्ग का अमरीकी गुट से तालमेल नहीं है | चीन में साम्यवादी दल का पतन भी हो जाय तो परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आयेगा, क्योंकि लोकतन्त्र चीन के DNA में ही नहीं रहा है |
सारा झगडा "आधुनिक साम्राज्यवाद" का है -- पूँजी के निवेश और उनके मुनाफे को लेकर | वैश्विक साम्राज्यवाद के इस दलदल में भारत को अपना कमल खिलाना है जो सोनिया राज में बिलकुल असम्भव था !
विनय झा जी की वॉल से